इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा, केस में Issues तय होने के 18 साल बाद शुरुआती मुद्दा नहीं उठा सकते

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि किसी मुकदमे में ट्रायल के दौरान मुद्दे (Issues) तय होने के 18 साल बाद कोई शुरुआती मुद्दा (Issues) नहीं उठाया जा सकता. कोर्ट ने यह भी कहा कि कानून से जुड़ा कोई भी ऐसा मुद्दा (Issues), जिसके निर्णय के लिए तथ्यों की जांच या निर्णय की आवश्यकता हो, उसे प्रारंभिक मुद्दा (Issues) नहीं माना जा सकता. इन सिद्धांतों को लागू करते हुए कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि केस में मुद्दों (Issues) को तय किए जाने के 18 साल बाद प्रारंभिक मुद्दों (Issues) पर निर्णय लेने के लिए आवेदन करना, याचिकाकर्ता के नेक इरादे को नहीं दर्शाता है.
कोर्ट ने कहा कि तथ्यों को परखने के बाद याचिकाकर्ता की प्रार्थना को स्वीकार करने का कोई कारण नहीं हो सकता. कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट को निर्देश दिया कि वह इस मुकदमे को शीघ्रता से निपटाएं. यह फैसला जस्टिस मनीष कुमार निगम की बेंच ने सुनाया है. बेंच ने कहा कि मुकदमे की स्वीकार्यता के संबंध में दलील पहली बार में ही लिखित बयान में उठाई जानी चाहिए. तभी ट्रायल कोर्ट ऐसी दलील पर ऑर्डर XIV नियम 2 CPC के तहत शुरुआती मुद्दे (Issues) के तौर पर उसके गुण-दोष के आधार पर फैसला दे सकता है.
केस के तथ्यों के अनुसार वादी-प्रतिवादियों ने 2006 में एक मुकदमा दायर किया. इसमें 21 मई 1988 को राम आसरे द्वारा प्रतिवादी के पक्ष में लिखी गई वसीयत रद्द करने की मांग की गई थी. ट्रायल कोर्ट ने 01 दिसंबर 2008 को मुद्दे तय कर दिये. कोर्ट में तय किये गये मुद्दे में 6 नंबर पर मेंशन था कि क्या यह मुकदमा उत्तर प्रदेश जमींदारी उन्मूलन एवं भूमि सुधार अधिनियम 1950 की धारा 331 के तहत वर्जित है.
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02 फरवरी 2025 को प्रतिवादी ने अर्जी दायर करके शुरुआती मुद्दे (Issues) उठाए गए. इसके बाद याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया और ट्रायल कोर्ट को यह निर्देश देने की मांग की कि वह पहले शुरुआती मुद्दों (Issues) और मुद्दा नंबर 3 और 6 पर फैसला दे. यह दलील दी गई कि सीपीसी के ऑर्डर XIV के नियम 2 के तहत ट्रायल कोर्ट के लिए यह अनिवार्य था कि वह अधिकार क्षेत्र या मुकदमे पर रोक से संबंधित शुरुआती मुद्दों (Issues) पर पहले फैसला दे.
कोर्ट ने पाया कि सीपीसी के ऑर्डर XIV का बिना संशोधन वाला नियम 2 यह प्रावधान करता था कि जहां किसी मामले में तथ्य और कानून दोनों से संबंधित मुद्दे (Issues) शामिल हों, लेकिन कोर्ट को लगे कि मामले का निपटारा केवल कानून से संबंधित मुद्दों (Issues) पर फैसला देकर किया जा सकता है तो कानून से संबंधित मुद्दों पर फैसला तथ्यों से संबंधित मुद्दों (Issues) पर फैसला देने से पहले किया जाना चाहिए.
CPC के संशोधित ऑर्डर XIV नियम 2(2) में यह प्रावधान है कि अधिकार क्षेत्र और किसी भी लागू कानून द्वारा मुकदमे पर लगाई गई रोक से संबंधित मुद्दों (Issues) पर पहले फैसला दिया जाना चाहिए. नियम 2(1) की शुरुआत ‘Notwithstanding’ (इसके बावजूद) शब्द से होती है.
ट्रायल कोर्ट तथ्यों और कानून से जुड़े मुद्दों (Issues) पर एक साथ प्रारंभिक मुद्दों के रूप में निर्णय नहीं दे सकती
इसमें यह प्रावधान है कि भले ही मामले का निपटारा शुरुआती मुद्दों (Issues) के आधार पर किया जा सकता हो, फिर भी ट्रायल कोर्ट सभी मुद्दों (Issues) पर अपना फैसला सुना सकता है. कोर्ट ने फैसला दिया कि जहां पहले का प्रावधान शुरुआती मुद्दों पर फैसला देना अनिवार्य बनाता था, वहीं संशोधित प्रावधान ट्रायल कोर्ट को सभी मुद्दों (Issues) पर एक साथ फैसला देने की अनुमति देता है.
अदालत ने यह माना कि नियमों में संशोधन होने के बावजूद, ट्रायल कोर्ट तथ्यों और कानून से जुड़े मुद्दों (Issues) पर एक साथ प्रारंभिक मुद्दों के रूप में निर्णय नहीं दे सकती.
“यह तय करते समय कि क्या अदालत को अधिकार क्षेत्र या मुकदमे में किसी रुकावट से जुड़े मुद्दे को प्रारंभिक मुद्दे के रूप में निपटाने की प्रार्थना स्वीकार करनी चाहिए या अस्वीकार, दो परस्पर विरोधी बातों के बीच संतुलन बनाए रखना चाहिए, वे हैं:
(i) मामलों को टुकड़ों में निपटाना उचित नहीं है, क्योंकि इससे मुकदमा लंबा खिंच सकता है, और
(ii) नियम 2 का विशिष्ट और उपयोगी प्रावधान, जिसे इस उद्देश्य से बनाया गया कि किसी विरोधी को तथ्यों की जांच किए बिना ही केवल कानून के किसी बिंदु पर मामले या उसके बड़े हिस्से को निपटाने का अवसर देकर उसे लंबे मुकदमे में घसीटे जाने से होने वाले अन्याय को रोका जा सके.”
बेंच ने कहा