पूर्व Council की एनओसी के बगैर भी नया वकील जमानत पर कर सकता है बहस, CPC की धारा 303 तथा 41-डी के तहत अभियुक्त को अपनी पसंद के Council से प्रतिनिधित्व कराने का मूलभूत अधिकार

इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि किसी आपराधिक मामले में पुराने Council से एनओसी लेना कानूनी अनिवार्यता नहीं है. यदि नया Council अपने मुवक्किल द्वारा विधिवत अधिकृत है तो वह बिना एनओसी के भी जमानत याचिका प्रस्तुत कर सकता है. जस्टिस राजेश सिंह चौहान एवं जस्टिस अभयदेश कुमार चौधारी की बेंच ने यह टिप्पणी दहेज मृत्यु से संबंधित एक मामले की सुनवाई के दौरान की. इसमें अपीलकर्ता मनोरमा शुक्ला जिनकी अगस्त 2021 में अपर सत्र न्यायाधीश लखनऊ द्वारा आजीवन कारावास की सजा दी गई थी ने दूसरी जमानत याचिका दाखिल की थी.
अपीलकर्ता की ओर से वकील (Council) ज्योति राजपूत ने जो एक समाजसेवी संस्था से जुड़कर निःशुल्क कानूनी सहायता प्रदान कर रही थीं अदालत में प्रतिनिधित्व किया. उन्होंने जेल से निष्पादित और विधिवत सत्यापित वकालतनामे के आधार पर जमानत प्रार्थना पत्र दाखिल किया. अपीलकर्ता के पूर्व Council ने उन्हें एनओसी देने से मना कर दिया था.
कोर्ट ने प्रारंभिक रूप से कहा कि कोई भी गैर-सरकारी संस्था स्वयं पहल कर आपराधिक मामले में हस्तक्षेप नहीं कर सकती लेकिन ऐसे मामलों में पीड़ित अथवा जरूरतमंद व्यक्ति को प्रभावी कानूनी सहायता उपलब्ध कराने में सहयोग कर सकती है जैसा कि वर्तमान प्रकरण में किया गया.
पूर्व Council द्वारा एनओसी देना केवल सदाचार की प्रक्रिया है

एनओसी के विषय पर कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि पूर्व Council द्वारा एनओसी देना केवल सदाचार की प्रक्रिया है न कि कोई अधिकार या बाध्यता. विशेषकर आपराधिक मामलों में जहां व्यक्ति के जीवन और स्वतंत्रता का प्रश्न जुड़ा होता है. संविधान के अनुच्छेद 22(1) और दंड प्रक्रिया संहिता की धाराओं 303 तथा 41-डी के तहत अभियुक्त को अपनी पसंद के Council से प्रतिनिधित्व कराने का मूलभूत अधिकार प्राप्त है.
बेंच ने यह भी कहा कि दंड प्रक्रिया संहिता में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है, जो जमानत याचिका दाखिल करने के लिए वकालतनामे को अनिवार्य शर्त घोषित करता हो. हालांकि न्यायालय की प्रक्रिया के अनुसार किसी Council को अधिकृत किए जाने का प्रमाण आवश्यक होता है.
इस मामले में चूंकि वकील ज्योति राजपूत के पास अपीलकर्ता द्वारा निष्पादित तथा जेल प्रशासन द्वारा सत्यापित वकालतनामा मौजूद था, इसलिए कोर्ट ने एनओसी के अभाव को महत्वहीन मानते हुए मामले की मेरिट पर सुनवाई की.
कोर्ट ने इस तथ्य पर भी ध्यान दिया कि अपीलकर्ता जो मृतका की सास हैं, को प्रत्यक्षदर्शी साक्ष्य के अभाव में केवल अनुमान के आधार पर दोषी ठहराया गया था. सह-अभियुक्तों की अपीलें अभी सुनवाई के लिए तैयार नहीं हैं, जिससे मामला शीघ्र निपटने की संभावना नहीं है.
यह देखते हुए कि अपीलकर्ता 13 वर्षों से जेल में निरुद्ध हैं बेंच ने उनकी जमानत याचिका स्वीकार कर ली और आदेश दिया कि अपील लंबित रहने तक ट्रायल कोर्ट द्वारा लगाया गया पूरा जुर्माना स्थगित रहेगा.
मानवीय संवेदना के साथ न्यायालय ने निःस्वार्थ सेवा प्रदान करने वाली अधिवक्ता (Council) ज्योति राजपूत के प्रयासों की सराहना भी की. उन्हें एक प्रकार से न्याय मित्र Council के समान मानते हुए हाईकोर्ट विधिक सेवा समिति को निर्देश दिया गया कि 15 दिनों के भीतर उन्हें 11,000 रुपये मानदेय के रूप में प्रदान किए जाएँ. मुख्य अपील की सुनवाई जनवरी 2026 में निर्धारित की गई है.
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