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Legal Proceeding में बेवजह टालमटोल न्याय के लिए खतरनाक, 13 साल पुराने चेक बाउंस मामले में दखल देने से हाई कोर्ट का इनकार

Legal Proceeding में बेवजह टालमटोल न्याय की पवित्र खोज में ‘इन डाइम विवेरे इन लेगे संट डिटेस्टेबिलिस’ कहावत लंबे केस के लिए एक हमेशा की फटकार है. यह दिखाता है कि Legal Proceeding में बेवजह टालमटोल या टालमटोल करने के तरीके न्याय के लिए बुरे हैं. ऐसी देरी न केवल लोगों का भरोसा कम करती है बल्कि कानून को राहत देने के बजाय परेशानी का जरिया भी बना देती है. इस कमेंट के साथ इलाहाबाद हाई कोर्ट के जस्टिस सत्य वीर सिंह ने ब्रजेश कुमार बनाम उत्तर प्रदेश सरकार और अन्य में पास किये गये आदेश में दखल देने से इंकार कर दिया है.

Legal Proceeding में बेवजह टालमटोल न्याय के लिए खतरनाक, 13 साल पुराने चेक बाउंस मामले में दखल देने से हाई कोर्ट का इनकार

कोर्ट ने निर्देश दिया है कि मामले को कानून (Legal) के दायरे में त्वरित गति से निबटाया जाय जब तक कि किसी बड़ी अदालत द्वारा रोक न लगाई जाए. फैसले की एक कॉपी जरूरी पालन के लिए संबंधित डिस्ट्रिक्ट और सेशंस जज के सामने रखने का भी निर्देश दिया गया है.

हाई कोर्ट में यह एप्लीकेशन सेक्शन 528 बीएनएसएस 2023 के तहत फाइल की गई थी. इसमें रिक्वेस्ट की गई  कि 16 अक्टूबर 2025 को ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट कोर्ट नंबर 22 आजमगढ़ द्वारा केस नंबर 3817/2024 (आनंद कुमार बनाम ब्रजेश कुमार), सेक्शन 138 द नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट, 1881 थाना कोतवाली जनपद आजमगढ़ में पास किए गए फैसले और आदेश को रद्द किया जाय. कोर्ट से पूरी Legal Proceeding रद करने की भी मांग की जो उपर्युक्त ट्रायल कोर्ट में पेंडिंग है.

बता दें कि ट्रायल कोर्ट ने इस मामले में हैंडराइटिंग एक्सपर्ट की रिपोर्ट फाइल करने के लिए बचाव पक्ष के सबूतों को फिर से खोलने की आरोपी की अर्जी को खारिज कर दिया गया था. दोनों पक्षों के तर्कों को सुनने के बाद हाई कोर्ट ने पाया कि पहले ही काफी मौके दिए जा चुके थे और 18 अप्रैल 2023 को सैंपल सिग्नेचर मिलने के बाद भी आरोपी एक्सपर्ट सबूतों को ध्यान से आगे बढ़ाने में नाकाम रहा.

कोर्ट ने कहा कि शिकायत 01 फरवरी 2013 को शुरू की गई थी और Legal Proceeding के तहत आरोपी का बयान 30 जुलाई 2021 को सेक्शन 313 सीआरपीसी के तहत रिकॉर्ड किया गया था. बार-बार याद दिलाने और मौके देने के बावजूद आरोपी ने एक्सपर्ट रिपोर्ट को रिकॉर्ड पर लाने के लिए कोई असरदार कदम नहीं उठाया.

ट्रायल कोर्ट ने आखिरकार 18 अगस्त 2025 को बचाव पक्ष के सबूत बंद कर दिए और मौका फिर से खोलने के लिए 08 सितंबर 2025 को देर से फाइल की गई एप्लीकेशन को सही तरीके से खारिज कर दिया. कोर्ट ने Legal प्रोसेस में कोई गड़बड़ी न पाए जाने पर यह माना कि ट्रायल कोर्ट ने अपने अधिकार क्षेत्र में काम किया था.

बेंच ने नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट के सेक्शन 143 से 145 के पीछे Legal इरादे पर जोर देते हुए दोहराया कि चेक बाउंस के मामलों की जल्द से जल्द सुनवाई होनी चाहिए और उन्हें जल्द से जल्द निपटाया जाना चाहिए, बेहतर होगा कि फाइल करने के छह महीने के अंदर ही इसका निस्तारण कर दिया जाय.

कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइंस का जिक्र किया जिसमें एनआई एक्ट के सेक्शन 138 के तहत मामलों के तेजी से ट्रायल (2021) 16 SCC 116 और संजाबीज तारी बनाम किशोर एस. बोरकर और अन्य (क्रिमिनल अपील नंबर 1755 ऑफ 2010) शामिल हैं, जो बढ़ते पेंडिंग मामलों को सुलझाने और एनआई एक्ट के मामलों में Legal समरी प्रोसीजर का सख्ती से पालन पक्का करने के लिए जारी की गई थीं.

बेंच ने 2013 से लंबित चेक अनादर मामले में कार्यवाही को रद्द करने की मांग वाली अर्जी को खारिज कर दिया, यह देखते हुए कि इस तरह की लंबी लंबितता परक्राम्य लिखत अधिनियम, 1881 की धारा 138 के तहत सारांश परीक्षणों के उद्देश्य को पराजित करती है. यह देखते हुए कि शिकायत दर्ज किए जाने के लगभग 13 साल बीत चुके हैं, अदालत ने मामले को “अत्यधिक देरी का स्पष्ट उदाहरण” बताया और दोहराया कि इस तरह की शिथिलता न्याय के लिए घृणित है.

Legal रिकॉर्ड को देखने पर इस मामले में सेक्शन 138 एनआई एक्ट के तहत शिकायत 01 फरवरी 2013 को फाइल की गई थी

कोर्ट ने कहा कि ज्यादा देर करना भारत के संविधान के आर्टिकल 21 के तहत तेजी से ट्रायल की संवैधानिक गारंटी के खिलाफ है. जस्टिस सत्य वीर सिंह ने कहा कि एप्लीकेशन के सपोर्ट में फाइल किए गए एफिडेविट के साथ अटैच किए गए Legal रिकॉर्ड को देखने पर इस मामले में सेक्शन 138 एनआई एक्ट के तहत शिकायत 01 फरवरी 2013 को फाइल की गई थी और अब 2026 चल रहा है, यानी लगभग 13 साल बीत चुके हैं और मामला पेंडिंग है. इसे और डिले करने की इजाजत देना उचित नहीं है.

बेंच ने कहा, इस मामले में, विलियम शेक्सपियर के शब्द सच लगते हैं: ‘समय न टालें; देरी के खतरनाक नतीजे होते हैं’. ऐसी लंबी कानूनी कार्रवाई ‘न्याय में देरी न्याय न मिलना है’ इस कहावत को साफ तौर पर दिखाती है. इसके अलावा, ऐसी देरी संविधान के आर्टिकल 21 के तहत तेजी से ट्रायल के अधिकार के मूल तत्व के भी खिलाफ है.

“…यह एक मानी हुई बात है कि एनआई एक्ट के सेक्शन 138 के तहत एक शिकायत साल 2013 में फाइल की गई थी और तब से वह शिकायत पेंडिंग है. 12 साल से ज्यादा समय बीत चुका है, जिससे यह केस समरी ट्रायल के फैसले में बहुत ज्यादा देरी का एक साफ उदाहरण बन गया है. इतने लंबे समय तक पेंडिंग रहना समरी ट्रायल केस में कोर्ट के प्रोसेस का गलत इस्तेमाल है.”
बेंच ने कहा

APPLICATION U/S 528 BNSS No. – 50246 of 2025; Brijesh Kumar V/s State of U.P. and another
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