Notified Residential इलाके में नियमित नहीं किया जा सकता Illegal construction; 18 को पीडीए VC व्यक्तिगत रूप से मौजूद रहें

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने प्रयागराज सिटी के एक नोटिफाइड Residential इलाके में बड़े पैमाने पर हो रहे अवैध निर्माण पर कड़ी आपत्ति जताई है. कोर्ट ने इस बात पर गंभीर चिंता जताई कि प्रयागराज विकास प्राधिकरण बार-बार आश्वासन देने और कोर्ट के दखल के बावजूद अवैध निर्माण रोक नहीं रहा है. जस्टिस सरल श्रीवास्तव और जस्टिस सुधांशु चौहान की बेंच ने अधिकारियों को बिल्डिंग के उन सभी हिस्सों को तुरंत गिराने की अनुमति दी जो कंपाउंडेबल सीमाओं से परे थे और स्वीकृत योजना के विपरीत थे. कोर्ट ने चेतावनी दी कि विध्वंस पूरा करने में विफलता पर पीडीए के वर्तमान और पूर्व दोनों वाइस-चेयरमैन से व्यक्तिगत स्पष्टीकरण मांगा जाएगा, खासकर परिसर को अनाधिकृत रूप से डी-सील करने के संबंध में.
मामले को आगे की निगरानी के लिए सूचीबद्ध करते हुए कोर्ट ने पीडीए के वाइस-चेयरमैन को 18 दिसंबर 2025 को व्यक्तिगत रूप से कोर्ट में मौजूद रहने का निर्देश दिया है. केस की नेक्स्ट हियरिंग इसी डेट को होगी. बेसिकली यह मामला न्यू कटरा हाउसिंग स्कीम (Notified Residential) से जुड़ा हुआ है. यह 1930 के दशक में डेवलप की गयी Residential कॉलोनी है.
Residential कॉलोनी के बगल के प्लॉट के मालिकों ने PDA द्वारा मंजूर बिल्डिंग प्लान से कहीं ज्यादा निर्माण कर लिया
याचिकाकर्ता बादल चटर्जी जो उस इलाके का लंबे समय से रहने वाले हैं ने हाई कोर्ट में याचिका दायर कर आरोप लगाया कि Notified Residential कॉलोनी के बगल के प्लॉट के मालिकों ने प्रयागराज डेवलपमेंट अथॉरिटी द्वारा मंजूर बिल्डिंग प्लान से कहीं ज्यादा निर्माण कर लिया है. याचिकाकर्ता के अनुसार, अनिवार्य सेटबैक को पूरी तरह से नजरअंदाज किया गया.
बेसमेंट तय सीमा से ज्यादा बनाया गया और मंजूर नक्शे के खिलाफ अतिरिक्त मंजिलें बनाई गईं. तर्क दिया गया कि इस तरह के निर्माण से याचिकाकर्ता के पुराने घर की नींव को खतरा है और हवा और धूप पाने के उसके अधिकार में रुकावट आ रही है.

याचिकाकर्ता के वकील ने कोर्ट में दाखिल की गयी याचिका में बताया है कि प्रयागराज विकास प्राधिकरण ने मई 2025 में उल्लंघनों के लिए परिसर को सील कर दिया था. बाद में मालिकों में से एक द्वारा दायर एक हलफनामे के आधार पर संपत्ति को डी-सील कर दिया गया, जिसमें विचलन को हटाने और स्वीकृत योजना का सख्ती से पालन करने का वादा किया गया था. इस आश्वासन के बावजूद, कथित तौर पर निर्माण बिना किसी रुकावट के और कंपाउंडेबल सीमाओं से परे जारी रहा.
निजी प्रतिवादियों ने तर्क दिया कि याचिकाकर्ता केवल एक शिकायतकर्ता था जिसका कोई अधिकार नहीं था. मकान के स्वीकृत नक्शे से कोई भी विचलन पूरी तरह से पीडीए और प्लॉट मालिकों के बीच का मामला था. याचिकाकर्ता का कोई भी सुखाधिकार प्रभावित नहीं हुआ था.
वकीलों की तरफ से सुप्रीम कोर्ट के मिसाल पर भरोसा करते हुए तर्क दिया कि एक बार जब प्राधिकरण ने शिकायत का संज्ञान ले लिया था तो कोई तीसरा पक्ष विध्वंस का पीछा नहीं कर सकता था. पीडीए ने कोर्ट के सामने स्वीकार किया कि निर्माण वास्तव में स्वीकृत योजना के अनुसार नहीं था.
रिकॉर्ड की जांच करते हुए हाई कोर्ट ने बिल्डरों के बर्ताव और डेवलपमेंट अथॉरिटी की भूमिका दोनों पर कड़ी टिप्पणियां कीं. कोर्ट ने कहा कि उसे यह समझ नहीं आ रहा है कि किस अधिकार के तहत पीडीए ने पहले अवैध, गैर-कंपाउंडेबल निर्माण को हटाए बिना परिसर को डी-सील करने का आदेश दिया था. कोर्ट ने कहा कि प्रतिवादियों ने अथॉरिटी और खुद कोर्ट के सामने दिए गए वादों का बार-बार उल्लंघन करके कोर्ट के प्रति कोई सम्मान नहीं दिखाया. उनका बर्ताव निंदनीय और न्यायपालिका को गुमराह करने जैसा था.
कोर्ट ने कहा कि अवैध निर्माण जो पड़ोसी संपत्ति की हवा, धूप और संरचनात्मक सुरक्षा को प्रभावित करता है, वह प्रभावित निवासी के अधिकारों को स्पष्ट रूप से नुकसान पहुंचाता है. बेंच ने यह भी दर्ज किया कि ऐसे उल्लंघन “अधिकारियों की मिलीभगत के बिना” जारी नहीं रह सकते थे, जो PDA द्वारा प्रवर्तन में सिस्टम की कमियों को उजागर करता है.
Case No.: Writ – C No. – 38819 Of 2025; Badal Chatterjee V. State of U.P. And Others
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