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Final Report से नहीं चलेगा काम, झूठी सूचना देने वाले पर BNSS की धारा 215(1)(a) के तहत शिकायत दर्ज कराएं

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने जारी किया ज्यूडिशियल ​मजिस्ट्रेट और डीजीपी के लिए निर्देश, केस दर्ज न कराने पर अफसरों पर होगी कार्रवाई

Final Report से नहीं चलेगा काम, झूठी सूचना देने वाले पर BNSS की धारा 215(1)(a) के तहत शिकायत दर्ज कराएं

यदि कोई जांच अधिकारी जांच करता है और अंततः पाता है कि कोई अपराध नहीं हुआ है, तो वह न केवल उत्तर प्रदेश पुलिस विनियमों के पैराग्राफ 122 के अनुसार Final Report प्रस्तुत करने के लिए बाध्य है, बल्कि वह पुलिस को झूठी जानकारी देने के लिए BNSS की धारा 215(1)(a) (संबंधित धारा 195(1)(a) Cr.PC) के तहत संज्ञान लेने के लिए एक लिखित शिकायत प्रस्तुत करने के लिए भी कर्तव्यबद्ध है. लिखित शिकायत के बिना Final Report दाखिल करने पर जांच अधिकारी, एसएचओ, सर्किल ऑफिसर और लोक अभियोजक BNSS की धारा 199(b) (संबंधित धारा 166A(b) IPC) के तहत उल्लिखित अपराध करने के लिए उत्तरदायी होंगे.

इस कमेंट के साथ इलाहाबाद हाई कोर्ट के जस्टिस प्रवीण कुमार गिरी ने न्यायिक मजिस्ट्रेट अलीगढ़ द्वारा पारित किये गये संज्ञान-सह-समन आदेश को रद्द कर दिया है. कोर्ट ने मामला ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट को वापस भेज दिया है, जो आरोपी को सुनवाई का मौका देने के बाद कानून के अनुसार और इस न्यायालय द्वारा की गई टिप्पणियों के अनुसार एक नया आदेश पारित करेंगे. यह कार्रवाई तीन महीने के भीतर की जाएगी.

यह याचिका 528 बीएनएसएस के तहत राहत की मांग में दाखिल की गयी थी. इसमें कोर्ट से आग्रह किया गया था कि वह सीजेएम अलीगढ़ द्वारा 23 अक्टूबर 2024 को दिये गये संज्ञान/समन आदेश को रद्द करे. साथ ही अलीगढ़ की अदालत में लंबित विविध केस नंबर 750/12//2024 (डॉ. महमूद आलम खान बनाम उम्मे फरवा और अन्य) की पूरी कार्यवाही जो केस क्राइम नंबर 1004/2023, सेक्शन 506, 507 IPC के तहत थाना क्वार्सी जनपद अलीगढ़ में दर्ज है को रद करे.

प्राथमिकी के अनुसार शिकायतकर्ता हन्यांग यूनिवर्सिटी, सियोल में रिसर्च प्रोफेसर के तौर पर काम कर रहा था. शिकायतकर्ता की पत्नी (आवेदक) कोरिया की चोंगजू यूनिवर्सिटी के रहने वाले अफजान खान के साथ लिव-इन-रिलेशनशिप में रह रही थी. शिकायतकर्ता को इस रिश्ते के बारे में पता चला तो उसने एक तरफ कोरिया पुलिस में शिकायत की और दूसरी तरफ अपनी पत्नी पर भी आपत्ति जताई. इसके बाद उसने शिकायतकर्ता से तलाक ले लिया और शरिया के अनुसार उनका रिश्ता खत्म हो गया.

अपने बड़े बच्चे के भविष्य और करियर को बचाने के लिए शिकायतकर्ता ने नौकरी छोड़ दी और 2021 में गार्जियंस एंड वार्ड्स एक्ट के तहत फैमिली कोर्ट अलीगढ़ में गार्जियनशिप के लिए एक केस दायर किया, जो अभी भी पेंडिंग है. FIR में यह भी आरोप है कि शिकायतकर्ता की पत्नी और उसका लिव-इन पार्टनर फेसबुक का इस्तेमाल करके उसे और उसकी बेटी को बदनाम कर रहे हैं. आरोपियों ने शिकायतकर्ता को धमकी दी है कि वह भारत न आए और न ही रहे, नहीं तो उसे खत्म कर दिया जाएगा.

पुलिस ने मामले की जांच की और आरोपों को झूठा पाते हुए 19 जून 2024 को Final Report लगा दी. Final Report का पता चलने के बाद पति ने प्रोटेस्ट पिटीशन दाखिल की. 23 अक्टूबर 2024 को अलीगढ़ के सीजेएम ने Final Report के खिलाफ प्रोटेस्ट पिटीशन स्वीकार करते हुए पुलिस की Final Report को खारिज कर दिया और धारा 190(1)(b) सीआरपीसी के तहत मामले का संज्ञान लेते हुए इसे स्टेट केस के रूप में चलाने का आदेश दिया.

याची (पत्नी) के वकील ने तर्क दिया कि वैवाहिक कलह के कारण याची को दुर्भावनापूर्ण तरीके से फंसाया गया है. चूंकि पुलिस ने Final Report लगा दी थी और कथित अपराध असंज्ञेय प्रकृति के थे, इसलिए मजिस्ट्रेट द्वारा इसे स्टेट केस के रूप में दर्ज करना कानूनन गलत था.

पुलिस अधिकारी द्वारा दी गई Final Report को परिवाद माना जाएगा और पुलिस अधिकारी को परिवादी समझा जाएगा

सरकारी वकील ने तर्क दिया कि मजिस्ट्रेट ने जांच के दौरान एकत्र किए गए सबूतों का सही मूल्यांकन किया है और आदेश में कोई अवैधता नहीं है. तथ्यों पर सुनवाई के बाद हाईकोर्ट ने पाया कि धारा 504 और 507 आईपीसी दोनों ही असंज्ञेय और जमानती अपराध हैं. सीआरपीसी की धारा 2(d) के स्पष्टीकरण (जो भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता – BNSS की धारा 2(1)(h) के समान है) का हवाला देते हुए कहा कि असंज्ञेय अपराध में पुलिस अधिकारी द्वारा दी गई Final Report को परिवाद माना जाएगा और पुलिस अधिकारी को परिवादी समझा जाएगा.

फैसले का सबसे महत्वपूर्ण पहलू फेक एफआईआर पर पुलिस की जवाबदेही तय करना रहा. कोर्ट ने कहा कि यदि विवेचक जांच के बाद यह पाता है कि आरोप झूठे थे और Final Report लगाता है तो उसे सूचना देने वाले के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता की धारा 212 और 217 के तहत लिखित शिकायत दर्ज करानी होगी. ऐसा न करने पर संबंधित पुलिस अधिकारियों के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता की धारा 199(b) के तहत कार्रवाई की जा सकती है.

कोर्ट ने स्टेट ऑफ पंजाब बनाम राज सिंह (1998) के सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि झूठी सूचना के अपराधों में कोर्ट बिना लोक सेवक की लिखित शिकायत के Final Report संज्ञान नहीं ले सकता, इसलिए पुलिस द्वारा शिकायत दर्ज करना अनिवार्य है. कोर्ट ने डीजीपी यूपी और न्यायिक अधिकारियों के लिए निर्देश भी दिये और कहा कि 60 दिन के भीतर इस पर अमल किया जाना चाहिए.

कोर्ट ने डीजीपी को दिये निर्देश

  • जब भी पुलिस किसी मामले में यह कहते हुए Final Report लगाती है कि आरोप झूठे या भ्रामक थे, तो पुलिस को अनिवार्य रूप से सूचना देने वाले और गवाहों के खिलाफ धारा 215(1) BNSS के तहत लिखित शिकायत दर्ज करानी होगी.
  • यदि प्रोटेस्ट पिटीशन दाखिल की जाती है, तो पुलिस की शिकायत पर कार्यवाही तब तक रुकी रहेगी जब तक प्रोटेस्ट पिटीशन पर निर्णय नहीं हो जाता.

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ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट को कोर्ट ने दिया निर्देश

  • कोर्ट ने सभी ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट को निर्देश दिया है कि वे अगर कथित आरोपी के पक्ष में Final Report सबमिट की जाती है तो पूरी केस डायरी को डॉक्यूमेंट्स और Final Report के साथ स्वीकार करेंगे, लेकिन ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट/कोर्ट इन्वेस्टिगेटिंग ऑफिसर/पुलिस को इन्फॉर्मेंट के साथ-साथ एफआईआर के गवाहों के खिलाफ सेक्शन 195(1)(a) Cr.P.C. (संबंधित सेक्शन 215(1)(a) BNSS) के तहत लिखित शिकायत सबमिट करने का भी निर्देश देंगे.
  • ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट/कोर्ट सबसे पहले पूरी केस डायरी और डॉक्यूमेंट्स की जांच करने के बाद अपराधों का संज्ञान लेते समय, अगर पहली नजर में कुछ और लगता है, तो इन्फॉर्मेंट से विरोध याचिका मंगवाएं और इन्फॉर्मेंट की सुनवाई के बाद, अगर उन्हें लगता है कि अपराध हुआ है, तो सेक्शन 190(1)(a) या 190(1)(b) सीआरपीसी (संबंधित सेक्शन 210(1)(a) या 210(1)(b) BNSS) के तहत संज्ञान लें और अगर कोई अपराध नहीं हुआ है, तो लिखित शिकायत पर आगे बढ़ें.
  • जो इन्वेस्टिगेटिंग ऑफिसर द्वारा सेक्शन 195(1)(a) Cr.P.C. (संबंधित सेक्शन 215(1)(a) BNSS) के तहत सेक्शन 177 और 182 IPC (संबंधित सेक्शन 212 और 217 BNS) के अपराध के संबंध में FIR के कथित आरोपी के खिलाफ गलत जानकारी देने के लिए पुलिस को अपनी कानूनी शक्ति का इस्तेमाल करके कथित आरोपी व्यक्तियों को नुकसान पहुंचाने के लिए सबमिट की गई है.

कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि बेंच द्वारा की गई टिप्पणी का अक्षरशः और भावना से पालन नहीं किया जाता है तो यह न्यायालय की अवमानना मानी जाएगी और पीड़ित व्यक्ति पुलिस अधिकारियों के साथ-साथ न्यायिक अधिकारियों के ऐसे अवमाननापूर्ण आचरण के खिलाफ उचित कार्रवाई के लिए इस न्यायालय से संपर्क कर सकता है. उपरोक्त टिप्पणियों और निर्देशों के साथ, सेक्शन 528 BNSS के तहत यह आवेदन निपटा दिया है. बता दें कि इस मामले में सुनवाई 28 नवंबर को पूरी होने के बाद कोर्ट ने फैसला सुरक्षित रख लिया था जो बुधवार 14 जनवरी को सुनाया गया.

APPLICATION U/S 528 BNSS No. 12575 of 2025; Umme Farva V/s State of U.P. and Another

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