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अफसर कानून के अनुसार ही काम करें, Court ने नहीं दिया देश निकाला का आदेश: हाई कोर्ट

अफसर कानून के अनुसार ही काम करें, Court नहीं दे सकती देश निकाला का आदेश: हाई कोर्ट

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि अफसरों को कानून के अनुसार ही काम करना होगा. Court किसी को देश निकाला का आदेश नहीं दे सकती हैं. इस कमेंट के साथ High Court ने फॉरेनर्स एक्ट, 1946 के तहत दोषी ठहराई गई एक महिला के संभावित देश निकाला से संबंधित Trial Court की टिप्पणी में दखल देने से इनकार कर दिया. Court ने कहा कि ट्रायल Court ने देश निकाला के लिए कोई अनिवार्य या बाध्यकारी निर्देश जारी नहीं किया था.

उसने केवल इस मामले को सक्षम अधिकारियों द्वारा कानून के अनुसार निपटाने के लिए छोड़ दिया था. यह आदेश जस्टिस अनिल कुमार X की बेंच ने रशीदा बेगम बनाम उत्तर प्रदेश राज्य की आपराधिक पुनरीक्षण संख्या 3479/2024 निस्तारित करते हुए दिया है.

फैसले में जस्टिस अनिल कुमार ने कहा कि “ट्रायल Court ने अधिकारियों को याचिकाकर्ता को म्यांमार निर्वासित करने के लिए कोई अनिवार्य निर्देश जारी नहीं किया है. Court  ने केवल यह निर्देश दिया है कि नियमों के अनुसार आवश्यक कार्रवाई की जाए. नियमों के अनुसार आगे बढ़ने का निर्देश ही यह दर्शाता है कि Court का इरादा याचिकाकर्ता के निर्वासन को मजबूर करने का नहीं था, बल्कि इसे केवल सक्षम अधिकारियों पर छोड़ दिया गया था कि वे लागू कानून के अनुसार कार्य करें.”

High Court में यह आपराधिक पुनरीक्षण याचिका महाराजगंज जनपद की राशिदा बेगम की तरफ से दाखिल किया गया था. उन्होंने कोर्ट में अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश महराजगंज द्वारा मई 2024 में दिए गए फैसले को चुनौती दी थी. विवादित फैसले में ट्रायल कोर्ट ने उसे फॉरेनर्स एक्ट, 1946 की धारा 14-A के तहत दोषी ठहराया था और उसे दो साल की कैद की सजा के साथ 10,000 रुपये का जुर्माना लगाया था. कोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि जुर्माना राशि का भुगतान न किये जाने पर आरोपित को दो महीने अतिरिक्त कारावास में रहना होगा.

Court ने आईपीसी की धारा 420, 467, 468 और 471 के आरोपों से बरी कर दिया था

कोर्ट ने उसे आईपीसी की धारा 420, 467, 468 और 471 के आरोपों से बरी कर दिया था. अपने फैसले में ट्रायल कोर्ट ने यह भी टिप्पणी भी मेंशन की थी कि महिला की सजा पूरी होने के बाद, लागू नियमों के अनुसार उसे म्यांमार भेजने के संबंध में कार्रवाई की जा सकती है. पुनरीक्षण याचिका में तर्क दिया गया था कि ट्रायल कोर्ट को देश निकाला के संबंध में कोई निर्देश जारी करने का अधिकार नहीं था. खासकर जब उसने दावा किया कि उसके पास वैध पहचान दस्तावेज हैं जो उसे एक भारतीय नागरिक साबित करते हैं.

स्टेट को रीप्रजेंट करने वाले अधिवक्ता ने याचिका का विरोध करते हुए कहा कि कोई अनिवार्य देश निकाला आदेश पारित नहीं किया गया है. ट्रायल कोर्ट ने इस मामले को अधिकारियों के विवेक पर छोड़ दिया था कि वे कानून के अनुसार कार्य करें इसलिए किसी हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं थी. कोर्ट ने सरकारी वकील की दलीलों से सहमति जताई और स्पष्ट किया कि विवादित आदेश में याचिकाकर्ता को अनिवार्य रूप से देश से निकालने का निर्देश नहीं दिया गया है.

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