Marriage Registration से पहले वर-वधू की उम्र का सत्यापन जरूरी, फिर कैसे हो रहा है बाल विवाह: इलाहाबाद हाई कोर्ट

उन्होंने इस संबंध में उत्तर प्रदेश सरकार को महत्वपूर्ण निर्देश जारी किये हैं और उनका कड़ाई से अनुपालन सुनिश्चित करने का आदेश दिया है. यह अपील मथुरा की अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश/पॉक्सो एक्ट की विशेष अदालत द्वारा 26 नवंबर 2025 को सुनाए गए फैसले के खिलाफ दाखिल की गई थी. यह मामला भारतीय दंड संहिता की धारा 363, 366, 376 और पॉक्सो एक्ट की धारा 3/4 तथा एससी/एसटी एक्ट की धारा 3(2)(5) से जुड़ा है. अपीलकर्ता के वकील ने दलील दी कि घटना के समय पीड़िता की उम्र करीब 19 वर्ष थी और वह वयस्क थी.
स्वेच्छा से विवाह किया, जिसे बाद में पंजीकृत भी कराया गया और Marriage Registration प्रमाणपत्र जारी हुआ
उनका कहना था कि पीड़िता ने स्वेच्छा से दीपक के साथ विवाह किया, जिसे बाद में पंजीकृत (Registration) भी कराया गया और Marriage Registration प्रमाणपत्र जारी हुआ. वहीं राज्य सरकार की ओर से पेश अधिवक्ता ने कोर्ट को बताया कि ट्रायल कोर्ट ने साक्ष्यों के आधार पर पीड़िता को घटना के समय नाबालिग पाया था और तथ्यों को छिपाकर विवाह Marriage Registration कराया गया था.
सुनवाई के दौरान कोर्ट ने Marriage Registration प्रमाणपत्र जारी करने वाले रजिस्ट्रार/सक्षम प्राधिकारी को तलब किया. जांच में सामने आया कि उस समय के प्रभारी अधिकारी पंचम सिंह को कार्यभार जितेंद्र पाल सिंह से मिला था और उन्हें यह जानकारी ही नहीं थी कि नाबालिग लड़की का Marriage Registration कैसे हुआ. कोर्ट ने इसे “गंभीर चिंता का विषय” बताया, खासकर तब जब विभागीय निर्देशों के अनुसार पंजीकरण से पहले वर-वधू दोनों की जन्मतिथि सत्यापित करना अनिवार्य है.
कोर्ट ने कहा कि यह कोई अकेला मामला नहीं है, बल्कि ऐसे कई मामले सामने आ चुके हैं, जिससे Marriage Registration अधिकारियों की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठते हैं.
कोर्ट ने ने बाल विवाह निषेध अधिनियम, 2006 का हवाला देते हुए निर्देश जारी किए:-
उत्तर प्रदेश में सक्षम Marriage Registration प्राधिकारी किसी भी ऐसे विवाह को पंजीकृत नहीं करेंगे, जिसमें विवाह के समय कोई भी पक्ष अधिनियम की धारा 2(क) के तहत “बालक/बालिका” की श्रेणी में आता हो (पुरुष के लिए 21 वर्ष और महिला के लिए 18 वर्ष से कम आयु).
Marriage Registration से पहले प्राधिकारी को विश्वसनीय दस्तावेजी साक्ष्य के आधार पर दोनों पक्षों की उम्र की अनिवार्य रूप से पुष्टि करनी होगी.
यदि दस्तावेजों से पता चले कि कोई पक्ष निर्धारित उम्र से कम है, तो सामान्य Marriage Registration की बजाय मामला तुरंत संबंधित बाल विवाह निषेध अधिकारी और जिला प्रशासन को भेजा जाए.
राज्य सरकार ऑनलाइन Marriage Registration प्रणाली में ऐसा तंत्र विकसित करे, जो उम्र सत्यापन की आवश्यकता वाले आवेदनों को स्वतः चिह्नित कर सके.
स्टाम्प एवं निबंधन विभाग के प्रमुख सचिव सभी विवाह पंजीकरण प्राधिकारियों को बाल विवाह निषेध अधिनियम के कड़ाई से पालन हेतु आवश्यक निर्देश/एसओपी जारी करें.
अदालत ने स्पष्ट किया कि इन निर्देशों का यह अर्थ नहीं कि हर बाल विवाह को स्वतः शून्य माना जाएगा, क्योंकि इसके कानूनी परिणाम बाल विवाह निषेध अधिनियम की धारा 3 और 12 के तहत ही तय होंगे.
कोर्ट ने अक्टूबर 2024 में उत्तर प्रदेश के महानिरीक्षक निबंधन द्वारा जारी परिपत्र और शनिदेव बनाम उत्तर प्रदेश राज्य मामले में मई 2025 के आदेश के अनुपालन में जून 2025 के कार्यालय ज्ञापन का भी उल्लेख किया, जिनमें उम्र सत्यापन के लिए डिजिलॉकर, सीबीएसई/यूपी बोर्ड पोर्टल, जन्म प्रमाणपत्र, पासपोर्ट, ड्राइविंग लाइसेंस और पैन जैसे दस्तावेजों से सत्यापन के प्रावधान हैं.
अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के सीमा बनाम अश्वनी कुमार (2006) मामले का भी संदर्भ दिया, जिसमें Marriage Registration के साक्ष्यात्मक महत्व को रेखांकित किया गया था. प्रमुख सचिव, स्टाम्प एवं निबंधन विभाग को 30 सितंबर 2026 तक अनुपालन रिपोर्ट प्रस्तुत करने का निर्देश दिया गया है. मामले की अगली सुनवाई 5 अक्टूबर 2026 को होगी.