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Opposite Religion के बालिग जोड़े का बिना शादी किए लिव इन में अपनी मर्जी से रहना किसी कानून में अपराध नहीं, 12 याचिकाएं स्वीकार

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अपने महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि विपरीत धर्म (opposite religion ) के बालिग जोड़े का बिना शादी किए लिव इन में अपनी मर्जी से रहना किसी कानून में अपराध नहीं है. बेंच ने इस कमेंट के साथ यह भी एड किया कि हाई कोर्ट का काम यह नहीं है कि वह ट्रायल कोर्ट की तरह उस दशा का पता करे कि कोई अपराध हुआ है या नहीं, वह भी तब जबकि किसी ने एफआईआर या शिकायत दर्ज न करायी हो. यह आदेश जस्टिस विवेक कुमार सिंह की एकलपीठ ने नूरी व अन्य सहित 12 याचिकाओं को स्वीकार करते हुए दिया है.

Opposite Religion के बालिग जोड़े का बिना शादी किए लिव इन में अपनी मर्जी से रहना किसी कानून में अपराध नहीं, 12 याचिकाएं स्वीकार

कुल 12 महिलाओं में से सात मुस्लिम Religion हैं जो हिंदू Religion के साथ है तो पांच हिंदू Religion हैं जो मुस्लिम Religion पुरुष के साथ लिव इन रिलेशनशिप में रह रही है. कोर्ट ने कहा कोई शादी करे या न करे यह उसकी अपनी च्वाइस है. सहमति से दो बालिग जोड़े का सेक्स करना अपराध नहीं है. यदि उनके जीवन को खतरा है तो राज्य का दायित्व है कि वह उनकी सुरक्षा करे.

कोर्ट ने कहा बालिग नागरिकों को संविधान के अनुच्छेद 14, 15 व 21 के अंतर्गत समानता व जीवन स्वतंत्रता का मूल अधिकार प्राप्त है. उन्हें अपनी पसंद के व्यक्ति से शादी करने या न करने या बिना शादी किए लिव इन में रहने का संवैधानिक संरक्षण प्राप्त है. विपरीत Religion के बालिग का साथ रहना कोई अपराध नहीं है, उन्होंने साथ रहने का फैसला लिया है तो जीवन खतरे की आशंका पर उनकी सुरक्षा की मांग क्यों न स्वीकार की जाय.

कोर्ट ने कहा राज्य का संवैधानिक दायित्व है कि वह प्रत्येक नागरिक की जीवन सुरक्षा करे. दैहिक स्वतंत्रता को सुरक्षा लेने से वंचित नहीं किया जा सकता. संविधान किसी के साथ धर्म (Religion), जाति, लिंग आदि के आधार पर भेदभाव करने पर रोक लगाता है.

इस पर कोर्ट ने आदेश दिया है कि यदि याचियों को किसी से कोई नुकसान होता है तो वे अपनी शिकायत पुलिस अधिकारियों से करें और पुलिस मामले और उनकी उम्र की जांच करें और आरोपों में कोई सच्चाई मिलती है, तो वे उनके जीवन शरीर और आजादी की सुरक्षा के लिए कानून के अनुसार कार्रवाई करेंगे.

कोर्ट ने कहा अगर कोई उनकी मर्जी के खिलाफ या किसी धोखे, जबरदस्ती, लालच, गलत असर या गलत बयानी से उनका धर्म (Religion) बदलने की कोशिश करता है तो वे रिपोर्ट/शिकायत दर्ज करा सकते हैं. कोर्ट ने कहा कि यह निर्देश सभी संबंधित अधिकारियों के लिए जरूरी हैं और उनका सख्ती से पालन किया जाएगा. किंतु यह आदेश पुलिस अधिकारियों के सामने लंबित किसी भी जांच में रुकावट नहीं डालेगा.

याचियो ने धर्म (Religion) परिवर्तन प्रतिषेध कानून 2021के उपबंधो का पालन नहीं किया

सुनवाई के दौरान सरकार की तरफ से कहा गया कि याचियो ने धर्म (Religion) परिवर्तन प्रतिषेध कानून 2021के उपबंधो का पालन नहीं किया है. इनका ऐसा करना अवैध है. खतरे की आशंका निराधार है. इसलिए सुरक्षा नहीं दी जा सकती. किसी ने खतरे की शिकायत या एफआईआर नहीं की है. बिना धर्म (Religion) बदले लिव इन रिलेशनशिप में रहना कानून का उल्लघंन है. विद्वान अतिरिक्त मुख्य स्थायी वकील ने किरण रावत और अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य के मामले में इस न्यायालय की खंडपीठ के फैसले पर भरोसा किया.

सचिव गृह, लखनऊ और अन्य 2023 एससीसी ऑनलाइन एएलएल 323 में रिपोर्ट किए गए, यह तर्क देने के लिए कि एक मुसलमान (Religion) अपने व्यक्तिगत कानूनों के अनुसार लिव-इन रिलेशनशिप में नहीं रह सकता है.

उन्होंने आशा देवी और अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य के मामले में इस न्यायालय की खंडपीठ के फैसले पर भरोसा किया, जो रिट सी संख्या 18743/2020 में पारित किया गया था, और याचिका का विरोध किया. राज्य की तरफ से दिये गये इन तर्कों को कोर्ट ने मानने से इंकार कर दिया और कहा कि संविधान नागरिक की सुरक्षा का दायित्व राज्य पर डालता है.

बेंच ने कहा कि पारित किए जाने वाले प्रस्तावित आदेश के मद्देनजर, निजी प्रतिवादियों को नोटिस जारी करने की कोई आवश्यकता नहीं है और पार्टियों के लिए उपस्थित वकीलों की सहमति से याचिका का अंतिम रूप से निपटारा किया जा रहा है. पिटीशनर्स के अधिवक्ता ने कहा है कि वे बालिग हैं और लिव-इन रिलेशनशिप में रह रही हैं और इस खास बात पर यूपी राज्य के एडिशनल चीफ स्टैंडिंग वकील ने कोई आपत्ति नहीं जताई है.

यह भी कहा गया है कि सभी पिटीशन में कहा गया है कि पिटीशनर एक-दूसरे से प्यार करने लगे और उन्होंने लिव-इन रिलेशनशिप में रहने का फैसला किया. लेकिन, प्राइवेट रेस्पोंडेंट उनके शांतिपूर्ण जीवन में दखल दे रहे हैं. पिटीशनर ने पुलिस अधिकारियों से संपर्क किया लेकिन पुलिस अधिकारियों ने कोई कार्रवाई नहीं की इसलिए उन्होंने यह रिट पिटीशन दायर की हैं.

पिटीशनर के अधिवक्ता ने इस कोर्ट की को-ऑर्डिनेट बेंच द्वारा रजिया और अन्य बनाम स्टेट ऑफ यूपी और अन्य के मामले में दिए गए फैसले पर भरोसा जताया जो रिट-सी नंबर 27338/2023 में पास हुआ था.

इस फैसले में इस कोर्ट की को-ऑर्डिनेट बेंच ने अलग-अलग फैसलों पर भरोसा करते हुए उस कपल को सुरक्षा दी थी जो इंटरफेथ (Religion) लिव-इन रिलेशनशिप में रह रहे थे. कहा कि रजिया (ऊपर) के मामले में भी एक पार्टी धर्म (Religion)  से मुस्लिम थी और दूसरी पार्टी धर्म से हिंदू (Religion)  थी और वैसी ही स्थिति में कोर्ट ने रजिया के मामले में प्रोटेक्शन दिया है.

WRIT – C No. – 41127 of 2025;  Noori And Another V/s State Of U.P. And 4 Others

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