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सह अभियुक्त के इकबालिया बयान Charge sheet में शामिल नहीं किया जा सकता, लेकिन पुलिस बयान का उपयोग जांच में कर सकती है

सह अभियुक्त के इकबालिया बयान Charge sheet में शामिल नहीं किया जा सकता, लेकिन पुलिस बयान का उपयोग जांच में कर सकती है

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा है कि सह अभियुक्त के इकबालिया बयान को भले ही Charge sheet में शामिल नहीं किया जा सकता, लेकिन इसका यह मतलब नहीं है कि पुलिस इस बयान का उपयोग जांच में नहीं कर सकती. इकबालिया बयान साक्ष्य के रूप में भले अस्वीकार्य हो लेकिन नए तथ्य की खोज के लिए इसका उपयोग किया जा सकता है और साक्ष्य बयान का समर्थन करते हैं तो Charge sheet में शामिल इकबालिया बयान को अभियोग में इस्तेमाल किया जा सकता है.

जस्टिस राजीव लोचन  शुक्ला ने गैर इरादतन हत्या के अभियुक्त गोरखपुर के किशन यादव की अर्जी खारिज कर दी है.  कोर्ट ने कहा, सह अभियुक्त के इकबालिया बयान के आधार पर धारा 23 के तहत किसी नए तथ्य की खोज, साक्ष्य में स्वीकार्य है. कोर्ट ने कहा आवेदक नियमित जमानत के लिए आवेदन कर सकता है जिस पर विचार किया जाएगा. आवेदक के अधिवक्ता ने झूठा फंसाए जाने की बात कही थी. उसे केवल इकबालिया बयान के आधार पर गिरफ्तार करने की कोशिश की जा रही है.

सरकारी वकील ने अर्जी का विरोध करते हुए कहा है कि जांच अभी जारी है. पुलिस हिरासत में पूछताछ आवश्यक है और उसे पुलिस जांच के दौरान सुरक्षा नहीं दी जानी चाहिए. कोर्ट ने कहा, सह अभियुक्त के इकबालिया बयान से अभियुक्त की संलिप्तता स्पष्ट है. रिकॉर्ड के अनुसार यह कृत्य बिना किसी उकसावे के किया गया है.

लोहे की राड से हमले के आरोपी को अग्रिम जमानत पर रिहा करने से इंकार

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पिता पुत्री सहित तीन चार लोगों द्वारा लोहे की राख लेकर हमला करने के मामले में आरोपी सिविल लाइंस प्रयागराज के सुभाष केसरवानी को अग्रिम जमानत देने से इंकार कर दिया है और अर्जी खारिज कर दी है. यह आदेश जस्टिस  डा गौतम चौधरी ने अग्रिम जमानत अर्जी की सुनवाई करते हुए दिया है.

याची का कहना था कि वह निर्दोष है. बिना ठोस सबूत के उसकी गिरफ्तारी की आशंका है. कोई आपराधिक इतिहास नहीं है. जमानत मिलने पर वह विवेचना में सहयोग करेगा. सरकारी वकील ने कहा कि याची के खिलाफ गैर जमानती वारंट जारी है. 10 केस का आपराधिक इतिहास होने के कारण जमानत न दी जाए.

कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि जमानत पर विचार करते समय आरोप की गंभीरता, ट्रायल से भाग जाने की संभावना अपराध में भूमिका आदि पर विचार करना चाहिए. इस मामले के तथ्य व आरोप याची को जमानत पाने का हकदार नहीं पाते.

Marital Disputes में पति को वर्चुअली मेडिएशन में शामिल होने की  अनुमति

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने विदेश में रह रहे पति को वैवाहिक विवाद (Marital Disputes) के निपटारे के लिए मध्यस्थता प्रक्रिया में वर्चुअल माध्यम से जुड़ने की अनुमति दे दी है. जस्टिस तेज प्रताप तिवारी की एकल पीठ ने पूनम चंद और अन्य की  दायर Marital Disputes याचिका पर सुनवाई करते हुए यह निर्देश जारी किया. कोर्ट ने मामले की प्रकृति को देखते हुए इसे इलाहाबाद हाईकोर्ट के मध्यस्थता एवं सुलह केंद्र को संदर्भित कर दिया है.

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मामले के अनुसार आवेदकों ने गौतम बुद्ध नगर की अदालत में लंबित आपराधिक कार्यवाही और मऊ में दर्ज दहेज उत्पीड़न (धारा 498-A) सहित अन्य धाराओं के तहत चार्जशीट और संज्ञान आदेश को चुनौती दी थी. आवेदकों के वकील ने तर्क दिया कि आवेदक संख्या 2, अंकुर चंद (पति), वर्तमान में भारत से बाहर रह रहे हैं और चूंकि यह मामला पूरी तरह से वैवाहिक विवाद (Marital Disputes) से जुड़ा है इसलिए मध्यस्थता के जरिए इसके समाधान की संभावना तलाशी जानी चाहिए.

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अदालत ने परिस्थितियों पर विचार करते हुए आवेदकों को तीन सप्ताह के भीतर 50,000 रुपये जमा करने का निर्देश दिया है. इस राशि में से 25,000 रुपये विपक्षी संख्या 2 (पत्नी) को उनकी पहली उपस्थिति पर और 20,000 रुपये दूसरी उपस्थिति पर दिए जाएंगे, जबकि शेष 5,000 रुपये मध्यस्थता केंद्र को देय होंगे. कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि यदि निर्धारित अवधि में राशि जमा नहीं की गई तो स्थगन आदेश स्वतः समाप्त हो जाएगा.

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राहत प्रदान करते हुए हाईकोर्ट ने अगली सुनवाई तक आवेदकों के खिलाफ किसी भी दंडात्मक कार्रवाई पर रोक लगा दी है. साथ ही, मध्यस्थता केंद्र के संबंधित अधिकारियों को निर्देश दिया गया है कि वे विदेश में रह रहे पति की वर्चुअल भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक सुविधाएं प्रदान करें. मध्यस्थता केंद्र को तीन महीने के भीतर अपनी रिपोर्ट सौंपनी होगी, जिसके बाद मामले की अगली सुनवाई की जाएगी.

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