‘CrPC धारा 300 के तहत ‘डबल जिओपार्डी’ का सिद्धांत Maintenance के आदेशों को लागू करने के मामले में लागू नहीं होता’
इलाहाबाद हाई कोर्ट का ट्रायल कोर्ट को आदेश, नया वसूली आदेश जारी करें, जरूरत पड़े को कुर्की की कार्रवाई करें

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है कि किसी व्यक्ति को उसकी पत्नी या बच्चों को Maintenance न देने के कारण सिविल जेल भेजने से उसकी आगे का मासिक Maintenance का बकाया चुकाने की कानूनी जिम्मेदारी खत्म नहीं हो जाती. जस्टिस प्रवीण कुमार गिरि की बेंच ने कहा कि सीआरपीसी की धारा 300 के तहत ‘डबल जिओपार्डी’ का सिद्धांत, घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम, 2005 के तहत Maintenance के आदेशों को लागू करने के मामले में लागू नहीं होता. क्योंकि Maintenance से जुड़ी कार्यवाही में न तो किसी को दोषी ठहराया जाता है और न ही बरी किया जाता है.
इसलिए सीआरपीसी की धारा 300 के तहत किसी दलील का हवाला देकर Maintenance की तय रकम को लागू करने से मना करना कानून के खिलाफ होगा. इस कमेंट के साथ हाईकोर्ट के जस्टिस प्रवीण कुमार गिरी की बेंच ने आदेश को रद्द कर दिया जिसमें कहा गया था कि बकाया Maintenance की रकम के बदले पति ने पहले ही 30 दिनों की जेल की सजा काट ली है. ट्रायल कोर्ट को निर्देश दिया कि वह बकाया राशि की वसूली के लिए नया आदेश जारी करे.
बेंच ने यह भी कहा है कि Maintenance की बकाया राशि में 6% की दर से साधारण बैंक ब्याज भी जोड़ दिया जाय. बेंच ने यह भी स्पष्ट कर दिया कि यदि पति द्वारा यह राशि जमा नहीं करायी जाती है तो ट्रायल कोर्ट उसकी सम्पत्ति कुर्क करने का आदेश दे सकती है. यह काउंट नहीं किया जायेगा कि Maintenance की राशि का भुगतान न करने के कारण पहले ही पति सिविल हिरासत में कुछ समय बिता चुका है.
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने यह आदेश मुरादाबाद की हसीना खातून की याचिका पर सुनवाई पूरी होने के बाद दिया है. हसीना खातून ने मुरादाबाद में सिविल जज (जूनियर डिवीजन)/फास्ट ट्रैक कोर्ट (महिलाओं के खिलाफ अपराध) द्वारा जनवरी 2023 में दिए गए एक आदेश को चुनौती दी थी. तथ्यों के अनुसार पति पत्नी के रिश्तों में दरार आ जाने के बाद दोनों अलग हो गये.
पत्नी के साथ उसका दिव्यांग बेटा भी था. पत्नी ने खुद के साथ दिव्यांग बेटे की देखरेख के लिए Maintenance की मांग करते हुए याचिका दाखिल की. सुनवाई पूरी होने के बाद 2019 में मजिस्ट्रेट ने याचिकाकर्ता के पति को आदेश दिया कि वह अपनी पत्नी और दिव्यांग बेटे दोनों को चार—चार हजार रुपये Maintenance के रूप में दे.
कोर्ट के आदेश का पति ने पूरी तरह से पालन नहीं किया. इसके चलते Maintenance के रूप में दी जाने वाली धनराशि का बकाया 2.64 लाख रुपये तक पहुंच गया. इसके बाद पत्नी ने Maintenance की बकाया राशि की वसूली के लिए कोर्ट में अर्जी दायर की. लोअर कोर्ट ने इस अर्जी को संज्ञान लिया और बकाया वसूली के लिए वारंट जारी किया.
लोअर कोर्ट के आदेश के बाद पति को 30 अक्टूबर 2022 को गिरफ्तार कर लिया गया क्योंकि उसने ट्रायल कोर्ट द्वारा तय की गई Maintenance की रकम जमा करने से इंकार कर दिया था. न्यायिक मजिस्ट्रेट ने उसे 30 दिन की सजा सुनायी तो उसे सिविल जेल भेज दिया गया.
Maintenance की रकम चुकाने में अनाकानी करता रहा
जेल से रिहा होने के बाद भी वह याचिकाकर्ता को Maintenance की रकम चुकाने में अनाकानी करता रहा. इसके बाद पत्नी ने एक और अर्जी दायर करके बकाया वसूली के लिए नया वारंट जारी करने की मांग की. कोर्ट ने इस बार 2,64,000 रुपये की वसूली के लिए दायर उसकी अर्जी को इस आधार पर खारिज किया गया कि उसके पति ने पहले ही उस बकाया रकम के बदले 30 दिनों की जेल की सजा काट ली थी.
पति ने तर्क दिया कि चूंकि उसने सजा के तौर पर तीस दिन की जेल काट ली है, इसलिए अब कोई बकाया नहीं बचा. अंत में पति ने सीआरपीसी की धारा 482 के तहत इस अर्जी की स्वीकार्यता को भी इस आधार पर चुनौती दी कि जिस आदेश को चुनौती दी गई, उसके खिलाफ डीपी एक्ट उत्पीड़न की धारा 29 के तहत अपील की जा सकती है. सिविल जज (जूनियर डिवीजन)/फास्ट ट्रैक कोर्ट (महिलाओं के खिलाफ अपराध) ने अपने फैसले में सीआरपीसी की धारा 300 का हवाला दिया जिसके तहत डबल जियोपार्डी के सिद्धांत का हवाला दिया गया था.
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अपने 42-पृष्ठ के आदेश में पत्नी की अर्जी पर सुनवाई कर रही बेंच ने शुरू में ही यह टिप्पणी की कि सीआरपीसी की धारा 300, डीपी एक्ट के तहत होने वाली कार्यवाही पर लागू नहीं होती क्योंकि इस कार्यवाही का नतीजा न तो दोषसिद्धि होता है और न ही दोषमुक्ति. बेंच ने कहा कि डीपी एक्ट के तहत तय की गई Maintenance की राशि को देने से इनकार करना और इसके लिए सीआरपीसी की धारा 300 के तहत दलील देना कानून के विपरीत प्रतीत होता है. साथ ही यह संबंधित न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वारा न्यायिक विवेक का इस्तेमाल न किए जाने का भी संकेत देता है.”
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बेंच ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले ‘रीना कुमारी बनाम दिनेश कुमार महतो’ का हवाला देते हुए यह स्पष्ट किया कि भले ही भरण-पोषण के आदेश का पालन न करने पर दंडात्मक परिणाम भुगतने पड़ते हों. फिर भी इस तरह की कार्यवाही को आपराधिक कार्यवाही नहीं माना जा सकता. कोर्ट ने आगे कहा कि किसी दोषी को केवल सिविल जेल भेजने भर से पीड़ित पत्नी को मासिक Maintenance की राशि देने की उसकी जिम्मेदारी खत्म नहीं हो जाती.
‘Maintenance वसूली से मिलने वाली रकम को प्रिंसिपल जज, फैमिली कोर्ट, मुरादाबाद, या जिला जज, मुरादाबाद या जिला मुरादाबाद के किसी अन्य संबंधित सिविल जज/मजिस्ट्रेट के कोर्ट के खाते में रखा जाएगा. इसका इस्तेमाल बकाया रकम के भुगतान के लिए किया जाएगा. इस बकाया रकम पर देरी से भुगतान के लिए 6% की दर से साधारण बैंक ब्याज भी लगेगा. आवेदक पत्नी और उसके दिव्यांग बेटे को मौजूदा मासिक भरण-पोषण की रकम नियमित रूप से देता रहेगा. उसके बाद कानून के अनुसार आगे की कार्रवाई की जाएगी.‘
बेंच ने अपने आदेश में कहा