50 हजार Bribe लेते पकड़े गये गोरखपुर यूनिवर्सिटी के आफिस सुपरिटेंडेंट को हाई कोर्ट से सशर्त जमानत
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने विजलेंस टीम द्वारा 50 हजार रुपये घूस (Bribe) लेते रंगे हाथ गिरफ्तार किये गये दीन दयाल उपाध्याय यूनिवर्सिटी गोरखपुर के आफिस सुपरिटेंडेंट डॉ. बृजनाथ सिंह की सशर्त जमानत मंजूर कर ली है. जमानत मंजूर करते हुए जस्टिस समीर जैन ने कहा है कि यह तय कानून है कि जब तक दोष साबित न हो जाए आरोपी को निर्दोष माना जाता है. आरोप साबित हुए बिना जमानत की अर्जी को दंडात्मक या निवारक उद्देश्यों के लिए खारिज नहीं किया जाना चाहिए.

कोर्ट ने माना कि मामले के तथ्यों और परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए आवेदक जमानत पर रिहा होने का हकदार है. कोर्ट ने मामले की खूबियों पर कोई राय व्यक्त किए बिना जमानत याचिका मंजूर की है. यह आवेदन निचली अदालत में ट्रायल के लंबित रहने के दौरान, केस क्राइम नंबर 8 आफ 2025, धारा 7 भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, थाना एंटी करप्शन गोरखपुर के तहत आवेदक को जमानत पर रिहा करने की मांग करते हुए दायर किया गया था.
आवेदक के विद्वान वकील ने बताया कि आवेदक दीन दयाल उपाध्याय विश्वविद्यालय में ऑफिस सुपरिटेंडेंट था. आरोप के अनुसार शिकायतकर्ता के कॉलेज में तीन लेक्चरर की नियुक्ति को मंजूरी देने और सह-शिक्षा को मंजूरी देने के लिए उसने उससे 50,000 रुपये की रिश्वत (Bribe) की मांग की. उसे रिश्वत (Bribe) की रकम लेते हुए रंगे हाथों पकड़ा गया और उसके पास से 50,000 रुपये की रिश्वत (Bribe) की रकम बरामद की गई. लेकिन, आवेदक के खिलाफ लगाए गए सभी आरोप पूरी तरह से झूठे हैं.
उन्होंने बताया कि ऑफिस सुपरिटेंडेंट होने के नाते उनके पास शिकायतकर्ता के कॉलेज को अनुमति/मंजूरी देने का कोई अधिकार नहीं था. यह अधिकार विश्वविद्यालय के रजिस्ट्रार और कुलपति के पास था. आवेदक के पास शिकायतकर्ता से रिश्वत (Bribe) मांगने का कोई मौका नहीं था.
यहां तक कि एफआईआर से भी यह पता चलता है कि कथित जाल के बाद आवेदक को पुलिस स्टेशन ले जाया गया और पुलिस स्टेशन में आवेदक और शिकायतकर्ता के हाथ धोए गए. थाने में बरामद रिश्वत (Bribe) की रकम को सील किया गया और रिकवरी मेमो तैयार किया गया. ये तथ्य पूरी जाल की कार्यवाही पर गंभीर संदेह पैदा करते हैं. उन्होंने आगे बताया कि मामले की जांच पूरी हो चुकी है और आवेदक का कोई आपराधिक इतिहास नहीं है. वह तीन महीने से जेल में निरुद्ध है.
Bribe की रकम भी उसके पास से बरामद की गई थी
सरकार की तरफ से पेश अधिवक्ता ने जमानत की अर्जी का विरोध किया और कहा कि आवेदक सरकारी कर्मचारी था और उसने शिकायतकर्ता से रिश्वत की मांग की थी. उसे ट्रैप टीम ने रंगे हाथों पकड़ा था और कथित तौर पर रिश्वत (Bribe) की रकम भी उसके पास से बरामद की गई थी. यह तथ्य कि उसे शिकायतकर्ता के कॉलेज को मंजूरी देने का अधिकार नहीं था, यह ट्रायल का मामला है.
इस बात से इनकार नहीं कर सके कि एफआईआर से पता चलता है कि कथित ट्रैप के बाद आवेदक और शिकायतकर्ता को पुलिस स्टेशन ले जाया गया था और पुलिस स्टेशन में उनके हाथ धोए गए थे और पुलिस स्टेशन में ही कथित बरामद पैसे को सील किया गया था.
वह इस बात से भी इनकार नहीं कर सके कि पुलिस स्टेशन में ही कथित Bribe ट्रैप का रिकवरी मेमो तैयार किया गया था. वह इस बात से भी इनकार नहीं कर सके कि मामले की जांच पूरी हो चुकी है और आवेदक का कोई आपराधिक इतिहास नहीं है और वह पिछले तीन महीनों से इस मामले में जेल में है.
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