असफल Relationship को बलात्कार (376 IPC) का रंग दिया जाना गलत प्रवृत्ति, जबरदस्ती यौन हिंसा में ही लगे बलात्कार की धारा: AHC
‘कड़वे Relationship को बलात्कार के अपराध में बदलना न केवल इस अपराध की गंभीरता को कम करता है बल्कि आरोपी पर एक ऐसा कलंक लगाता है जिसे मिटाया नहीं जा सकता’

न्यायालय ने कई मौकों पर उस परेशान करने वाली प्रवृत्ति पर ध्यान दिया है, जिसमें असफल या टूटे हुए Relationship को अपराध का रंग दे दिया जाता है. बलात्कार का अपराध, जो कि सबसे गंभीर प्रकार का अपराध है केवल उन्हीं मामलों में लगाया जाना चाहिए जहाँ वास्तव में यौन हिंसा जबरदस्ती या स्वतंत्र सहमति का अभाव हो. हर कड़वे रिश्ते (Relationship) को बलात्कार के अपराध में बदलना न केवल इस अपराध की गंभीरता को कम करता है बल्कि आरोपी पर एक ऐसा कलंक लगाता है जिसे मिटाया नहीं जा सकता और उसके साथ घोर अन्याय करता है. ऐसे मामले केवल व्यक्तिगत मनमुटाव के दायरे से कहीं आगे निकल जाते हैं.
इस संबंध में आपराधिक न्याय प्रणाली का दुरुपयोग गहरी चिंता का विषय है और इसकी निंदा की जानी चाहिए. इस कमेंट के साथ जस्टिस इलाहाबाद हाई कोर्ट के जस्टिस अवनीश सक्सेना की बेंच ने रामपुर में चल रहे केस के साथ ही पूरी क्रिमिनल प्रोसीडिंग को रद कर दिया है. जजमेंट में जस्टिस ने मेंशन किया कि मामले के प्रथम दृष्टया तथ्यों जिसमें कानूनी सिद्धांत भी शामिल हैं के आधार पर यह मामला rarest of rare की श्रेणी में आता है. जिसमें आपराधिक कार्यवाही को रद्द करने के लिए अंतर्निहित क्षेत्राधिकार का प्रयोग किया जा सकता है.
बेंच ने केस में चार्जशीट संख्या 213/2024 दिनांक 25.12.2024, संज्ञान लेने का आदेश दिनांक 23 जनवरी 2025 और केस संख्या 82/2025 (राज्य बनाम अजय सैनी और अन्य) की कार्यवाही जो केस क्राइम संख्या 221/2024 के तहत IPC की धारा 376, 328, 504, 506, 323 के अंतर्गत दर्ज अपराध से संबंधित है (थाना- कोतवाली, जिला- रामपुर) और जो वर्तमान में अपर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट-1, रामपुर के न्यायालय में लंबित है, उसे आवेदक के संबंध में रद्द कर दिया है.
नौकरी की तलाश के दौरान Relationship में आई
अभियुक्त-आवेदक उस FIR में मुख्य अभियुक्त था. इस मामले में आवेदक के अलावा उसके पिता चरण सैनी और भाई रवि सैनी को भी नामजद किया गया था. एफआईआर दर्ज करने के लिए दी गयी तहरीर में दर्ज तथ्यों के अनुसार पीड़िता ने वर्ष 2019 में नीलावेदी कॉलेज, शहजाद नगर से जनरल नर्सिंग एंड मिडवाइफरी कोर्स पूरा किया और नौकरी की तलाश में थी. इसी दौरान वह आवेदक के संपर्क (Relationship) में आई जो राजद्वारे में ‘प्रधानमंत्री जन औषधि मेडिकल स्टोर’ चलाता था. अभियुक्त ने पीड़िता को मुरादाबाद स्थित एक निजी अस्पताल में नौकरी दिलाने का प्रलोभन दिया और उसे मुरादाबाद ले गया.
आरोप है कि वहाँ पीड़िता को एक होटल के कमरे में ले जाकर उसे एक कोल्ड ड्रिंक पीने को दी गई, जिसमें कोई नशीला पदार्थ मिला हुआ था. कोल्ड ड्रिंक पीने के बाद पीड़िता बेहोश हो गई तो आवेदक ने उसके साथ बलात्कार (Relationship) किया. होश में आने पर पीड़िता ने अभियुक्त के इस कृत्य का विरोध किया जिस पर अभियुक्त ने उससे शादी करने का आश्वासन दिया. इसके बाद लगातार चार सालों तक आरोपी उसके साथ फिजिकल (Relationship) होता रहा.

एफआईआर दर्ज होने से कुछ दिन पहले पीड़िता को पता चला कि आरोपी ने कहीं और सगाई कर ली है. इसके बाद पीड़िता ने आरोपी के इस काम के बारे में अपने परिवार वालों को बताया. पीड़िता के परिवार वाले आरोपी के परिवार वालों से उनके घर पर मिलने गए, जहाँ आरोपी के पिता चरण सैनी और आरोपी के भाई रवि सैनी ने उनके साथ गाली-गलौज की. उन्हें जान से मारने की धमकी दी और उन्हें जबरदस्ती अपने घर से बाहर निकाल दिया. एफआईआर की जांच के बाद पुलिस ने कोर्ट में चार्जशीट दाखिल की. इसे कोर्ट ने संज्ञान लिया और आरोपित को समन किया.
हाई कोर्ट ने अपना पक्ष रखते हुए आरोपी आवेदक के वकील ने कहा कि शादी के झूठे वादे पर रेप (Relationship) का आरोप झूठा और बेबुनियाद है. रिपोर्ट चार साल की देरी से दर्ज करायी गयी है. रिपोर्ट का मुख्य आधार टूटे हुए रिश्ते (Relationship) हैं. एफआईआर तभी दर्ज कराई गई, जब पीड़िता को पता चला कि आरोपी आवेदक कहीं और शादी करने जा रहा है. तहरीर में दिये गये तथ्य और इन्वेस्टिगेटिंग ऑफिसर को धारा 180 BNSS के तहत दिए गए बयान तथा मजिस्ट्रेट के सामने धारा 164 CrPC के तहत दर्ज कराए गए बयान में पीड़िता की बातें लगातार बदलती रही. इन्वेस्टिगेटिंग ऑफिसर ने इस बात पर ध्यान नहीं दिया कि पूरा बयान ही ब्योरे से खाली है.
एफआईआर में पीड़िता ने कहा है कि उसे एक होटल के कमरे में ले जाया गया था. जबकि 180 BNSS के तहत दिए गए बयान में उसने कहा कि उसने रेस्टोरेंट में कोल्ड ड्रिंक पी थी, जिसमें कोई नशीला पदार्थ मिला हुआ था. धारा 164 CrPC के तहत दिए गए बयान में उसने कहा है कि उसने रेस्टोरेंट में खाना खाया था और बेहोश हो गई थी, जिसके बाद उसे होटल के कमरे में ले जाया गया. वकील ने ‘समाधान पुत्र सीताराम मनमोठे बनाम महाराष्ट्र राज्य और अन्य’1 मामले का हवाला भी दिया.
राज्य की ओर से पेश ने कहा है कि आरोपी आवेदक ने चार साल तक लगातार पीड़िता का शोषण किया है. यह मामला रेप से जुड़ा है जो साल 2019 में हुआ था. यह भी कहा गया है कि यह अर्जी गलत है और इसे खारिज कर दिया जाना चाहिए.
बेंच के सामने विचार के लिए मुख्य बिंदु यह था कि क्या जांच अधिकारी द्वारा जांच के दौरान रिकॉर्ड पर एकत्र की गई सामग्री जिसमें पीड़िता का बयान भी शामिल है, प्रथम दृष्टया बलात्कार का मामला दर्शाती है;
या क्या कार्यवाही जारी रखना कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग माना जाएगा;
और क्या यह rarest of rare मामलों की श्रेणी में आता है, जिसमें न्यायालय को न्याय सुनिश्चित करने के लिए अपने अंतर्निहित क्षेत्राधिकार का प्रयोग करते हुए कार्यवाही को रद्द कर देना चाहिए.

कोर्ट ने कहा कि धारा 482 CrPC या 528 BNSS के तहत उच्च न्यायालय की शक्तियों का दायरा और विस्तार बहुत व्यापक है लेकिन इनका प्रयोग अत्यंत सावधानीपूर्वक तथा केवल ‘दुर्लभतम से दुर्लभ’ और उपयुक्त मामलों में ही किया जाना चाहिए. कानून का यह सिद्धांत ‘कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय बनाम हरियाणा राज्य’ और ‘हरियाणा राज्य बनाम भजन लाल’ जैसे मामलों में प्रतिपादित किया गया है. ‘
‘सोम मित्तल बनाम कर्नाटक सरकार’ के मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने धारा 482 CrPC के दायरे का वर्णन करते हुए ‘दुर्लभतम से दुर्लभ मामला’ वाक्यांश को स्पष्ट किया है. नवीनतम निर्णय ‘नरेश पॉटरीज बनाम आरती इंडस्ट्रीज’ और ‘पुनीत बेरीवाला बनाम दिल्ली राज्य’ हैं.
बेंच ने माना कि एफआईआर को सीधे तौर पर पढ़ने से पता चलता है कि शुरुआती घटना वर्ष 2019 की है. घटना की तारीख, समय और जगह के बारे में कोई खास जानकारी नहीं दी गई है. इसमें जिस होटल के कमरे का जिक्र है, वह BNSS की धारा 180 और 183 (CrPC की धारा 164) के तहत दिए गए उसके बयान में बदलकर ‘रेस्टोरेंट-कम-होटल’ हो गया है.
164 के तहत दिए गए बयान में रेस्टोरेंट का इलाका ‘रेलवे स्टेशन बुद्ध बाज़ार के पास’ बताया गया है. पीड़िता का बयान इस बात को लेकर भी लगातार बदलता रहा कि नशीला पदार्थ कोल्ड ड्रिंक में मिला था या खाने में. अभियोजन पक्ष का मामला इस बात पर भी चुप है कि पीड़िता ने कौन सा खाना खाया या कौन सी कोल्ड ड्रिंक पी और क्या रेस्टोरेंट में परोसे जाने वाले खाने में नशीला पदार्थ मिलाया जा सकता था.
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कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट द्वारा रविश सिंह राणा बनाम उत्तराखंड राज्य (संबंधित पैराग्राफ 14 और 15) और प्रशांत बनाम NCT दिल्ली (संबंधित पैराग्राफ 20) के मामलों में यह टिप्पणी का हवाला दिया. इसके अनुसार यदि दो समझदार वयस्क लंबे समय तक शारीरिक संबंध (Relationship) बनाए रखते हैं तो यह माना जाएगा कि उन्होंने अपनी मर्जी से आपसी सहमति से यह रिश्ता (Relationship) चुना था और बाद में शादी का वादा पूरा न होने पर कोई अपराध नहीं माना जाएगा.
इस मामले में भी, हम पाते हैं कि अपीलकर्ता और दूसरे प्रतिवादी (मुखबिर) के बीच का रिश्ता (Relationship) दो साल तक चला. इसके अलावा, वे न केवल एक-दूसरे के साथ शारीरिक संबंध (Relationship) होने की बात स्वीकार करते हैं, बल्कि एक किराए के मकान में लिव-इन कपल के तौर पर साथ रहने की बात भी मानते हैं.
हमारी राय में, यदि दो समझदार वयस्क दो साल से अधिक समय तक लिव-इन कपल के रूप में साथ रहते हैं और एक-दूसरे के साथ सहवास (Relationship)करते हैं, तो यह अनुमान लगाया जाएगा कि उन्होंने स्वेच्छा से, और इसके परिणामों से पूरी तरह अवगत होते हुए, इस तरह के रिश्ते (Relationship) को चुना.
इसलिए, यह आरोप कि यह रिश्ता (Relationship) शादी के वादे के कारण शुरू हुआ था, इन परिस्थितियों में स्वीकार किए जाने योग्य नहीं है; विशेष रूप से तब, जब ऐसा कोई आरोप नहीं है कि यदि शादी का वादा न होता, तो यह शारीरिक संबंध (Relationship) स्थापित न होता.
एक लंबे समय तक चलने वाले लिव-इन रिश्ते में, ऐसे अवसर आ सकते हैं जब उस रिश्ते (Relationship) में शामिल पक्ष शादी की मुहर लगाकर उसे औपचारिक रूप देने की अपनी इच्छा या ख्वाहिश व्यक्त करें. लेकिन इच्छा या ख्वाहिश की वह अभिव्यक्ति, अपने आप में, इस बात का संकेत नहीं होगी कि वह रिश्ता उस इच्छा या ख्वाहिश का ही परिणाम था.
एक या दो दशक पहले, लिव-इन रिश्ते शायद आम नहीं थे. लेकिन अब अधिक से अधिक महिलाएं आर्थिक रूप से स्वतंत्र हैं और उनमें अपने जीवन को अपनी शर्तों पर जीने का सचेत निर्णय लेने की क्षमता है. इस आर्थिक स्वतंत्रता के कारण, अन्य बातों के साथ-साथ, ऐसे लिव-इन रिश्तों में वृद्धि हुई है.
इसलिए, जब इस प्रकृति का कोई मामला अदालत के सामने आता है, तो उसे केवल किताबी दृष्टिकोण नहीं अपनाना चाहिए; बल्कि अदालत, ऐसे रिश्ते की अवधि और पक्षों के आचरण के आधार पर, यह अनुमान लगा सकती है कि पक्षों की इस तरह के रिश्ते में रहने के लिए निहित सहमति थी—भले ही उनकी इसे वैवाहिक बंधन में बदलने की कोई इच्छा या ख्वाहिश रही हो या न रही हो.
रवीश सिंह राणा केस में सुप्रीम कोर्ट की व्यवस्था
“ हमारी राय में, FIR और चार्जशीट में लगाए गए आरोपों को ज्यों का त्यों मानते हुए, IPC की धारा 376(2)(n) के तहत अपराध के जरूरी तत्व मौजूद नहीं हैं. FIR और शिकायतकर्ता के CrPC की धारा 164 के तहत दिए गए बयान की समीक्षा करने पर ऐसा कोई संकेत नहीं मिलता कि 2017 में उनके रिश्ते की शुरुआत में शादी का कोई वादा किया गया था.
इसलिए, भले ही अभियोजन पक्ष के मामले को उसकी ऊपरी तौर पर स्वीकार कर लिया जाए, फिर भी यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि शिकायतकर्ता ने अपीलकर्ता के साथ यौन संबंध केवल अपीलकर्ता की ओर से शादी के किसी आश्वासन के कारण बनाए थे. दोनों पक्षों के बीच का रिश्ता सौहार्दपूर्ण और आपसी सहमति पर आधारित था. आपसी सहमति से बने रिश्ते का टूटना मात्र ही आपराधिक कार्यवाही शुरू करने का आधार नहीं बन सकता.
जो रिश्ता (Relationship)शुरुआती दौर में दोनों पक्षों के बीच आपसी सहमति पर आधारित था, उसे तब आपराधिक रंग नहीं दिया जा सकता, जब वह रिश्ता शादी के बंधन में न बंध पाए. इसके अलावा, अब दोनों पक्षों ने किसी और से शादी कर ली है और अपनी-अपनी जिंदगी में आगे बढ़ चुके हैं. इस प्रकार, हमारी राय में, इस मामले में अभियोजन पक्ष की कार्यवाही जारी रखना कानून की प्रक्रिया का घोर दुरुपयोग होगा. इसलिए, अभियोजन पक्ष की कार्यवाही जारी रखने से कोई उद्देश्य पूरा नहीं होगा.”
प्रशांत केस में सुप्रीम कोर्ट की व्यवस्था
हम पाते हैं कि यह मामला ऐसा नहीं है जिसमें अपीलकर्ता ने प्रतिवादी को केवल शारीरिक सुख के लिए लुभाया हो और फिर गायब हो गया हो. यह रिश्ता (Relationship) तीन लंबे वर्षों तक चला जो कि काफी लंबा समय है. वे एक-दूसरे के करीब रहे और भावनात्मक रूप से जुड़े रहे. ऐसे मामलों में एक चल रहे रिश्ते (Relationship) के दौरान हुई शारीरिक अंतरंगता को केवल इसलिए कि वह रिश्ता शादी में तब्दील नहीं हो सका, पीछे जाकर बलात्कार के अपराध के उदाहरण के रूप में नहीं देखा जा सकता.
बेंच का कमेंट