Adult (18 Years) होने के बाद चाहे तो पति के साथ रहे, अभी संरक्षण गृह में रहेगी teenager
बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका पर हाई कोर्ट का फैसला, देवरिया की किशोरी के अधिकारों के संरक्षण के लिए कोर्ट ने दिये निर्देश

बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका के माध्यम से संरक्षण गृह से आजाद होने की गुहार लगाने आये प्रेमी युगल (teenager) को इलाहाबाद हाई कोर्ट से आंशिक राहत मिली है. कोर्ट ने किशोरी (teenager) को रिहा तो नहीं किया लेकिन उसकी रिहाई की तिथि जरूर तय कर दी. संरक्षण गृह में रहने के दौरान उसके स्वास्थ्य आदि की देखभाल की उचित व्यवस्था कोर्ट ने निर्देश के जरिए कर दी. कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया कि बालिग होने के बाद वह जिसके भी चाहे उसके साथ रहने के लिए स्वतंत्र होगी. इलाहाबाद हाई कोर्ट के जस्टिस जेजे मुनीर और संजीव कुमार की बेंच ने प्रकरण की सुनवाई की. यह फैसला जस्टिस जेजे मुनीर ने डिलीवर किया.
बंदी प्रत्यक्षीकरण की याचिका सन्नी कुमार और उनकी कथित पत्नी ‘ए’ द्वारा सन्नी कुमार के माध्यम से दायर की गयी थी. याचिका में मांग की गयी थी कि संरक्षण गृह में रखी गयी बंदी ‘ए’ (teenager) को कोर्ट के समक्ष पेश कराया जाय और उसे रिहा करने का आदेश दिया जाय. यह प्रकरण मूल रूप से देवरिया जनपद का है.
इस संबंध में गौरी बाजार थाने में सन्नी कुमार के खिलाफ 13.04.2024 को एफआईआर दर्ज की गई थी. उस पर नाबालिग किशोरी (teenager) को बहला फुसलाकर भगा ले जाने का आरोप लगाया गया था. इसके आधार पर पुलिस ने आईपीसी की धारा 363, 366, 376, 504, 506 और पाक्सो एक्ट की धारा 5(जे)(ii)/6 के तहत मुकदमा अपराध संख्या 158/2024 दर्ज किया था.
घटना 12.04.2024 को तड़के 1 बजे होना बताया गया. रिपोर्ट दर्ज करने के बाद पुलिस एक्टिव हुई और उसने आरोपितों को गिरफ्तार कर लिया. सन्नी को चालान करके जेल भेज दिया गया. किशोरी (teenager) ने खुद अपने परिजनों के साथ जाने से इंकार किया तो परिवारवालों ने भी उसे ठुकरा दिया. इसके चलते उसे संरक्षण गृह में रखा गया. बंदी को चिकित्सीय जाँच के लिए डॉक्टर के सामने पेश किया गया तो उसने आंतरिक जाँच कराने से इनकार कर दिया. बंदी ने डॉक्टर के सामने निम्नलिखित बातें कहीं:
“मैं अपने गाँव के लड़के सन्नी के साथ तरकुलहा मंदिर में दिनांक 20/1/2024 को शादी उसके बाद घर वापस आ गई. शादी को मेरे परिवार वाले नही माने तो मैं और सन्नी दिनांक 12/4/2024 को घर से राजस्थान चले गये और वहां पति-पत्नी के रूप में रहने लगे.”
उधर, सन्नी कुमार ने जमानत के लिए हाई कोर्ट का रुख किया. कोर्ट के आदेश पर मार्च 25 में उसे जमानत पर रिहा किया गया. कोर्ट में पेश किये गये तथ्यों के अनुसार सन्नी जमानत पर छूटने के बाद कथित पत्नी (teenager) से मिलने के लिए संरक्षण गृह पहुंचा था. यहां उसे पता चला कि बंदी ने 09.11.2024 को संरक्षण गृह में एक बच्चे को जन्म दिया. ऐसा कहा जाता है कि संरक्षण गृह के अधीक्षक ने बच्चे की उचित देखभाल नहीं की और 17.01.2025 को लापरवाही के कारण उसकी मृत्यु हो गई.

याचिका में दलील दी गई है कि बच्चा बीमार पड़ गया था और उसे बचाने के लिए कोई उचित इलाज उपलब्ध नहीं था. कोर्ट ने कहा कि ऐसी परिस्थितियों में जबकि बच्चे को वापस जीवित नहीं किया जा सकता है, बंदी, जो अपने बच्चे की शैशवावस्था में मृत्यु के कारण अवसाद की स्थिति में बताई जाती है, को अपने स्वास्थ्य और मनोवैज्ञानिक तथा भावनात्मक दोनों तरह की भलाई के बारे में अत्यधिक देखभाल और सतर्कता की आवश्यकता है.
कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि बंदी की आयु अब 15 वर्ष 7 माह और 13 दिन (teenager) है. उसे याचिकाकर्ताओं की मांग के अनुसार तत्काल रिहा नहीं किया जा सकता. इसका कारण यह है कि यदि हम बंदी को अभी रिहा करते हैं, तो नाबालिग (teenager) होने के कारण उसे किसी अभिभावक की अभिरक्षा में सौंपना होगा.
बंदी ने स्पष्ट रूप से अपनी इच्छा व्यक्त की है कि वह अपने माता-पिता के पास वापस नहीं जाना चाहती है और यह भी कहा है कि वह अपने पति, जो कि प्रथम याचिकाकर्ता है, के साथ रहना चाहती है.
कोर्ट ने कहा कि यदि हम बंदी (teenager) को अभी स्वतंत्र कर दें और उसे अपने पति के साथ जाने दें या वह स्वयं उसके पास चली जाए तो यह उसके शारीरिक संबंधों के लिए खुला होगा, जो उसके स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होने के अलावा, पति को POCSO अधिनियम और धारा 64 BNS के तहत नए अपराधों के लिए उत्तरदायी बनाएगा. ऐसा रास्ता चुनकर, हम स्वयं पक्षों को अनिवार्य रूप से ऐसे कार्य करने की अनुमति नहीं दे सकते जो कानून के तहत अपराध हैं.
सुनवाई के दौरान कोर्ट में उम्र निर्धारण को लेकर भी बहस हुई. इस पर दोनों पक्षों की ओर से तर्क रखे गये. फाइनली कोर्ट ने कहा कि किशोर न्याय अधिनियम 2015 लागू होने के बाद उम्र निर्धारण के लिए यदि किसी संस्था का प्रमाण उपलब्ध है तो किसी अन्य प्रमाण पर विचार करने की जरूरत नहीं है. इस संबंध में सुप्रीम कोर्ट के तमाम निर्णयों का हलावा भी दिया गया.
कोर्ट ने कहा कि जहां तक हिरासत में ली गई महिला (teenager) की सटीक जन्मतिथि का सवाल है, एक बार जब हमने पाया कि उसका स्कूल रिकॉर्ड त्रुटिहीन है, तो उसमें दर्ज जन्मतिथि को 2015 के अधिनियम की धारा 94(2)(i) के तहत स्वीकार करना होगा.
स्कूल प्रमाण पत्र में उसकी उम्र का दोषरहित रिकॉर्ड होने के कारण, इस न्यायालय के पास चिकित्सा साक्ष्य पर भरोसा करने का कोई अधिकार नहीं है जो 2015 के अधिनियम की धारा 94(2) के तहत उम्र के सबूत के रूप में वरीयता के क्रम में अंतिम स्थान पर आता है. इसलिए, डॉक्टर की राय जो भी हो, इस पर गौर नहीं किया जा सकता है. बता दें कि बंदी (teenager) को राजकीय बाल गृह (बालिका), निरधरिया, बलिया में रखा गया है.
कोर्ट ने बंदी (teenager) प्रत्यक्षीकरण याचिका को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए जारी किये निर्देश:-
- बंदी (teenager) को 13.03.2028 तक संरक्षण गृह में रखा जाएगा, इसके बाद नहीं. उक्त तिथि को, वह बिना शर्त रिहा हो जाएगी. इसके बाद वह सन्नी कुमार सहित किसी के भी साथ रहने के लिए स्वतंत्र होगी.
- सीएमओ देवरिया को एक सक्षम चिकित्सक को नामित करेंगे जो महीने में कम से कम एक बार संरक्षण गृह में बंदी (teenager) से मिलने जाएगा और उसके स्वास्थ्य की जांच करेगा. वह कॉल पर भी उपलब्ध रहेगा.
- जिला न्यायाधीश देवरिया एक वरिष्ठ महिला न्यायिक अधिकारी को नामित करेंगे जो महीने में एक बार बंदी (teenager) से मिलने और उसकी भावनात्मक भलाई सहित उसकी भलाई का पता लगाएगी.
- न्यायिक अधिकारी को संरक्षण गृह प्रशासन की ओर से कोई चूक नजर आती है तो वह इसे दूर करने के लिए आवश्यक कदम उठाएंगी. इस न्यायालय को एक रिपोर्ट दे सकती हैं, जिस पर यह मामला आदेश के लिए सूचीबद्ध किया जाएगा.
- संरक्षण गृह का प्रशासन, जहां बंदी (teenager) को रखा गया है, न्यायिक अधिकारी द्वारा बंदी के संबंध में दिए गए सभी निर्देशों से बाध्य होगा, जिसे संरक्षण गृह के अधीक्षक द्वारा लागू किया जाएगा.
- संरक्षण गृह के अधीक्षक की ओर से इन निर्देशों का पालन करने में कोई भी चूक, अधीक्षक को इस न्यायालय के प्रति व्यक्तिगत रूप से उत्तरदायी बनाएगी.