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नए Fact व अपराध विशिष्ट तो 2nd FIR पर कोई कानूनी प्रतिबंध नहीं

झांसा देकर फर्जी निवेश कराने वाले को HC से नहीं मिली राहत

नए Fact व अपराध विशिष्ट तो 2nd FIR पर कोई कानूनी प्रतिबंध नहीं

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा है कि यदि किसी मामले में नए तथ्य (Fact) व अवधि के आधार पर नए और विशिष्ट अपराधों का खुलासा होता है तो दूसरी एफआइआर दर्ज किए जाने पर कानूनी रूप से कोई प्रतिबंध नहीं है. दो जजों की बेंच ने दूसरी एफआईआर पर रोक का दायरा स्पष्ट करते हुए याचिकाकर्ताओं को कोई राहत देने से इंकार कर दिया है.

जस्टिस चंद्र धारी सिंह और जस्टिस लक्ष्मी कांत शुक्ला की बेंच ने कहा, टीटी एंटनी बनाम केरल राज्य, 2001 के मामले में सुप्रीम कोर्ट का फैसला एक ही लेन-देन या घटना के संबंध में दूसरी प्राथमिकी दर्ज करने पर रोक लगाता है, लेकिन यह किसी अलग घटना, किसी बड़ी साजिश या नए तथ्यों (Fact) के आधार पर दूसरी प्राथमिकी दर्ज करने पर रोक नहीं लगाता.

इन टिप्पणियों के साथ पीठ ने गाजियाबाद निवासी पारूल बुधराजा, योगेश राना, वेद बुधराजा तथा शील कालरा की वह याचिका खारिज कर दी, जिसमें जालसाजी और जाली दस्तावेजों का इस्तेमाल के आरोप में दर्ज प्राथमिकी रद करने की मांग की गई थी.

“समानता के नियम” को व्यावहारिक रूप से लागू किया जाना चाहिए और यदि बाद की प्राथमिकी का दायरा और उद्देश्य पिछली प्राथमिकी से अलग है तो दूसरी प्राथमिकी पर रोक नहीं लगती.”
कोर्ट ने कहा

दोनो अपराधों के Fact अलग अलग

कोर्ट ने दोनों शिकायतों का विश्लेषण करते हुए, पाया कि 2021 की प्राथमिकी 2019 में क्यूनेट में निवेश से संबंधित कथित प्रलोभन और धोखाधड़ी से संबंधित थी, जबकि 2024 की प्राथमिकी जुलाई 2019 और जून 2024 के बीच कथित रूप से किए गए जालसाजी, मनगढ़ंत और जाली दस्तावेजों के उपयोग के आरोपों पर आधारित थी.

कोर्ट ने कहा, “दोनों एफआइआर में पक्षों के बीच वित्तीय लेन-देन की समान पृष्ठभूमि का उल्लेख हो सकता है, लेकिन उनका दायरा, विषयवस्तु (Fact) और अवधि स्पष्ट रूप से भिन्न हैं. आईपीसी की धारा 467, 468 और 471 के तहत बाद वाली एफआईआर में आरोपित अपराध स्वतंत्र और स्वतःसिद्ध हैं और यह नहीं कहा जा सकता कि वे पहले की जांच का विषय (Fact) थे. अदालत ने माना कि दूसरी एफआइआर पर रोक केवल तभी लागू होती है जब दोनों एक ही घटना या लेन-देन से संबंधित हों और इस मामले में, समानता का परीक्षण पूरा नहीं हुआ.

कोर्ट ने कहा कि वर्तमान एफआईआर, सीआरपीसी की धारा 156(3) के तहत विद्वान मजिस्ट्रेट के आदेश के अनुसार उनके समक्ष प्रस्तुत सामग्री पर विचार करने के बाद दर्ज की गई थी.  मुकदमे से जुड़े तथ्यों के अनुसार ऋषभ अग्निहोत्री ने लिंक रोड थाना गाजियाबाद में एफआइआर दर्ज कराई थी. इसमें आरोप लगाया था कि योगेश राणा उर्फ योगी, वेद बुधराजा, साहिल कालरा, देवाशीष कोटनाला और प्रौल बुधराजा ऐसा सिंडिकेट चला रहे थे जो ऑनलाइन व्यावसायिक चैनलों के माध्यम से धोखाधड़ी और जालसाजी में लिप्त था.

वादी के अनुसार आरोपियों ने उसके भाई शुभम अग्निहोत्री को झूठा वादा कर साढ़े सात लाख रुपये निवेश कराया. इसी घटना को लेकर फर्जी हस्ताक्षर, मुहर व फर्जी नोटरी के दस्तावेज से गुमराह करने को लेकर पीड़ित ने एफआईआर दर्ज की. जिसे याचिका में चुनौती दी गई थी.

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