‘Divorce उसी दिन से लागू माना जाएगा जिस दिन पति तलाक का ऐलान करता है’
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा, Divorce की पुष्टि करने वाला कोर्ट का आदेश सिर्फ ऐलानिया प्रवृत्ति का होता है

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा है कि मोहम्मदिया कानून के तहत Divorce उसी तारीख से लागू होता है जिस दिन पति तलाक का ऐलान करता है. बाद में कोर्ट का आदेश जो Divorce की पुष्टि करता है, वह सिर्फ ऐलानिया प्रकृति का होता है. जस्टिस मदन पाल की सिंगल बेंच ने यह फैसला हुमायरा रियाज की पुनरीक्षण याचिका पर सुनाया है. बेंच ने कहा कि कोर्ट का ऐसा आदेश फैसले की तारीख से कोई नया Divorce नहीं बनाता बल्कि यह Divorce के ऐलान की मूल तारीख से जुड़ा माना जाता है.
यह आपराधिक पुनरीक्षण याचिका प्रधान न्यायाधीश फैमिली कोर्ट प्रयागराज द्वारा भरण-पोषण वाद संख्या 604/2020 (श्रीमती हुमैरा रियाज और अन्य बनाम मोहम्मद दाऊद) में धारा 125 Cr.P.C. के तहत पारित 27 मई 2025 के आदेश को चुनौती देते हुए दायर की गयी थी. इसमें पुनरीक्षणकर्ता/पत्नी द्वारा दायर भरण-पोषण के आवेदन को कोर्ट ने नामंजूर कर दिया था जबकि दो नाबालिग पुत्रों को भरण-पोषण प्रदान किये जाने का आदेश दिया गया था.
पुनरीक्षणकर्ता पत्नी की तरफ से उसका पक्ष रखते हुए उसके अधिवक्ता ने कोर्ट को बताया कि पुनरीक्षणकर्ता का पहला निकाह अब्दुल वहीद अंसारी के साथ 03 फरवरी 2002 को संपन्न हुआ था. वहीद अंसारी ने 27 फरवरी 2005 को ही ‘तलाक’ (Divorce) उच्चारित कर दिया था.
इसके बाद फैमिली कोर्ट के समक्ष घोषणात्मक वाद दायर किया गया और विवाह याचिका संख्या 06/2007 में 08 जनवरी 2013 को पारित डिक्री (आदेश) द्वार Divorce को वैध घोषित कर दिया गया. उक्त Divorce की वैधता को कोर्ट द्वारा धारा 482 Cr.P.C. के तहत की गई कार्यवाहियों में 11 मई 2023 के आदेश के माध्यम से संज्ञान में लिया गया. उक्त आदेश के विरुद्ध दायर विशेष अनुमति याचिका को सुप्रीम कोर्ट द्वारा 2023 में खारिज कर दिया गया.
अधिवक्ता ने तर्क दिया है कि इद्दत की अवधि पूरी करने के बाद याचिकाकर्ता ने 27 मई 2012 को दूसरी शादी मोहम्मद दाउद से की थी. इस शादी से दो बेटे पैदा हुए. दोनों पक्ष कई वर्षों तक पति-पत्नी के रूप में साथ रहे. अधिवक्ता ने तर्क दिया कि फैमिली कोर्ट ने दोनों पक्षों के बीच हुई शादी को अमान्य मानने में स्पष्ट त्रुटि की है.

विपक्षी मोहम्मद दाउद केंद्र सरकार का कर्मचारी है. उसने याचिकाकर्ता और उनके नाबालिग बेटों का भरण-पोषण करने की उपेक्षा की है. जिसके कारण याचिकाकर्ता को धारा 125 Cr.P.C. के तहत कार्यवाही शुरू करनी पड़ी. तर्क दिया गया कि यद्यपि पहले अंतरिम भरण-पोषण स्वीकृत किया गया था. इसे इस न्यायालय के साथ-साथ सुप्रीम कोर्ट ने भी सही ठहराया था, फिर भी फैमिली कोर्ट ने अंतिम आदेश पारित करते समय एक अत्यधिक तकनीकी आधार पर याचिकाकर्ता को भरण-पोषण देने से इनकार कर दिया.
पुनरीक्षणकर्ता के वकील ने कहा कि फैमिली कोर्ट ने भरण-पोषण के दावे को मुख्य रूप से इस आधार पर खारिज कर दिया है कि याचिकाकर्ता और विपक्षी पक्ष संख्या 2 के बीच निकाह की तारीख पर याचिकाकर्ता की उसके पहले पति के साथ शादी कानूनी रूप से भंग नहीं हुई थी इसलिए दूसरी शादी अमान्य थी. तर्क दिया गया है कि यह निष्कर्ष रिकॉर्ड पर उपलब्ध सामग्री के विपरीत है. उन्होंने सर्वोच्च न्यायालय के एन उषा रानी बनाम मूडुदुला श्रीनिवास (SLP (Crl.) No. 7660 of 2017 मामले में दिये गये फैसले पर भरोसा जताया.
यह तर्क देने के लिए कि किसी महिला को केवल विवाह (Divorce) की वैधता से संबंधित तकनीकी आपत्तियों के आधार पर भरण-पोषण से वंचित नहीं किया जा सकता. विशेष रूप से तब, जब पति ने जान-बूझकर विवाह किया हो और दोनों पक्ष पति-पत्नी के रूप में साथ रहे हों. उन्होंने कोर्ट से आग्रह किया कि विवादित आदेश को उस सीमा तक रद्द कर दिया जाए, जिस सीमा तक वह पुनरीक्षणकर्ता को भरण-पोषण देने से इनकार करता है.
पति की तरफ से पक्ष रखते हुए अधिवक्ता ने कहा कि श्रीमती हुमैरा रियाज का विवाह इससे पूर्व अब्दुल वहीद अंसारी के साथ हुआ था. यह विवाह तब तक जारी रहा जब तक कि Divorce याचिका संख्या 6/2007 में प्रयागराज स्थित परिवार न्यायालय द्वारा एक समझौते के आधार पर Divorce की डिक्री पारित नहीं कर दी गई.
उक्त विवाह के अस्तित्व में रहने के दौरान पुनरीक्षणकर्ता ने अपने पूर्व पति के विरुद्ध धारा 125 Cr.P.C. के तहत कार्यवाही भी संस्थित की थी, जिसके परिणामस्वरूप उन्हें प्रति माह की दर से भरण-पोषण प्रदान किया गया था. भरण-पोषण की वसूली हेतु एक निष्पादन वाद भी दायर किया गया था. इस महत्वपूर्ण तथ्य को छिपाते हुए और अपने पूर्व पति से वैध तलाक प्राप्त किए बिना पुनरीक्षणकर्ता ने विपक्षी संख्या 2 के साथ निकाह कर लिया. इससे विपक्षी पक्ष संख्या 2 के साथ किया गया कथित विवाह, मुस्लिम विधि के अंतर्गत ‘शून्य’ माना जाएगा.
मोहम्मदिया कानून के तहत, जब कोई पति Divorce देता है तो तलाक उसी तारीख से प्रभावी माना जाता है जिस तारीख को Divorce दिया गया हो
दोनों पक्षों के वकीलों की दलीलों पर विचार करने और रिकॉर्ड की जाँच करने के बाद कोर्ट ने पाया कि मोहम्मदिया कानून के तहत, जब कोई पति Divorce देता है तो तलाक उसी तारीख से प्रभावी माना जाता है जिस तारीख को Divorce दिया गया हो. यह भी तय है कि जहाँ कोई पति Divorce देता है और बाद में उसी के संबंध में कोई आदेश लेने के लिए कोर्ट जाता है, तो कोर्ट द्वारा पारित आदेश आमतौर पर केवल घोषणात्मक प्रकृति का होता है.
यह आदेश केवल उस तला की स्थिति को मान्यता देता है या उसकी पुष्टि करता है जो पहले ही हो चुका होता है. ऐसी परिस्थितियों में कोर्ट का आदेश फैसले की तारीख से कोई नया तलाक नहीं बनाता है बल्कि यह केवल यह घोषित करता है कि तलाक पहले ही वैध रूप से दिया जा चुका था.
बेंच ने कहा कि प्रस्तुत मामले में, ऐसा प्रतीत होता है कि पारिवारिक न्यायालय ने पुनरीक्षणकर्ता के भरण-पोषण के दावे को मुख्य रूप से इस आधार पर अस्वीकार कर दिया है कि Divorce की घोषणा करने वाली डिक्री बाद में पारित की गई थी इसलिए दूसरा विवाह शून्य था. फैमिली कोर्ट द्वारा अपनाया गया दृष्टिकोण उस स्थापित विधिक स्थिति के अनुरूप प्रतीत नहीं होता है कि ऐसे मामलों में डिक्री केवल घोषणात्मक होती है और उसका प्रभाव तलाक के उच्चारण की तिथि से ही माना जाता है.
कोर्ट ने माना कि इस मामले में फैमिली कोर्ट द्वारा पुनर्विचार किए जाने की आवश्यकता है. जिसमें कथित रूप से पहले उच्चारित Divorce के प्रभाव और घोषणात्मक कार्यवाहियों में पारित डिक्री की प्रकृति साथ ही अभिलेख पर उपलब्ध अन्य साक्ष्यों की उचित जाँच की जाए.
कोर्ट ने फैमिली कोर्ट द्वारा भरण-पोषण वाद संख्या 604/2020 में पारित आदेश क जिस हद तक वह पुनरीक्षणकर्ता/पत्नी से संबंधित है अपास्त कर दिया है और मामले को फैमिली कोर्ट प्रयागराज को वापस भेज दिया है ताकि वह दोनों पक्षों को सुनवाई का अवसर प्रदान करने के पश्चात् और ऊपर की गई टिप्पणियों को ध्यान में रखते हुए विधि के अनुसार पुनरीक्षणकर्ता के भरण-पोषण के दावे का विनिश्चय गुण-दोष के आधार पर नए सिरे से करे.