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बर्खास्तगी गलत तो Employee बैंक से हर्जाने का दावा करने के लिए स्वतंत्र,  6 माह में नए सिरे से फैसला करने का आदेश

इंडसइंड बैंक के अफसर (Employee) को हाई कोर्ट से बड़ी राहत, ट्रायल कोर्ट प्रयागराज का आदेश रद

बर्खास्तगी गलत तो Employee बैंक से हर्जाने का दावा करने के लिए स्वतंत्र,  6 माह में नए सिरे से फैसला करने का आदेश

यह सच है कि सिविल कोर्ट बैंक कर्मचारी (Employee) को बर्खास्त किये जाने के मामले में स्थायी और अनिवार्य निषेधाज्ञा की कोई राहत नहीं दे सकता, लेकिन वादी यह दिखा सकता है कि प्रतिवादी बैंक द्वारा उसे (Employee) बर्खास्त करना गलत था और वह Employee बैंक से अपनी गलत बर्खास्तगी के लिए हर्जाने का दावा भी कर सकता है. यह सच है कि उसे प्रतिवादी बैंक की सेवा में बहाल नहीं किया जा सकता और उसका एकमात्र उपाय बैंक से हर्जाने का दावा करना है, जिसके लिए सिविल कोर्ट के पास अधिकार क्षेत्र है.

इसे देखते हुए, सिविल कोर्ट के पास तथ्यों की जांच करने और हर्जाने की राहत देने का अधिकार क्षेत्र था, ट्रायल कोर्ट ने यह नतीजा निकालकर गलती की है कि सिविल कोर्ट के पास इस मामले में अंतर्निहित अधिकार क्षेत्र की कमी थी. इस कमेंट के साथ इलाहाबाद हाई कोर्ट के जस्टिस संदीप जैन की बेंच ने बैंक कर्मी (Employee) पुनीत सचदेवा की अपील पूरे खर्च के साथ स्वीकार करते हुए ट्रायल कोर्ट के 10 जुलाई 2023 के विवादित निर्णय और डिक्री को रद्द कर दिया है.

कोर्ट ने O.S. संख्या 180/2015 को अपने मूल क्रमांक पर बहाल कर दिया है और कहा है कि ट्रायल कोर्ट के पास इस मुकदमे की सुनवाई करने का क्षेत्राधिकार है. हाई कोर्ट के जस्टिस ने ट्रायल कोर्ट को निर्देश दिया है कि वह छह महीने के भीतर गुण दोष के आदेश पर इस केस का निस्ता​रण करे.

यह अपील वादी पुनीत सचदेवा (Employee) द्वारा CPC की धारा 96 के तहत अतिरिक्त सिविल जज (सीनियर डिवीजन) इलाहाबाद द्वारा O.S. संख्या 180/2015 (पुनीत सचदेवा बनाम इंडसइंड बैंक और अन्य) में 10 जुलाई 2023 को पारित निर्णय और डिक्री के विरुद्ध दायर की गई थी. ट्रायल कोर्ट ने वाद इस आधार पर खारिज कर दिया था कि न्यायालय के पास इस वाद की सुनवाई करने और उस पर निर्णय देने का अंतर्निहित क्षेत्राधिकार नहीं है.

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वादी (Employee) ने प्रतिवादियों (जो कि इंडसइंड बैंक और उसके अधिकारी हैं) के विरुद्ध O.S. संख्या 180/2015 दायर किया. इसमें बताया गया था कि उसने 2008 में बैंक की बाराखंबा शाखा, नई दिल्ली में ‘सीनियर रिलेशनशिप मैनेजर’ के पद पर कार्यभार ग्रहण किया था.

लगन, समर्पण, कड़ी मेहनत, उत्कृष्ट प्रदर्शन और मूल्यांकन के आधार पर उसे ‘ब्रांच मैनेजर’ के पद पर पदोन्नत किया गया और जून 2011 में उसे प्रतिवादी बैंक की इलाहाबाद शाखा में स्थानांतरित कर दिया गया. यहां उसने 2013 तक कार्य किया. इस दौरान उसकी रेटिंग’बेहतरीन’ रही. इसके आधार पर उसने ‘डिप्टी मैनेजर’ के पद से ‘असिस्टेंट वाइस प्रेसिडेंट’ के पद तक पदोन्नति प्रदान की गयी.

याचिका में दिये गये तथ्यों के अनुसार वित्तीय वर्ष 2011-12 में शोभित श्रीवास्तव के खाते में 5 लाख की धोखाधड़ी का पता लगाने के लिए उसे (Employee) सराहना प्राप्त हुई थी और 5 लाख की बकाया राशि में से 3 लाख की वसूली भी की गई थी. ब्रांच मैनेजर के तौर पर वह कैश/चेक वगैरह के वितरण/प्राप्ति का काम नहीं देखते थे, बल्कि उन्हें रोजाना की उन रिपोर्टों के आधार पर 5 लाख या उससे ज़्यादा के लेन-देन की जाँच करनी होती थी जो स्टाफ उनके सामने पेश करता था.

उन्हें यह काम रेग्युलर वर्क के अलावा करना पड़ता था. ब्रांच मैनेजर के तौर पर उन्हें 5 लाख या उससे ज्यादा के उन वाउचरों पर काउंटर-हस्ताक्षर करने होते थे जिन पर शुरू में ऑपरेशन स्टाफ और मैनेजर – कस्टमर सर्विस एंड ऑपरेशंस (MCSOP) ने हस्ताक्षर किए होते थे.

इलाहाबाद स्थित प्रतिवादी बैंक के कैश ऑफिसर (Employee) सचिन यादव की मुख्य जिम्मेदारी कैश की प्राप्ति और भुगतान सुनिश्चित करना थी. बैंक की क्लियरिंग ऑफिसर अंबा लक्ष्मी इनवर्ड/आउटवर्ड क्लियरिंग,अन्य बैंकों के साथ खातों का मिलान आउटवर्ड चेकों को जमा करना, ECS क्रेडिट से संबंधित समस्त कार्य की प्रभारी थीं.

प्रतिवादी बैंक की रेमिटेंस अधिकारी (Employee) सुचित्रा प्रजापति की जिम्मेदारी ग्राहकों को डिमांड ड्राफ्ट और पे ऑर्डर जारी करना उन्हें दोबारा मान्य करना और रद्द करना, FD सस्पेंस खातों का रोजाना मिलान करना थी. हर ब्रांच में तिमाही आधार पर ब्रांच मॉनिटरिंग यूनिट ऑडिट किया जाता था. बैंक की इलाहाबाद ब्रांच का ऑडिट अनुराग चौधरी ने 2013 को किया था.

यह ऑडिट 27.8.2012 से 13.3.2013 की अवधि के लिए था. ऑडिट में कुछ टिप्पणियाँ की गई थीं जिन्हें रिपोर्ट जमा करने की प्रक्रिया के दौरान सुलझा लिया गया था. ऑडिट में किसी भी लापता वाउचर का कोई जिक्र नहीं था और न ही किसी भी धोखाधड़ी वाले लेन-देन का पता लगाया जा सका था.

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वादी (Employee) ने अपनी शिकायत में प्रासंगिक विवरणों का उल्लेख किया है ताकि यह बताया जा सके कि श्री नीरज वर्मा अपना काम ठीक से नहीं कर रहे थे यह बात बैंक के उच्च अधिकारियों की जानकारी में भी थी. वादी (Employee) ने यह भी कहा है कि श्रीमती सुचित्रा प्रजापति, जो श्री नीरज वर्मा को रिपोर्ट करती थीं, वह भी जान-बूझकर धोखाधड़ी वाले लेन-देन के वाउचर तैयार नहीं कर रही थीं और गलत POD दिखा रही थीं. नीरज वर्मा ने ट्रांसफर वाउचर VVU को तुरंत भेज दिए होते तो अनधिकृत लेन-देन के संबंध में हुई धोखाधड़ी का पता चल गया होता.

1.5.2013 को वादी को प्रतिवादी बैंक से एक ट्रांसफर ऑर्डर मिला, जिसमें बताया गया था कि उसका ट्रांसफर उसके गृह नगर दिल्ली में बैंक की नारायणा ब्रांच में कर दिया गया है. वादी ने 9.5.2013 को अपनी ब्रांच का चार्ज विश्वनीत खोसला को सौंप दिया. बाद में बैंक ने वादी को गुजरांवाला ब्रांच में जॉइन करने का निर्देश दिया, जिसका उसने पालन किया.

आगे यह भी कहा गया कि 1.5.2013 को वादी (Employee) को प्रतिवादी बैंक से एक ट्रांसफर ऑर्डर मिला, जिसमें बताया गया था कि उसका ट्रांसफर उसके गृह नगर दिल्ली में, प्रतिवादी बैंक की नारायणा ब्रांच में कर दिया गया है. वादी ने 9.5.2013 को अपनी ब्रांच का चार्ज श्री विश्वनीत खोसला को सौंप दिया, और वादी को 13.5.2013 को कार्यमुक्त कर दिया गया. बाद में, प्रतिवादी बैंक ने वादी को 18.5.2013 को गुजरांवाला ब्रांच में जॉइन करने का निर्देश दिया, जिसका उसने पालन किया.

वादी (Employee) का यह विशेष मामला है कि 30.5.2013 को उसे पता चला कि सुचित्रा प्रजापति ने आंतरिक खातों में धोखाधड़ी की है और कई ग्राहकों के खातों से पैसों का गबन किया है और बैंक की BMU टीम उसके द्वारा की गई धोखाधड़ी वाली एंट्रीज का पता लगा रही थी. वादी को यह भी बताया गया कि उसकी अधिकार सीमा से बाहर की धोखाधड़ी वाली एंट्रीज को नीरज वर्मा और विनीत गुप्ता की ID का उपयोग करके अधिकृत किया गया था.

सुचित्रा प्रजापति ने 41 लाख की धोखाधड़ी करने की बात स्वीकार की है, जिसमें से 17.77 लाख वादी के कार्यकाल के दौरान और शेष 23.23 लाख उसके उत्तराधिकारी के कार्यकाल के दौरान किए गए थे. वादी को यह भी बताया गया कि बैंक ने अधिकांश राशि वसूल कर ली है. इसके बाद सुचित्रा प्रजापति ने इस बात से इनकार कर दिया कि यह धोखाधड़ी उसके द्वारा की गई थी.

उसने प्रतिवादी बैंक के उन सभी अधिकारियों के खिलाफ पुलिस अधिकारियों और बैंक के उच्च अधिकारियों के पास यौन उत्पीड़न का मामला भी दर्ज कराया जिन्होंने उसे धोखाधड़ी की राशि वापस जमा करने के लिए मनाया था.

वादी का यह विशेष मामला है कि श्रीमती सुचित्रा प्रजापति द्वारा की गई धोखाधड़ी श्री नीरज वर्मा की घोर लापरवाही के कारण हुई थी, जिसका पता ब्रांच मॉनिटरिंग यूनिट के गौतम सिंह ने लगाया था. उन्होंने नीरज वर्मा के साथ मिलकर गुमशुदा वाउचरों के लिए लेन-देन की जाँच की थी. सुचित्रा प्रजापति द्वारा किए गए उपरोक्त धोखाधड़ी के कारण, बैंक ने उसे 30.9.2013 को निलंबित कर दिया था.

बैंक द्वारा इस धोखाधड़ी के संबंध में एक अनुशासनात्मक जाँच शुरू की गई थी, जिसमें सुचित्रा प्रजापति, नीरज वर्मा और वादी (Employee) को आरोप-पत्र दिया गया था. अनुशासनात्मक जाँच केवल सुचित्रा प्रजापति की ही की जा रही थी, जबकि, यह जाँच उन सभी कर्मचारियों के लिए की जानी चाहिए थी जिन्हें आरोप-पत्र दिया गया था.

वादी के अनुसार, यह बात अजीब थी कि एक ही अपराध के लिए अलग-अलग आरोप-पत्र जारी किए गए थे. वादी (Employee) का यह कहना है कि प्रतिवादी बैंक के उच्च अधिकारियों ने उसे सूचित किया था कि यह धोखाधड़ी सुचित्रा प्रजापति द्वारा की गई थी लेकिन इसे एक गंभीर कार्रवाई के रूप में दिखाने के लिए उन्होंने वादी (Employee) को भी थोड़े समय के लिए निलंबित कर दिया था.

2013 में बैंक ने सुचित्रा प्रजापति के खिलाफ 41 लाख की धोखाधड़ी करने के आरोप में FIR दर्ज कराई थी. इस FIR में वादी की संलिप्तता का किसी भी प्रकार से कोई उल्लेख नहीं था. यह मामला अभी भी जाँच के लिए लंबित है, और इसमें आज तक कोई आरोप-पत्र दाखिल नहीं किया गया है.

अनुशासनात्मक जाँच की रिपोर्ट के आधार पर वादी (Employee) को सेवामुक्त कर दिया गया

वादी (Employee) ने यह भी कहा कि 25.2.2014 को प्रतिवादी बैंक के मुंबई स्थित कॉर्पोरेट कार्यालय में उसके विरुद्ध दूसरी आंतरिक जाँच की गई, जिसे सचिन पांडे ने संचालित किया था. 19.5.2014 को अशोक नायर (प्रतिवादी बैंक के मानव संसाधन प्रमुख) द्वारा अनुशासनात्मक जाँच की रिपोर्ट के आधार पर वादी को सेवामुक्त कर दिया गया. वादी के अनुसार यह रिपोर्ट पूरी तरह से असंगत और अनुचित थी, क्योंकि उसके विरुद्ध कोई साक्ष्य मौजूद नहीं था.

वादी (Employee) के अनुसार, यह धोखाधड़ी सुचित्रा प्रजापति और नीरज वर्मा द्वारा की गई थी, परंतु उसे गलत तरीके से दंडित किया गया. अपीलीय प्राधिकारी ने 7.10.2014 को उसके विरुद्ध 2 अतिरिक्त आरोप जोड़े. वादी (Employee) का कहना था कि अपीलीय प्राधिकारी एक निष्पक्ष जाँच करने में विफल रहा, जिसने रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री की ठीक से जाँच नहीं की, और जिसने अवैध रूप से बैंक से उसकी सेवा समाप्ति के निर्णय को सही ठहराया.

वादी ने कहा कि अवैध सेवा समाप्ति के कारण उसे 26,49,663/- का नुकसान हुआ है जिसे पाने का वह हकदार है. इसके अलावा, वह प्रतिवादी बैंक और उसके अधिकारियों से 18% प्रति वर्ष की दर से ब्याज सहित 5 लाख की राशि पाने का भी हकदार है.

सभी प्रतिवादियों ने ट्रायल कोर्ट के समक्ष अपना संयुक्त लिखित बयान दाखिल किया, जिसमें वादी (Employee) के दावों का खंडन किया गया. इसमें कहा गया कि वादी (Employee) द्वारा माँगी गई राहत इस मूल मुकदमे में नहीं दी जा सकती, क्योंकि उसके द्वारा माँगी गई राहतों के लिए यह मुकदमा विचारणीय नहीं था.

वादी उस धोखाधड़ी के लिए सीधे तौर पर जिम्मेदार था जो उसकी शाखा में हुई थी. इस धोखाधड़ी के लिए उसके खिलाफ उचित अनुशासनात्मक कार्यवाही शुरू की गई थी,. और उसी के परिणामस्वरूप, वादी को बैंक की सेवा से सही तौर पर बर्खास्त कर दिया गया है.

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दोनों पक्षों के तर्कों को सुनने के बाद कोर्ट ने माना कि विवादित फैसले से यह साफ है कि ट्रायल कोर्ट ने ऑर्डर 39 रूल 2(2) CPC के ऊपर बताए गए प्रोविजो पर विचार किया है और यह नतीजा निकाला है कि सेवा समाप्त करने के आदेश के खिलाफ घोषणा और अनिवार्य निषेधाज्ञा की राहत, उत्तर प्रदेश राज्य में ऊपर बताए गए संशोधन अधिनियम द्वारा विशेष रूप से वर्जित है, इसलिए, ट्रायल कोर्ट के पास इस मुकदमे की सुनवाई करने का अधिकार क्षेत्र नहीं है.

कोर्ट ने कहा कि वाद-पत्र को पढ़ने से यह साफ है कि वादी (Employee) ने प्रतिवादियों से हर्जाने का दावा नहीं किया है बल्कि ब्याज सहित बकाया वेतन और रोजगार के सभी परिणामी लाभों का दावा किया है. ट्रायल कोर्ट के रिकॉर्ड को पढ़ने से यह साफ है कि वादी ने 28.7.2022 को ऑर्डर VI रूल 17 CPC के तहत एक संशोधन आवेदन 37-A दायर किया, जिसमें 19.5.2014 से लेकर मुकदमा दायर करने की तारीख तक, मुकदमे के दौरान और भविष्य में वसूली होने तक 5,000/- प्रति माह की दर से हर्जाने की डिक्री का दावा किया गया था.

इसके खिलाफ प्रतिवादियों द्वारा कोई आपत्ति दायर नहीं की गई. कोर्ट ने माना कि यह मामला 2023 में मुकदमा खारिज होने तक ट्रायल कोर्ट द्वारा बिना निपटाए ही पड़ा रहा जो ट्रायल कोर्ट की लापरवाही को दर्शाता है.

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इसके अलावा, यह भी साफ है कि विशिष्ट राहत अधिनियम, 1963 की धारा 40 के तहत वादी निषेधाज्ञा के बदले में या उसके अतिरिक्त हमेशा हर्जाने की मांग कर सकता है और ऐसा संशोधन अदालत द्वारा कार्यवाही के किसी भी चरण में स्वीकार किया जा सकता है. इन कारणों से ट्रायल कोर्ट द्वारा पारित विवादित निर्णय और डिक्री त्रुटिपूर्ण और विधिक रूप से अस्थिर है, जिसे अपास्त किया जाना उचित है. परिणामस्वरूप, यह अपील खर्चे सहित स्वीकार किए जाने योग्य है.

बेंच ने ट्रायल कोर्ट को निर्देश दिया है कि वह इस मुकदमे का निर्णय इस आदेश की प्रमाणित प्रति प्राप्त होने की तारीख से 6 (छह) महीने की अवधि के भीतर करे और ऐसा करते समय किसी भी पक्ष को अनावश्यक स्थगन न दे. कानून के अनुसार मामले के गुण-दोष के आधार पर निर्णय करे.

यह स्पष्ट किया जाता है कि इस न्यायालय ने प्रतिवादी बैंक द्वारा वादी (Employee) की बर्खास्तगी की वैधता के संबंध में कोई राय व्यक्त नहीं की है. ट्रायल कोर्ट को यह स्वतंत्रता है कि वह कानून के अनुसार, अभिलेख पर उपलब्ध अभिवचनों और साक्ष्यों के आधार पर किसी न्यायसंगत निष्कर्ष पर पहुँचे. कार्यालय को निर्देश दिया जाता है कि वह ट्रायल कोर्ट का अभिलेख तत्काल वापस भेज दे.

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