Self Finance मोड में चलने वाले इंस्टीट्यूट के कर्मचारी को बिना नियम नहीं दी जा सकती पेंशन
हाई कोर्ट ने इलाहाबाद यूनिवर्सिटी के Self Finance इंस्टीट्यूट के कर्मचारी के रिटायरमेंट बेनिफिट्स के दावे को खारिज किया

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि Self Finance मोड में चलने वाले इंस्टीट्यूट के कर्मचारियों के लिए रिटायरल बेनिफिट की मांग पूरी नहीं की जा सकती क्योंकि उनके लिए इस तरह का कोई नियम ही नहीं है. जस्टिस सौरभ श्याम शमशेरी की बेंच ने इलाहाबाद यूनिवर्सिटी के इंस्टीट्यूट ऑफ करेस्पोंडेंस कोर्सेज एंड कंटीन्यूइंग एजुकेशन (Self Finance मोड में चलने वाला इंस्टीट्यूट) के एक रिटायर कर्मचारी की रिट पिटीशन को खारिज कर दिया है. याचिका में रिटायरमेंट के बाद के बेनिफिट्स की मांग की गई थी.
फैसला सुनाते हुए बेंच ने कहा कि पेंशन और दूसरे रिटायरमेंट ड्यूज तब तक नहीं दिए जा सकते जब तक ऐसा हक देने वाला कोई कानूनी नियम न हो. भले ही इंस्टीट्यूट (Self Finance) यूनिवर्सिटी का एक अहम हिस्सा हो, लेकिन सिर्फ इसी वजह से कर्मचारी अपने आप पेंशन या दूसरे रिटायरमेंट बेनिफिट्स के हकदार नहीं हो सकते. सुनवाई के दौरान बेंच ने कर्मचारी का पक्ष रख रहे अधिवक्ता से Self Finance इंस्टीट्यूट के कर्मचारियों को ऐसे बेनिफिट्स देने वाले किसी सर्विस रूल, लॉ या स्कीम के बारे में जानकारी मांगी तो वह पेश नहीं कर पाये.
पिटीशनर की तरफ से कोर्ट में कहा गया कि Self Finance इंस्टीट्यूट के कुछ कर्मचारियों को रिटायर होने के बाद के बेनिफिट्स दिए गए हैं. इसलिए उसे भी रिटायरमेंट के बेनिफिट्स का लाभ दिया जाना चाहिए. बेंच ने पिटीशन खारिज करते हुए निगेटिव इक्वालिटी के सिद्धांत का हवाला दिया. यह कोर्ट को सिर्फ इसलिए कोई बेनिफिट देने से रोकता है क्योंकि यह दूसरों को गलत तरीके से दिया गया था.
जस्टिस सौरभ श्याम शमशेरी ने यूपी रोडवेज रिटायर्ड ऑफिशियल्स एंड ऑफिसर्स एसोसिएशन बनाम स्टेट ऑफ यूपी (2024) 9 SCC 331 का जिक्र करते हुए कहा कि रिटायरमेंट के बाद के फायदे किसी कर्मचारी को तभी दिए जा सकते हैं जब रूल्स, लॉ या फिर कोई स्कीम इसकी इजाजत दे. इस मामले में पिटीशनर कोई नियम या कानून नहीं बता पाया जिससे पिटीशनर रिटायरमेंट के बाद मिलने वाले फायदों का हकदार हो जाता है. सिर्फ इस आधार पर कि Self Finance इंस्टीट्यूट यूनिवर्सिटी का एक जरूरी हिस्सा है या पिटीशनर को दूसरे फायदे दिए गए थे, यह नहीं माना जा सकता कि वह रिटायरमेंट के बाद के फ़ायदों का हकदार है.
सेंट्रल यूनिवर्सिटी का दर्जा मिला तो Self Finance इंस्टीट्यूट के पिटीशनर और दूसरों की सर्विस में कोई चेंज नहीं हुआ
कोर्ट ने इस बात पर भी ध्यान दिया कि जब 2005 में इलाहाबाद यूनिवर्सिटी को सेंट्रल यूनिवर्सिटी का दर्जा मिला तो Self Finance इंस्टीट्यूट के पिटीशनर और दूसरों की सर्विस में कोई चेंज नहीं हुआ. ऐसे में अगर पिटीशनर और वैसी ही स्थिति वाले दूसरे कर्मचारी एक्ट, 2005 के लागू होने से पहले रिटायरमेंट के बाद के फायदों के हकदार है, तो यह हक जारी रहेगा, वरना नहीं.
जबकि किसी भी प्रोविजन में यह साफ तौर पर नहीं बताया गया है कि पिटीशनर और वैसी ही स्थिति वाले लोग रिटायरमेंट के बाद के फायदों के हकदार थे. उनकी बातों के सपोर्ट में कोई सर्विस रूल रिकॉर्ड पर नहीं लाया गया.

पिटीशनर की तरफ से सीनियर एडवोकेट अनुराग खन्ना और रेस्पोंडेंट की तरफ से सीनियर एडवोकेट मनीष गोयल पेश हुए. पिटीशनर रेखा सिंह Self Finance मोड में चलते वाले इंस्टीट्यूट में असिस्टेंट डायरेक्टर/डायरेक्टर के तौर पर काम करने के बाद रिटायर हो चुकी हैं.
रिटायरमेंट के बाद उन्होंने पेंशन, ग्रेच्युटी, प्रोविडेंट फंड और दूसरे ड्यूज सहित रिटायरमेंट के बाद दिये जाने वाले बेनिफिट्स की मांग करते हुए फिर से हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया. यूनिवर्सिटी ने उनके दावे को यह कहते हुए खारिज कर दिया था कि इंस्टीट्यूट एक टेम्पररी सेल्फ Self Finance इंस्टिट्यूट है और Self Finance इंस्टिट्यूट के कर्मचारियों को संबंधित ऑर्डिनेंस के तहत रिटायरमेंट के बाद के बेनिफिट्स के किसी प्रोविजन के बिना टेम्पररी या कॉन्ट्रैक्ट के आधार पर रखा गया था.
पिटीशनर ने तर्क दिया कि Self Finance इंस्टिट्यूट यूनिवर्सिटी का एक अहम हिस्सा है और कर्मचारी यूनिवर्सिटी डिपार्टमेंट्स के दम पर चलते हैं. यह भी कहा गया कि इलाहाबाद यूनिवर्सिटी एक्ट, 2005 के सेक्शन 5(d) के तहत, जब यूनिवर्सिटी एक स्टेट यूनिवर्सिटी से सेंट्रल यूनिवर्सिटी बनी तो कर्मचारियों की सर्विस कंडीशंस सुरक्षित थीं. कोर्ट ने यह दोहराने के लिए पहले के उदाहरणों का हवाला दिया कि पेंशन कोई इनाम नहीं है बल्कि एक कीमती अधिकार है जो किसी गवर्निंग रूल या स्कीम से मिलना चाहिए.
ऐसे किसी प्रोविजन के न होने पर पेंशनरी बेनिफिट्स के लिए कोई लागू करने लायक क्लेम नहीं किया जा सकता. इसलिए, यह मानते हुए कि कोई भी कानूनी प्रोविजन पिटीशनर के क्लेम को सपोर्ट नहीं करता है और दूसरों को दिए गए कथित रूप से अनियमित बेनिफिट्स के आधार पर पैरिटी का क्लेम नहीं किया जा सकता है, कोर्ट ने यूनिवर्सिटी के फैसले में दखल देने से मना कर दिया और रिट पिटीशन खारिज कर दी.
WRIT – A No. – 4877 of 2021; Rekha Singh v. Union of India and others