चचेरी बहन से Rape के आरोपित की मौत की सजा उम्र कैद में तब्दील

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने चचेरी बहन के साथ Rape के आरोपित की मौत की सजा उम्रकैद में तब्दील कर दिया है. ट्रायल कोर्ट द्वारा लखनऊ बेंच के सामने दोषी की मौत की सजा को कन्फर्म करने के लिए किए गए रेफरेंस से एक कैपिटल केस सामने आया और दोषी ने अपनी सजा के खिलाफ अपील की. जस्टिस रजनीश कुमार और जस्टिस राजीव सिंह की डिवीजन बेंच ने कहा, मौजूदा मामले के फैक्ट्स को देखते हुए, जो सेक्शन 376 (Rape) और 302 आईपीसी के तहत अपराधों के संबंध में हालात के सबूतों पर आधारित है और दोषी/अपीलकर्ता घटना के समय लगभग 27 साल का था और उसका एक 3-4 साल का बच्चा था.
ट्रायल कोर्ट ने तथ्यों को परखने के बाद पाया कि प्रोबेशन ऑफिसर, जेल एडमिनिस्ट्रेशन और साइकोलॉजिस्ट की इवैल्यूएशन रिपोर्ट के बिना और दोषी/अपीलकर्ता की कोई क्रिमिनल हिस्ट्री नहीं है और इस बात का कोई सबूत नहीं है कि अपराध पहले से सोचे-समझे दिमाग से किया गया था.
इस कोर्ट का मानना है कि मौत की सजा को दोषी/अपीलकर्ता के जीवन तक बिना किसी छूट के उम्रकैद में बदला जा सकता है. बेंच ने कहा कि परिस्थितिजन्य साक्ष्य के आधार पर ऐसे मामले में, जिसमें अपराध भारतीय दंड संहिता, 1860 (आईपीसी) की धारा 376 (Rape) और आईपीसी की धारा 302 के तहत है. ‘दुर्लभतम’ साक्ष्यों के आधार पर मृत्युदंड दिया जा सकता है लेकिन आम तौर पर बिना किसी छूट के आजीवन कारावास दिया जा सकता है, जब तक कि मृत्युदंड अपरिहार्य न हो.
मामले के तथ्य अभियोजन पक्ष के मामले के अनुसार फरवरी 2020 में शिकायतकर्ता के गांव के एक व्यक्ति की बेटी की शादी थी जिसमें शिकायतकर्ता की पत्नी और उसकी साली बच्चों के साथ आई हुई थीं. शाम को शिकायतकर्ता का सगा भतीजा उसकी लगभग 5 माह की बेटी को खेलने के बहाने उसकी पत्नी से ले गया और चला गया.
काफी देर तक अपील करने वाला-दोषी अपनी बेटी के साथ वापस नहीं आया, इसलिए उसकी पत्नी ने उसे ढूंढा लेकिन वह नहीं मिली. काफी देर तक काफी ढूंढने के बाद पता चला कि उसकी बेटी मैरिज लॉन से कुछ दूरी पर एक खाली प्लॉट की झाड़ियों के बीच बेहोशी की हालत में पड़ी मिली है, जिसे ट्रॉमा सेंटर में भर्ती कराया गया, जहां उसकी बेटी की मौत हो गई थी.
Rape करने के बाद मार डाला
आरोप था कि अपील करने वाले ने शिकायत करने वाले की बेटी को किडनैप करने और उसके साथ गलत काम (Rape) करने के बाद मार डाला था. इसलिए, एक लिखित शिकायत दर्ज की गई थी. ट्रायल कोर्ट ने अपील करने वाले को IPC की धारा 376 (क) (ख) (Rape), 364, और 302 और प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रन फ्रॉम सेक्सुअल ऑफेंस एक्ट, 2012 (POCSO एक्ट) की धारा 6 के तहत दोषी ठहराया. उसे मौत की सजा सुनाई गई. इसलिए मामला हाई कोर्ट में था.

हाई कोर्ट ने वकील की दलीलें सुनने के बाद कहा कि प्रॉसिक्यूशन केस को हालात के सबूतों के आधार पर साबित करने में कामयाब रहा है और जैसा कि ऊपर बताया गया है, हालात की पूरी चेन बिना किसी शक के सिर्फ दोषी/अपील करने वाले के गुनाह की ओर इशारा करती है और लगभग पाँच महीने की नाबालिग लड़की के साथ रेप (Rape) का घिनौना जुर्म सिर्फ दोषी/अपील करने वाले ने ही किया था और उसके बाद उसे ऐसी हालत में डाल दिया गया, जिसकी वजह से उसे लगी चोटों की वजह से उसकी मौत हो गई.
कोर्ट का मानना था कि ट्रायल कोर्ट ने सही तरीके से और कानून के हिसाब से सबूतों और रिकॉर्ड में मौजूद चीजों के आधार पर अपील करने वाले को दोषी ठहराया और उसे सजा सुनाई. कोर्ट ने आगे कहा, इस कोर्ट को ट्रायल कोर्ट द्वारा रिकॉर्ड में मौजूद सबूतों और चीजों के आधार पर दर्ज की गई बातों में कोई गैर-कानूनी, गलती या गड़बड़ी नहीं मिली, जिससे इस कोर्ट को दखल देने की जरूरत पड़े.
कोर्ट ने कहा कि बढ़ाने वाले और कम करने वाले हालात से निपटने के लिए, कोर्ट मामलों में बताए गए फैक्ट्स पर विचार करने के लिए जांच करने के बाद मौत की सजा के बजाय उम्रकैद को प्राथमिकता दे सकता है. धारा 302, 364 और 376 (क)(ख) (Rape) आईपीसी और POCSO एक्ट, 2012 की धारा 6 के तहत सजा वाले अपराधों के लिए दोषी/अपीलकर्ता की सजा बरकरार रखी जाती है और धारा 364 आईपीसी के तहत उसे दी गई सजा कन्फर्म की जाती है.
धारा 302 आईपीसी और धारा 376 (क)(ख) (Rape) आईपीसी के तहत अपराधों के लिए दोषी/अपीलकर्ता को दी गई मौत की सजा को, धारा 6 POCSO एक्ट 2012 के साथ पढ़ने पर बिना किसी छूट के उसकी नैचुरल जिंदगी के लिए उम्रकैद में बदल दिया जाता है. हाई कोर्ट ने क्रिमिनल अपील को कुछ हद तक मंजूरी दे दी और मौत की सजा को बिना किसी छूट के नैचुरल लाइफ़ के लिए उम्रकैद में बदल दिया.
Case: Prem Chandra@Pappu Dixit V/s State of UP & Others
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