पीड़ित को Farmers’ Accident Welfare Scheme का लाभ देने से इनकार करना न्याय का मजाक उड़ाने जैसा, 8 सप्ताह में फैसला लें DM
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने दिया किसान की विधवा को योजना का लाभ देने का आदेश, डीएम बलिया का 2021 का आदेश रद

कोर्ट ने Welfare Scheme मामले को जिला मजिस्ट्रेट, बलिया को वापस भेज दिया है ताकि वे कानून के अनुसार दावे पर नए सिरे से गुण-दोष के आधार पर विचार करें और आठ सप्ताह के भीतर फैसला लें. कोर्ट में यह फैसला सुनाते हुए जस्टिस गरिमा प्रसाद ने कहा कि हैरानी की बात है कि जहाँ प्रतिवादी अधिकारी याचिकाकर्ता को दावा जमा करने में कथित देरी के लिए दंडित करना चाहते हैं, वहीं उन्हीं अधिकारियों ने इस मामले पर निर्णय लेने में वर्षों लगा दिए. अधिकारियों का ऐसा आचरण, जिन्होंने मामले को वर्षों तक लटकाए रखा देरी के आधार पर उनके तर्क को पूरी तरह से अस्वीकार्य बना देता है.
यह रिट सी याचिका बलिया जिले की रहने वाली लालसा देवी की ओर से दाखिल की गयी थी. याचिका में डीएम के आदेश को रद किये जाने और याचिकाकर्ता के पति की मृत्यु पर “मुख्यमंत्री किसान एवं सर्वहित बीमा योजना” के तहत याचिकाकर्ता के Welfare Scheme दावे का भुगतान करने का आदेश देने की मांग की गयी थी.
फैक्ट्स के अनुसार राज्य सरकार ने “मुख्यमंत्री किसान एवं सर्वहित बीमा योजना” नामक एक Welfare Scheme तैयार की ताकि योजना के तहत निर्दिष्ट आकस्मिकताओं से उत्पन्न मृत्यु या स्थायी विकलांगता के मामलों में किसानों के परिवारों को वित्तीय सहायता प्रदान की जा सके. यह Welfare Scheme कई वर्षों से लागू है और समय-समय पर सरकारी आदेशों के माध्यम से इसमें संशोधन किया गया है.
Welfare Scheme का उद्देश्य उस किसान के परिवार को तत्काल वित्तीय सहायता प्रदान करना है
इस Welfare Scheme का उद्देश्य उस किसान के परिवार को तत्काल वित्तीय सहायता प्रदान करना है, जिसकी आकस्मिक मृत्यु हो जाती है या जो स्थायी रूप से विकलांग हो जाता है, ताकि वह परिवार, कमाने वाले सदस्य को खोने के कारण उत्पन्न अचानक आर्थिक संकट से उबर सके.

वर्तमान मामले में, याचिकाकर्ता द्वारा दायर किए गए Welfare Scheme दावे को केवल इस आधार पर अस्वीकृत कर दिया गया है कि दावा परिसीमा अवधि समाप्त होने के बाद दायर किया गया था. कोर्ट के सामने विचारणीय बिंदु था कि क्या क्या योजना के तहत याचिकाकर्ता का दावा अनुमेय अवधि के भीतर दायर किया गया था और क्या प्रतिवादी, परिसीमा के आधार पर दावे को अस्वीकृत करने में उचित थे.
याची का पक्ष रखते हुए उसके अधिवक्ता ने कोर्ट को बताया कि याचिकाकर्ता के पति राम प्रवेश यादव छोटे किसान थे. उनकी मृत्यु 06 सिंतबर 2016 को एक भैंस के हमले के बाद हो गई थी. जरूरी औपचारिकताएँ पूरी करने के बाद याचिकाकर्ता ने संबंधित लेखपाल महेंद्र राम के पास योजना के तहत अपना दावा निर्धारित चार महीने की अवधि के भीतर ही जमा कर दिया था. हालाँकि लेखपाल दावे को सक्षम अधिकारियों तक पहुँचाने में विफल रहा.
उक्त लेखपाल का तबादला अप्रैल 2017 में हो गया था लेकिन वह याचिकाकर्ता के दावे से जुड़े दस्तावेज नए तैनात लेखपाल को सौंपने में नाकाम रहा. याचिकाकर्ता को इसका पता बाद में चला और पुराने लेखपाल से दस्तावेज वापस लेने के लिए काफी कोशिशें करने के बाद आखिरकार उसने 2018 में दस्तावेज नए तैनात लेखपाल को सौंप दिए.
इसके बाद, संबंधित लेखपाल ने अपनी रिपोर्ट राजस्व निरीक्षक और तहसीलदार के सामने पेश की तो यह मामला उप-विभागीय मजिस्ट्रेट को भेज दिया. इसके बाद यह दावा मुख्य राजस्व अधिकारी को भेजा गया. 2019 में ‘किसान एवं सर्वहित बीमा योजना समिति’ की बैठक में इसे इस आधार पर खारिज कर दिया गया कि यह समय-सीमा से बाहर था.
इससे व्यथित होकर याचिकाकर्ता ने न्यायालय का दरवाजा खटखटाया. रिट याचिका का निपटारा इस निर्देश के साथ किया गया कि याचिकाकर्ता को एक विस्तृत अभ्यावेदन प्रस्तुत करने की स्वतंत्रता दी जाए और अधिकारियों को निर्देश दिया जाए कि वे तीन सप्ताह के भीतर उस पर निर्णय लें. इसके अनुपालन में याचिकाकर्ता ने 08 फरवरी 2021 को एक नया अभ्यावेदन प्रस्तुत किया. कोर्ट के आदेश के बावजूद दावे पर कोई निर्णय नहीं लिया गया. जिससे याचिकाकर्ता को अवमानना की कार्यवाही शुरू करने के लिए विवश होना पड़ा.
अवमानना याचिका दाखिल होने पर न्यायालय ने अधिकारियों को दावे पर निर्णय लेने के लिए छह सप्ताह का एक और अवसर प्रदान किया. इसके अनुपालन में सक्षम प्राधिकारी ने विवादित आदेश पारित किया जिसमें दावे को इस आधार पर खारिज कर दिया गया कि इसे 20 महीने से अधिक की देरी से प्रस्तुत किया गया था. यह देरी योजना के तहत निर्धारित अवधि से कहीं अधिक थी और इसलिए इसे माफ नहीं किया जा सकता था.
याचिकाकर्ता के वकील ने यह तर्क दिया कि प्रतिवादी अधिकारी अपने ही रिकॉर्ड पर विचार करने में विफल रहे, जिससे यह स्पष्ट रूप से जाहिर होता है कि याचिकाकर्ता ने निर्धारित समय-सीमा के भीतर दस्तावेज प्रस्तुत कर दिए थे. तत्कालीन लेखपाल महेंद्र राम को पूरे दस्तावेज मिलने के बावजूद दावा आगे न भेजने की घोर लापरवाही के लिए कारण बताओ नोटिस जारी किया गया था.

स्टेट को रीप्रजेंट करते हुए अधिवक्ता ने कहा कि यद्यपि याचिकाकर्ता के पिछले आवेदन की तारीख रिकॉर्ड पर उपलब्ध नहीं थी, यह स्वीकार किया गया कि याचिकाकर्ता ने पिछले लेखपाल को कुछ दस्तावेज जमा किए थे जो उन्हें आगे बढ़ाने में विफल रहे थे. चूंकि दावा किसान की मृत्यु के 20 महीने से भी अधिक समय बाद दाखिल किया गया, इसलिए सक्षम प्राधिकारी दावे को योजना के तहत निर्धारित समय सीमा से बाहर मानने और तदनुसार उसे खारिज करने में उचित थे.
कोर्ट ने माना कि मूल रिकॉर्ड से स्पष्ट रूप से पता चलता है कि याचिकाकर्ता ने अप्रैल 2017 से काफी पहले ही तत्कालीन लेखपाल को दावे के दस्तावेज जमा कर दिए थे. दावे को आगे बढ़ाने में देरी इसलिए हुई क्योंकि लेखपाल ने न तो दावे को सक्षम प्राधिकारियों को भेजा और न ही अपने स्थानांतरण पर दस्तावेज अपने उत्तराधिकारी को सौंपे. रिकॉर्ड बताते हैं कि उप-विभागीय मजिस्ट्रेट और तहसीलदार द्वारा जिला मजिस्ट्रेट को जुलाई 2021 में एक संयुक्त रिपोर्ट प्रस्तुत की गई थी.
उक्त रिपोर्ट में यह पाया गया कि तत्कालीन लेखपाल याचिकाकर्ता का दावा जमा करने में विफल रहे. जिसके लिए उन्हें कारण बताओ नोटिस जारी किया गया था. लेखपाल ने कारण बताओ नोटिस का कोई जवाब नहीं दिया तो उनके खिलाफ विभागीय कार्यवाही शुरू करने की सिफारिश की गई थी. रिकॉर्ड से यह भी स्पष्ट होता है कि उक्त अधिकारी को अंततः केवल एक चेतावनी देकर छोड़ दिया गया और उसे सभी पेंशन संबंधी लाभ मिलते रहे.
इस प्रकार, जहाँ एक ओर संबंधित अधिकारी को अपनी लापरवाही के लिए कोई गंभीर परिणाम नहीं भुगतना पड़ा वहीं दूसरी ओर याचिकाकर्ता को एक ऐसी Welfare Scheme के लाभ से वंचित कर दिया गया. 2021 के विवादित आदेश को देखने से स्पष्ट रूप से पता चलता है कि इसमें उचित रूप से सोच-विचार नहीं किया गया है. यह आदेश इस आधार पर आगे बढ़ता है कि दावा करने वाले द्वारा कोई आवेदन दायर नहीं किया गया था.
आदेश रिकॉर्ड से सामने आए महत्वपूर्ण तथ्यों पर पूरी तरह से चुप है, विशेष रूप से याचिकाकर्ता द्वारा पहले आवेदन प्रस्तुत किया जाना, तत्कालीन लेखपाल द्वारा दावे को आगे बढ़ाने या संसाधित करने में की गई चूक और इस चूक के लिए उसके खिलाफ शुरू की गई अनुशासनात्मक कार्यवाही.
ये तथ्य समय-सीमा के मुद्दे को निर्धारित करने के लिए महत्वपूर्ण थे और इन पर निष्पक्ष रूप से विचार किया जाना आवश्यक था. इस प्रकार, विवादित आदेश बिना रिकॉर्ड की उचित जाँच किए, यांत्रिक और सतही तरीके से पारित किया गया प्रतीत होता है; इसमें दावा करने वाले व्यक्ति को एक कल्याणकारी योजना के लाभार्थी के बजाय एक विरोधी पक्ष के रूप में माना गया है.
कोर्ट ने अपने फैसले में मुआवजे के मुद्दे पर यूनियन ऑफ इंडिया बनाम प्रभाकरन विजया कुमार, (2008) 9 SCC 527 मामले में सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी
“चूंकि रेलवे अधिनियम में मुआवजे का प्रावधान एक कल्याणकारी कानून है इसलिए हमारी राय में इसकी व्याख्या उदार और व्यापक होनी चाहिए न कि संकीर्ण और तकनीकी. अतः हमारी राय में, ऊपर बताई गई दो व्याख्याओं में से बाद वाली व्याख्या को प्राथमिकता दी जानी चाहिए, यानी वह व्याख्या जो कानून के उद्देश्य को आगे बढ़ाती हो और उसके प्रयोजन को पूरा करती हो…
दूसरे शब्दों में, कल्याणकारी या जनहितकारी कानूनों की व्याख्या उदारतापूर्वक की जानी चाहिए, न कि शब्दशः या कठोरतापूर्वक…”
को भी एड किया और कहा कि उपरोक्त सिद्धांत तब और भी अधिक जोरदार ढंग से लागू होता है, जब प्रशासनिक अधिकारी अधीनस्थ या प्रत्यायोजित कानूनों को लागू करते हैं जैसे कि कार्यपालिका के आदेशों के माध्यम से बनाई गई सरकारी योजनाएँ (Welfare Scheme). इसलिए, ऐसे मामलों में प्रशासनिक कार्रवाई को एक सक्रिय और व्यावहारिक दृष्टिकोण अपनाना चाहिए, जिसका उद्देश्य सामाजिक-आर्थिक लक्ष्यों को प्राप्त करना हो; न कि कठोर प्रक्रियात्मक बारीकियों को अपनाकर योजना के उद्देश्य को ही विफल कर देना.

कोर्ट ने कहा कि प्राधिकरण को एक मानवीय और व्यावहारिक दृष्टिकोण अपनाना चाहिए था; उसे अपने अधिकारी की गलती को स्वीकार करते हुए यह सुनिश्चित करना चाहिए था कि याचिकाकर्ता (एक विधवा, जिसने अपने परिवार के एकमात्र कमाने वाले सदस्य को खो दिया था) को उस योजना के तहत परिकल्पित वित्तीय सहायता प्राप्त हो सके.
इसके विपरीत, याचिकाकर्ता को अपने दावे के लिए कई प्राधिकरणों के समक्ष गुहार लगाने के लिए विवश होना पड़ा और यहाँ तक कि उसे बार-बार इस न्यायालय का दरवाजा भी खटखटाना पड़ा. रिकॉर्ड से पता चलता है कि याचिकाकर्ता को अपनी Welfare Scheme दावे पर निर्णय पाने के लिए इस न्यायालय में दो बार आना पड़ा और यहाँ तक कि अवमानना की कार्यवाही भी शुरू करनी पड़ी.
इस तरह की प्रशासनिक कार्रवाई, जिसमें किसी कल्याणकारी योजना के लाभार्थी की दुर्दशा के प्रति उदासीनता दिखाई देती है, सामाजिक न्याय सुनिश्चित करने के लिए प्रतिबद्ध संवैधानिक व्यवस्था में स्वीकार्य नहीं हो सकती.
WRIT – C No. – 12356 of 2022; Lalsa Devi Versus State of U.P. and 4 others