‘POSH Act की धारा 9 के तहत शिकायतों को बिना किसी विशिष्ट विचार-विमर्श के प्रारंभिक स्तर पर ही खारिज नहीं किया जा सकता’
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने HCRI के प्रोफेसर के खिलाफ कार्रवाई को रद किया, आठ सप्ताह में नये सिरे से फैसला लेने का आदेश

POSH Act के तहत शिकायतों को बिना किसी विशिष्ट विचार-विमर्श के प्रारंभिक स्तर पर ही खारिज नहीं किया जा सकता. लेकिन यह तथ्य भी स्पष्ट होना जरूरी है कि शिकायतें कब की गयी थीं और किसने की थी. इस कमेंट के साथ इलाहाबाद हाई कोर्ट के जस्टिस सौरभ श्याम शमशेरी की बेंच ने हरीश चंद्र अनुसंधान संस्थान, इलाहाबाद एस्ट्रोफिजिक्स के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. तापस के. दास को बड़ी राहत दे दी है. बेंच ने उन्हें प्रतिकूल प्रविष्टि दिये जाने और इसे उनकी पर्सनल फाइल में इंट्री दर्ज करने के आदेश को रद कर दिया है.
कोर्ट ने ‘आंतरिक शिकायत समिति’को निर्देश दिया है कि वह सभी शिकायतों पर नए सिरे से विचार करे. इसमें आरोपों की समय-सीमा, शिकायतों की विशिष्ट तारीखें तथा शिकायतकर्ताओं द्वारा शिकायत दर्ज करने में हुई देरी के संबंध में प्रस्तुत किए गए स्पष्टीकरण जैसे विवरणों को आधार बनाया जाए. सभी पहलुओं पर विचार करने के उपरांत ‘आंतरिक शिकायत समिति’एक नया निर्णय लेगी कि शिकायतों को प्रारंभिक स्तर पर ही खारिज किया जाना है अथवा उन पर आगे की कार्यवाही की जानी है. इस मुद्दे पर लिया गया निर्णय तर्कसंगत एवं सुविचारित होना चाहिए.
कोर्ट ने अपने फैसले में यह भी कहा है कि इस चरण पर याचिकाकर्ता का जांच प्रक्रिया में प्रत्यक्ष रूप से शामिल होना अनिवार्य नहीं है. जांच प्रक्रिया में शामिल होने का उसका अधिकार केवल तभी प्रभावी होग जब उपर्युक्त निर्णय के आधार पर आंतरिक जांच समिति द्वारा POSH Act एवं उसके अंतर्गत निर्मित नियमों के प्रावधानों के अनुरूप जांच प्रक्रिया को आगे बढ़ाया जाए. शिकायत पर आगे की कार्यवाही की जाए अथवा नहीं इस संबंध में अंतिम निर्णय आठ सप्ताह में लेना होगा. इस कमेंट के साथ कोर्ट ने याचिका को निस्तारित कर दिया है.
यह याचिका एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. तापस के. दास जो एस्ट्रोफिजिक्स के एसोसिएट प्रोफेसर हैं की तरफ से दाखिल की गयी थी. डॉ दास गणित और सैद्धांतिक भौतिकी में अनुसंधान कार्य करते हैं. वह एस्ट्रोफिजिक्स के इंटरनेशनल लेवल के प्रतिष्ठित वैज्ञानिक हैं जो ‘ब्लैक होल’ और ‘एनालॉग ग्रेविटी’ के एक्सपर्ट हैं. उनके अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिष्ठित वैज्ञानिक पत्रिकाओं में साठ से अधिक शोध पत्र प्रकाशित हो चुके हैं.
याचिकाकर्ता को एचसीआरआईकी ‘आंतरिक शिकायत समिति’ द्वारा शुरू की गई एक जांच का सामना करना पड़ा था. इस समिति का गठन ‘कार्यस्थल पर महिलाओं का यौन उत्पीड़न (रोकथाम, निषेध और निवारण) अधिनियम, 2013’ (“POSH Act) के तहत किया गया था. यह जांच इसलिए शुरू की गई थी क्योंकि उन छात्राओं द्वारा कई शिकायतें दर्ज कराई गई थीं जिन्होंने याचिकाकर्ता के मार्गदर्शन में अपनी पीएचडी की पढ़ाई की थी.
रिकॉर्ड के अनुसार जांच की कार्यवाही के दौरान याचिकाकर्ता के खिलाफ कुछ और शिकायतें भी प्राप्त हुईं. ये शिकायतें कार्यस्थल पर याचिकाकर्ता द्वारा किए गए यौन उत्पीड़न (POSH Act) से संबंधित थीं, जिनमें शारीरिक संपर्क बनाने, अनुचित प्रस्ताव रखने और यौन-संकेतक टिप्पणियां करने जैसे आरोप शामिल थे. नोटिस जारी होने पर जांच कमेटी से याचिकाकर्ता ने विभिन्न दस्तावेजों की मांग की थी, जिनमें शिकायतों की प्रतियां भी शामिल थीं.
इसके साथ ही उन्होंने शिकायतकर्ताओं की मौखिक जांच और उनसे जिरह करने की अनुमति भी मांगी थी. शिकायतों की गंभीरता और POSH Act की धारा 9 के तहत शिकायतों का संज्ञान लेने के लिए निर्धारित समय-सीमा की अनदेखी करते हुए इंटरनल जांच कमेटी ने जांच पूरी की और याचिकाकर्ता को दोषी ठहराया.
POSH Act की धारा 9 के तहत शिकायतों का संज्ञान लेने के लिए निर्धारित समय-सीमा की अनदेखी करते हुए इंटरनल जांच कमेटी ने जांच पूरी की और ने पाया कि:
- कुल 10 महिलाओं ने डॉ. तापस के. दास के खिलाफ यौन उत्पीड़न या दुर्व्यवहार की शिकायत की.
- 3 शिकायतें गंभीर प्रकृति की मिलीं इनमें से एक के पास दस्तावेजी सबूत भी था. बाकी दोनों के पास अन्य छात्रों का समर्थन है.
- सभी महिलाएं कम उम्र की थीं जिन्हें आसानी से बहकाया, धमकाया और डराया जा सकता था. जिनके पास अपने करियर को लेकर डरने के कई कारण थे इसलिए उन्होंने डॉ. दास के खिलाफ शिकायत करने में समय लिया.
- गंभीर प्रकृति की अधिकांश घटनाएं उनके बंद दरवाजों वाले दफ्तर के अंदर और देर रात में हुईं.
महिला शिकायत निवारण प्रकोष्ठ के साथ अपनी बैठक में डॉ. दास ने स्वीकार किया था कि उन्होंने शिकायत करने वाली महिलाओं में से एक को अश्लील/कामुक सामग्री का लिंक वाला एक ईमेल भेजा था. बाद में अपने लिखित जवाब में डॉ. दास ने इस बात से इनकार कर दिया.
लेकिन चूंकि डॉ. दास ने 20 जुलाई 2016 को समिति के साथ अपनी बैठक में इस लिंक को भेजने की बात स्वीकार की थी और चूंकि उन्होंने खुद उस प्राप्तकर्ता का नाम बताया था जिसे उन्होंने यह लिंक भेजा था और उनके द्वारा बताया गया नाम उस शिकायतकर्ता के नाम से मेल खाता था, इसलिए समिति इस निष्कर्ष पर पहुंची कि डॉ. दास अपने लिखित जवाब में झूठ बोल रहे हैं.
महिला शिकायत निवारण प्रकोष्ठ (Women Grievances’ Cell) ने की सिफारिश:
- संस्थान डॉ. तापस के. दास की एक वर्ष की वेतन वृद्धि रोक दे. इसका उल्लेख उनकी सेवा पुस्तिका में किया जाना चाहिए. उनका पदोन्नति वर्ष 2020 तक रोक दिया जाए.
- डॉ. तापस के. दास को 6 महीने की अवधि के लिए निलंबित किया जाए या एचसीआरआई के नियमों के अनुसार उन्हें इसके समकक्ष कोई अन्य दंड दिया जाए.
- डॉ. दास को महिला छात्रों को ‘विजिटिंग स्टूडेंट’, पीएचडी छात्र या ‘पोस्ट-डॉक्टोरल फेलो’ के रूप में रखने से प्रतिबंधित किया जाए.
- डॉ. दास को संस्थान की उन सभी समितियों से हटा दिया जाए, जिनके माध्यम से उनका किसी भी युवा छात्र के साथ संपर्क हो सकता है.
- डॉ. दास को ऐसे कार्यालय में स्थानांतरित किया जाए जो या तो खुला हो अथवा यदि बंद हो तो उसके चारों ओर कांच लगा हो ताकि उनके कार्यालय के भीतर का दृश्य बाहर से स्पष्ट रूप से दिखाई दे सके.
- डॉ. दास के लिए ‘जेंडर सेंसिटाइजेशन प्रोग्राम’ में भाग लेना अनिवार्य किया जाए.
- इसके बाद यह मामला संस्थान की काउंसिल के सामने रखा गया और याचिकाकर्ता के जवाब पर विचार करने के बाद ‘निंदा’ की सजा दी गई और यह निर्देश दिया गया कि याचिकाकर्ता किसी भी महिला छात्रा को अपने साथ काम पर नहीं रख सकता.
“कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न (रोकथाम, निषेध और निवारण अधिनियम 2013) POSH Act ऐसा अधिनियम है जो कार्यस्थल पर महिलाओं के यौन उत्पीड़न के खिलाफ सुरक्षा प्रदान करता है और यौन उत्पीड़न की शिकायतों की रोकथाम और निवारण के लिए बनाया गया है. यौन उत्पीड़न के परिणामस्वरूप भारत के संविधान के अनुच्छेद 14 और 15 के तहत समानता के लिए एक महिला के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन होता है साथ ही संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत उसके जीवन के अधिकार और गरिमा के साथ जीने के अधिकार का भी उल्लंघन होता है.
गवर्निंग काउंसिल का आदेश
इसी आदेश को रिट याचिका में चुनौती दी गयी थी. याचिकाकर्ता के वकील ने अपना पक्ष रखते हुए तर्क दिया कि POSH Act एक विशेष अधिनियम है. इसलिए, इसके प्रावधानों का अक्षरशः और उसकी मूल भावना के अनुरूप सख्ती से पालन किया जाना चाहिए. POSH Act की धारा 9 यौन उत्पीड़न की शिकायत के संबंध में यह प्रावधान करती है कि कोई भी पीड़ित महिला कार्यस्थल पर हुए यौन उत्पीड़न की लिखित शिकायत घटना की तारीख से तीन महीने की अवधि के भीतर और यदि घटनाओं की एक श्रृंखला हुई हो तो अंतिम घटना की तारीख से तीन महीने की अवधि के भीतर, आंतरिक शिकायत समिति को कर सकती है.
वर्तमान मामले में, यह स्वीकार्य है कि शिकायतें उक्त अवधि समाप्त होने के बाद यानी छह महीने से अधिक समय बीत जाने के बाद दायर की गई थीं और इस देरी को माफ़ करने का कोई उचित कारण भी मौजूद नहीं था. POSH Act की धारा 9 के तहत निर्धारित limitation period का संज्ञान जांच कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में भी लिया था.
रिपोर्ट में माना गया था कि यद्यपि घटनाओं की सूचना तीन या छह महीने के भीतर नहीं दी गई थी, फिर भी यह विचार करते हुए कि याचिकाकर्ता के खिलाफ की गई शिकायतें अत्यंत गंभीर और multiple प्रकृति की थीं जांच समिति ने उन शिकायतों पर विचार करने का निर्णय लिया. अधिवक्ता के अनुसार POSH Act के तहत ऐसी कोई स्वतंत्रता या विशेष अधिनियम में निर्धारित समय-सीमा के विस्तार का कोई प्रावधान नहीं है. उन्होंने इस न्यायालय द्वारा ‘X बनाम निर्मल कांति चक्रवर्ती और अन्य’ (2025 SCC OnLine SC 1964) मामले में पारित निर्णय पर भरोसा जताया.
कोर्ट में शिकायकतकर्ताओं की तरफ से दी गयी शिकायतें जो बिना नाम की थी को अपने फैसले में कोट किया और कहा कि शिकायतों की विषय-वस्तु गंभीर प्रकृति की है और यह POSH Act की धारा 2(n) में दी गई “यौन उत्पीड़न” की परिभाषा के दायरे में आती है. इसी के आधार पर कोर्ट ने प्रकरण की दोबारा जांच करके आठ सप्ताह में फैसला लेने का आदेश दिया.