MV Act, 1988 के तहत Claim case में Compensation का आकलन करते समय मृतक को मिल रहे सभी भत्तों पर विचार किया जाना चाहिए: हाई कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट द्वारा अपने फैसलों में दी गयी इस व्यवस्था को स्वीकार करते हुए इलाहाबाद हाई कोर्ट ने मृतक के परिवार के सदस्यों को दी जाने वाली Compensation की राशि बढ़ाने की याचिका मंजूर कर ली है और उस पर याचिक दाखिल करने की तारीख से सात फीसदी की दर से ब्याज भुगतान करने का भी आदेश दिया है.
यह फैसला जस्टिस संदीप जैन ने सुनाते हुए याचिकाकर्ता को 34,67,222 रुपये के कुल मुआवजे का हकदार माना है. कोर्ट ने कहा है कि इस धनराशि का भुगतान दोषी बस के बीमाकर्ता को करना होगा. कोर्ट ने बीमा कंपनी को छूट दी है कि यदि उसने पहले कोई राशि भुगतान की है तो वह उसे समायोजित कर सकती है.
मोटर वाहन अधिनियम, 1988 की धारा 173 के तहत Compensation में वृद्धि के लिए यह अपील दावेदारों द्वारा मोटर दुर्घटना दावा न्यायाधिकरण/अतिरिक्त जिला न्यायाधीश गोरखपुर द्वारा लक्ष्मण प्रसाद मिश्रा और अन्य बनाम बृजेश सिंह और अन्य में 31 अक्टूबर 2017 के फैसले और अवार्ड के खिलाफ दायर की गई थी. दुर्घटना 02 मई 2013 को हुई थी. इसमें श्रीमती कुसुमलता मिश्रा की मृत्यु हो गयी थी.
अपीलकर्ताओं के वकील ने ने तर्क दिया कि मृतक कुसुमलत्ता मिश्रा हाटा, जिला कुशीनगर में महिला एवं बाल कल्याण विभाग में सुपरवाइजर के रूप में कार्यरत थीं. उन्हें प्रति माह 40,156 रुपये वेतन मिल रहा था. दुर्घटना के समय मृतक की उम्र 58 साल थी, लेकिन ट्रिब्यूनल ने मृतक के भविष्य की संभावनाओं के लिए कोई Compensation नहीं दिया, जबकि यूपी मोटर वाहन अधिनियम 1998 के नियम 220-A के अनुसार दावेदार 20% की दर से Compensation पाने के हकदार थे.
याची के अधिवक्ता ने तर्क दिया कि ट्रिब्यूनल ने Compensation का आकलन करते समय मृतक को दिए जाने वाले मकान किराया भत्ता और परिवार नियोजन भत्ते पर अवैध रूप से विचार नहीं किया. मृतक की कुल सैलरी 4,81,872 रुपये प्रति वर्ष थी.
उसमें इनकम टैक्स एक्ट 1961 की धारा 80-C के तहत 1,00,000 रुपये की छूट का दावा करने के बाद, 18,800 रुपये का इनकम टैक्स देना था, जिसे ट्रिब्यूनल को मुआवजे का आकलन करते समय घटाना चाहिए था, लेकिन ट्रिब्यूनल ने मृतक द्वारा देय इनकम टैक्स के रूप में 21,543/- रुपये की राशि काट ली जो ज्यादा थी. इन दलीलों के साथ यह प्रार्थना की गई कि अपीलकर्ताओं द्वारा दायर अपील को स्वीकार किया जाए और उन्हें बढ़ा हुआ मुआवजा (Compensation) दिया जाए.
प्रतिवादी-बीमा कंपनी के वकील ने कहा कि ट्रिब्यूनल ने दावेदारों को भविष्य की संभावनाओं के लिए Compensation देने के पहलू पर विचार किया है. यह निष्कर्ष निकाला है कि चूंकि मृतक के पति को 23,632 रुपये प्रति माह पारिवारिक पेंशन मिल रही थी और मृतक के बेटे को भी अनुकंपा नियुक्ति की पेशकश की गई थी.
भविष्य की संभावनाओं के लिए कोई Compensation देने से इनकार कर दिया

इस आधार पर ट्रिब्यूनल ने मृतक की भविष्य की संभावनाओं के लिए कोई Compensation देने से इनकार कर दिया, जो पूरी तरह उचित था और इस न्यायालय के अपीलीय क्षेत्राधिकार के प्रयोग में किसी हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है. इन दलीलों के साथ, यह प्रार्थना की गई कि दावेदारों द्वारा दायर अपील को खारिज कर दिया जाए.
कोर्ट ने नेशनल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड बनाम इंदिरा श्रीवास्तव और अन्य (2008) 2 SCC 763 के मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर गौर किया जिसमें स्पष्ट किया गया है कि मृतक को उसके एम्प्लॉयर द्वारा पर्क्स के तौर पर दी गई रकम को उसकी मासिक आय की गणना में शामिल किया जाना चाहिए.
यह परिवार के लिए योगदान के तौर पर उसकी मासिक आय में जोड़ी जाती, न कि उसके अपने फायदे के लिए. आय की उस रकम में से, उस पर लगने वाला कानूनी टैक्स घटाया जाना चाहिए. यह भी कहा गया कि नेट इनकम का आम तौर पर मतलब ग्रॉस इनकम में से कानूनी कटौतियां घटाना होगा.
सुप्रीम कोर्ट ने श्यामवती शर्मा और अन्य बनाम करम सिंह और अन्य (2010) 12 SCC 378 और मनस्वी जैन बनाम दिल्ली ट्रांसपोर्ट कॉर्पोरेशन लिमिटेड और अन्य (2014) 13 SCC 22 (3 जजों द्वारा) के मामले में यह माना है कि मृतक की आय तय करते समय, सैलरी सर्टिफिकेट में GPF, जीवन बीमा प्रीमियम, लोन चुकाने आदि के लिए दिखाए गए किसी भी डिडक्शन को आय से बाहर नहीं किया जाना चाहिए. मृतक की नेट आय तक पहुँचने के लिए केवल इनकम टैक्स/सरचार्ज की कटौती पर ही विचार किया जाना चाहिए.
कोर्ट ने माना कि मृतक का सकल मासिक वेतन 40,156 रुपये था जिसे ट्रिब्यूनल ने भी स्वीकार किया था. ट्रिब्यूनल ने मकान किराया भत्ता के लिए 11,040 रुपये और परिवार नियोजन भत्ता के लिए 5,400 रुपये की राशि काट ली और उसके बाद मृतक की वार्षिक आय आंकी. उक्त राशि में से, इनकम टैक्स के लिए अतिरिक्त राशि काट ली गई. ट्रिब्यूनल ने इस कटौती के बाद बचने वाली आय को शुद्ध वार्षिक आय माना, जो गलत है.
यह स्पष्ट है कि Compensation का आकलन करते समय मृतक को मकान किराया भत्ता और परिवार नियोजन भत्ता के रूप में दी जा रही कोई भी राशि नहीं काटी जा सकती थी. मृतक की सर्विस बुक में दर्ज जन्मतिथि के अनुसार, दुर्घटना के समय वह लगभग 58 साल की थी और Compensation का आकलन करने के लिए 9 का मल्टीप्लायर लगाया जाना था, लेकिन ट्रिब्यूनल ने 4 का मल्टीप्लायर लगाकर Compensation का आकलन किया है, जिसमें बढ़ोतरी की जरूरत है. ट्रिब्यूनल ने Compensation की अपर्याप्त राशि दी है जिसमें बढ़ोतरी की जानी चाहिए.
कोर्ट ने कहा
यह कानून अच्छी तरह से स्थापित है कि Compensation की राशि से बीमा या पेंशन लाभ या ग्रेच्युटी या मृतक के किसी रिश्तेदार को रोजगार देने के कारण कोई कटौती नहीं की जा सकती है. ये सभी राशियाँ मृतक ने दूसरों के साथ किए गए संविदात्मक संबंधों के कारण अर्जित की थीं. यह नहीं कहा जा सकता कि ये राशियाँ मृतक के आश्रितों या कानूनी वारिसों को मोटर वाहन दुर्घटना में उसकी मृत्यु के कारण मिलीं.
दावेदार/आश्रित मोटर वाहन दुर्घटना में मृतक की मृत्यु के परिणामस्वरूप मोटर वाहन अधिनियम के तहत “उचित मुआवजे के हकदार हैं. स्वाभाविक परिणाम यह है कि मृतक की संपत्ति या उसके आश्रितों को किसी अनुबंध या कार्य के परिणामस्वरूप जो लाभ मिलता है, जो मृतक ने अपने जीवनकाल में किया था, उसे मृतक की मृत्यु का परिणाम नहीं कहा जा सकता, भले ही ये राशियाँ उसकी मृत्यु के बाद ही आश्रितों के हाथों में जाएँ.
सेबेस्टियानी लकड़ा और अन्य बनाम नेशनल इंश्योरेंस कंपनी लि. और अन्य, (2019) 17 SCC 465, में सुप्रीम कोर्ट के 3 जजों द्वारा दी गयी व्यवस्था
पेंशन और ग्रेच्युटी की रकम मृतक द्वारा अपने एम्प्लॉयर को दी गई सर्विस के बदले में दी जाती है. अब यह सर्विस ज्यूरिस्प्रूडेंस का एक स्थापित सिद्धांत है कि पेंशन और ग्रेच्युटी मृतक की संपत्ति होती है. ये ज्यादातर रुके हुए वेतन की तरह होती हैं. मृतक कर्मचारी पूरी जिंदगी इस उम्मीद में काम करता है कि रिटायरमेंट पर उसे पेंशन और ग्रेच्युटी के तौर पर अच्छी-खासी रकम मिलेगी. ये रकम मौत होने पर भी देय होती है, चाहे मौत का कारण कुछ भी हो. इसलिए, इन्हीं सिद्धांतों को लागू करते हुए, उक्त रकम काटी नहीं जा सकती.
कोर्ट ने कहा
कटौती का आदेश केवल तभी दिया जा सकता है जब गलत काम करने वाला कोर्ट को यह साबित कर दे कि यह रकम दावेदारों को केवल मोटर वाहन दुर्घटना में मृतक की मौत के कारण मिली है.