POCSO एक्ट 2012 के दुरुपयोग से चिंतित सुप्रीम कोर्ट ने कहा, किशोर प्रेम को अपराध न बनाएँ
कोर्ट ने देर होने से पहले कानूनी जागरूकता का आह्वान किया

सुप्रीम कोर्ट ने किशोरों के बीच सहमति से बने संबंधों के मामलों में यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण (POCSO) अधिनियम, 2012 के बढ़ते दुरुपयोग पर चिंता व्यक्त की है. दो जजों की बेंच ने कहा कि यह कानून नाबालिगों को दुर्व्यवहार से बचाने के लिए बनाया गया था. लेकिन, अक्सर युवावस्था के प्रेम संबंधों या पारिवारिक विवादों में इसका गलत इस्तेमाल किया जाने लगा है. इससे अनपेक्षित कठिनाइयाँ पैदा होती हैं.
जनहित याचिका दायर कर सरकार को सभी स्कूलों में यौन अपराधों, सहमति और गोपनीयता (POCSO) पर शिक्षा अनिवार्य करने के निर्देश देने की मांग की गई थी. याचिका में बताया गया है कि यौन हिंसा की बढ़ती घटनाओं के बावजूद, कई युवा अपने कृत्यों (POCSO) के कानूनी परिणामों से अनजान हैं.
इसमें आग्रह किया गया है कि प्रत्येक स्कूल, चाहे वह सहायता प्राप्त हो या गैर-सहायता प्राप्त, यौन अपराधों की गंभीरता और भारतीय दंड संहिता के तहत बलात्कार की कानूनी परिभाषा समझाने वाले पाठ शुरू करने चाहिए.
जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस आर महादेवन की बेंच ने माना कि सहमति से बने किशोर संबंधों में भी पॉक्सो (POCSO) अधिनियम का इस्तेमाल किया जा रहा है. न्यायाधीशों ने कानून के प्रावधानों के बारे में खासकर लड़कों और युवाओं के बीच जागरूकता फैलाने के महत्व पर जोर दिया ताकि दुरुपयोग को रोका जा सके और कम उम्र से ही जिम्मेदाराना आचरण को प्रोत्साहित किया जा सके.
POCSO Act के तहत आरोपित बरी
न्यायालय ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को स्कूलों में कानूनी और लैंगिक जागरूकता को बढ़ावा देने के लिए उठाए गए कदमों का विवरण देते हुए अपने जवाब प्रस्तुत करने का निर्देश दिया है. यह घटनाक्रम सर्वोच्च न्यायालय द्वारा पॉक्सो (POCSO) अधिनियम के तहत आरोपित एक व्यक्ति को बरी करने के तुरंत बाद आया है, जिसमें यह माना गया था कि संबंधित संबंध सहमति से बना था और विवाह में परिणत हुआ था.
इस निर्णय ने न्यायालय के उस आह्वान को उजागर किया है जिसमें अधिक संतुलित दृष्टिकोण अपनाने की बात कही गई है जो दुर्व्यवहार के वास्तविक मामलों और सहमति से बने किशोर संबंधों के बीच अंतर करता है.
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