अनिश्चितकाल तक किसी फर्म को Black list में डालना उसकी व्यापारिक मौत के समान: इलाहाबाद हाई कोर्ट
शराब लाइसेंसी को अनिश्चितकाल तक Black list करने का आदेश रद्द

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक आदेश में कहा लाइसेंसी को अनिश्चित समय तक काली सूची (Black list) में डालना उसकी व्यापारिक मौत के समान है. कहा कि शराब बेचने का लाइसेंस जारी करने के बाद आबकारी विभाग यह नहीं कह सकता कि शराब बेचना संविधान के अनुच्छेद 19 के तहत मौलिक अधिकार की श्रेणी में नहीं आता. कोर्ट ने कहा कि आबकारी लाइसेंस के विरुद्ध आरोप की जांच बिना ही लाइसेंस रद्द नहीं किया जा सकता. यह टिप्पणी जस्टिस पीयूष अग्रवाल ने मेरठ निवासी विजय कुमार शर्मा की याचिका पर उसके अधिवक्ता रजत ऐरन व राजकुमार सिंह को सुनने के बाद याचिका स्वीकार करते हुए की है.
कोर्ट ने याची को अनिश्चितकाल तक काली सूची (Black list) में डाले जाने के आदेश को रद्द कर दिया है. कोर्ट ने आबकारी आयुक्त एवं डीएम मेरठ के आदेशों को रद्द करते हुए तीन माह के भीतर याची की समस्त जब्त धनराशि वापस किए जाने का आदेश भी दिया है. याची का पक्ष रखते हुए अधिवक्ता रजत ऐरन एवं राज कुमार सिंह ने कोर्ट को बताया कि याची को आबकारी वर्ष 2020-21 में एक साथ दो आबकारी लाइसेंस देसी शराब बेचने के लिए जारी किए गए थे.
अनिश्चितकाल तक काली सूची (Black list) में डाल दिया
लॉकडाउन के दौरान याची पर परीक्षितगढ़ मेरठ की दुकान से शराब की तस्करी का आरोप लगाते हुए मुकदमा पंजीकृत हुआ था, जिस कारण तत्कालीन डीएम मेरठ ने उक्त लाइसेंस रद्द करने के साथ ही याची का मऊ खास स्थित दूसरी दुकान का लाइसेंस भी निरस्त करते हुए अनिश्चितकाल तक काली सूची (Black list) में डाल दिया तथा उसकी समस्त प्रतिभूति एवं लाइसेंस राशि भी जब्त कर ली गई. इस कार्यवाही के विरुद्ध याची की अपील भी आबकारी आयुक्त प्रयागराज ने खारिज कर दी.
याची के वकीलों ने दलील दी कि आबकारी अधिनियम की धारा 34(2) के तहत कार्यवाही की शक्ति पूर्णतः विवेकाधीन है जबकि डीएम द्वारा उक्त को आज्ञापक शक्ति के रूप में प्रयोग करते हुए याची के अन्य आबकारी लाइसेंस निरस्त कर दिए गए. तस्करी की घटना में प्रयुक्त गाड़ी भी एक सेवारत पुलिस आरक्षी की पाई गई जिसके विरुद्ध कोई कार्यवाही नहीं की गई है.
राज्य सरकार से पूछा, किस कानून के तहत बिना नोटिस बिना सुने वह किसी पूजा स्थल को सील कर सकता है
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने राज्य सरकार से पूछा है कि किस कानून के तहत बिना नोटिस बिना सुने वह किसी आराधना (पूजा) स्थल को सील कर सकता है और किस कानून के तहत अपनी जमीन पर मस्जिद बनाने की अनुमति लेना जरूरी है. जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस सिद्धार्थनंदन की बेंच ने यह प्रश्न मुजफ्फरनगर के ग्राम भोपा निवासी अहसान अली की याचिका की सुनवाई करते हुए उठाया है. कोर्ट ने 24 मार्च 2026 तक सरकार से जवाब मांगा था और इसी दिन अगली सुनवाई नियत की थी, लेकिन इसका विवरण नहीं है.
याची के अनुसार वह ग्राम भोपा परगना भोकरहेड़ी तहसील जनसठ स्थित प्लाट नंबर 780 का वैध मालिक है. इसे उसने 20 सितंबर 2019 को प्रवीण कुमार जैन से बैनामा कराया था. वह यहां मस्जिद बनवा रहा है, लेकिन राज्य सरकार की एजेंसियों ने इसे यह कहते हुए सील कर दिया है कि निर्माण अवैध है और सक्षम प्राधिकरण से पूर्व अनुमति नहीं ली गई थी.
याची के अधिवक्ता का कहना है कि संपत्ति को सील करने से पहले कोई नोटिस या सुनवाई का अवसर नहीं दिया गया. याचिका में सील की गई संपत्ति को मुक्त कर प्रार्थना के लिए परिसर के उपयोग की अनुमति मांगी गई है.
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