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Post Sanctioned और कार्य की प्रकृति स्थायी है, तो कर्मचारियों को अर्से तक दैनिक वेतन भोगी बनाए रखना असंवैधानिक

28 वर्षों से टेलीफोन लाइनमैन के पद पर काम कर रहे कर्मचारियों के नियमितीकरण मामले में हाई कोर्ट ने बीएचयू, यूजीसी से मांगा जवाब

Post Sanctioned और कार्य की प्रकृति स्थायी है, तो कर्मचारियों को अर्से तक दैनिक वेतन भोगी बनाए रखना असंवैधानिक

जब Post Sanctioned हैं और कार्य की प्रकृति स्थायी है, तो कर्मचारियों को अर्से तक दैनिक वेतन भोगी बनाए रखना असंवैधानिक है. इलाहाबाद हाई कोर्ट ने काशी हिंदू विश्वविद्यालय वाराणसी में 28 वर्षों से ‘टेलीफोन लाइनमैन’ के रूप में कार्यरत कर्मचारियों के Sanctioned Post पर नियमितीकरण की मांग में दाखिल याचिका पर केंद्र सरकार, विश्वविद्यालय अनुदान आयोग व बीएचयू से  जवाब मांगा है. जस्टिस सौरभ श्याम शमशेरी की एकलपीठ ने राम सिंह उर्फ शमशेर सिंह तथा अन्य की याचिका पर यह आदेश दिया.

याची के अधिवक्ता का कहना था कि  कर्मचारी स्वीकृत पद पर वर्ष 1998 से निरंतर विश्वविद्यालय में अपनी सेवा दे रहे हैं. इस लंबे कार्यकाल के दौरान उनका रिकॉर्ड ‘निष्कलंक’ रहा है और विश्वविद्यालय ने स्वयं उनकी कार्यकुशलता को “अति उत्तम” प्रमाणित किया है. वर्ष 2004 में विश्वविद्यालय की ‘टेलीकम्युनिकेशन सर्विसेज कमेटी’ ने इन कर्मचारियों को Sanctioned Post पर नियमित करने का प्रस्ताव पारित किया था, जिसे तत्कालीन कुलपति ने 16 अक्टूबर 2004 को स्वीकृति भी दे दी थी.

स्वीकृत पद पर नियमित करने का प्रस्ताव पर अगस्त 2005 में इस संबंध में अधिसूचना भी जारी की गई, लेकिन उसे कभी लागू नहीं किया गया. कहा गया कि केंद्रीय विश्वविद्यालय होने के नाते बीएचयू को ‘आदर्श नियोक्ता’ होना चाहिए था, लेकिन वह पिछले 28 वर्षों से कर्मचारियों को ‘आर्टिफिशियल ब्रेक’ देकर संविदा पर काम करा रहा है, जो सीधे तौर पर शोषण है.

रजिस्ट्रार ने Sanctioned Post पर नियमितीकरण की मांग 18 सितंबर 2025 को पारित आदेश में खारिज कर दी

रजिस्ट्रार ने Sanctioned Post पर नियमितीकरण की मांग 18 सितंबर 2025 को पारित आदेश में खारिज कर दी है, इसे सुप्रीम कोर्ट के जग्गो बनाम यूनियन आफ इंडिया (2025) और भोला नाथ बनाम झारखंड राज्य (2026) के मामलों में प्रतिपादित कानूनों का खुला उल्लंघन बताया गया.

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कहा गया कि जब Post Sanctioned हैं और कार्य की प्रकृति स्थायी है, तो कर्मचारियों को अर्से तक दैनिक वेतन भोगी बनाए रखना असंवैधानिक है. कोर्ट ने कहा कि जुलाई 2026 के दूसरे सप्ताह तक सभी पक्ष अपनी दलीलें और जवाब पूरा कर लें. यदि अगली तिथि तक जवाब दाखिल नहीं होता है तो उपलब्ध साक्ष्यों व अभिलेखों के आधार पर ही मामले का अंतिम फैसला कर दिया जाएगा. याचिका अधिवक्ता विकाश कुमार और अमित शुक्ला के माध्यम से दायर की गई है.

प्रशासनिक अधिकारी नहीं मान रहे सुप्रीम कोर्ट का आदेश, प्रमुख सचिव गृह व वित्त नियंत्रक पुलिस मुख्यालय से हाईकोर्ट ने पूछा क्या कदम उठाए

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने प्रमुख सचिव गृह उप्र लखनऊ व वित्त नियंत्रक पुलिस मुख्यालय लखनऊ से व्यक्तिगत हलफनामा दाखिल कर स्पष्ट करने का निर्देश दिया है कि अधिक वेतन भुगतान की सेवानिवृत्ति के बाद वसूली पर रोक लगाने के सुप्रीम कोर्ट के आदेश को लागू करने के लिए क्या कदम उठाए हैं.

कोर्ट ने कहा सुप्रीम कोर्ट ने सुशील कुमार सिंघल केस में 2014 में 16 जनवरी 2007 के शासनादेश के तहत अधिक वेतन भुगतान की सेवानिवृत्ति परिलाभो से वसूली पर रोक लगा रखी है. इसके बावजूद प्रतिदिन ऐसे मामले कोर्ट में आ रहे हैं. प्रशासनिक अधिकारी सुप्रीम कोर्ट के निर्देश का पालन नहीं कर रहे. याचिका की अगली सुनवाई 25 मई को होगी. यह आदेश जस्टिस प्रकाश पाडिया ने गिरधारी लाल की याचिका की सुनवाई करते हुए दिया है. याचिका पर अधिवक्ता बी एन सिंह राठौर ने बहस की.

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वित्त नियंत्रक पुलिस मुख्यालय लखनऊ ने याची के सेवानिवृत होने के बाद अधिक वेतन भुगतान की वसूली कर ली. परिलाभो का भुगतान करने से इंकार कर दिया. जिसे चुनौती दी गई है. कोर्ट ने कहा वित्त नियंत्रक का आदेश न केवल अवैध है अपितु सुप्रीम कोर्ट के आदेश का उल्लघंन भी है. याची ने 24 जनवरी 24 के प्रत्यावेदन के साथ सुप्रीम कोर्ट के फैसले की प्रति भी दी थी किन्तु दुर्भाग्यवश भुगतान से इंकार करते समय उस पर विचार नहीं किया गया. जिस पर कोर्ट ने दोनों अधिकारियों से हलफनामा मांगा है.

श्रीमती सरिता सिंह हाईकोर्ट में पीडीए की पैनल अधिवक्ता नियुक्त

इलाहाबाद हाईकोर्ट की अधिवक्ता श्रीमती सरिता सिंह प्रयागराज विकास प्राधिकरण की पैनल अधिवक्ता नियुक्त की गई है. ये प्राधिकरण की ओर से मुकद्दमों में हाईकोर्ट में उसका पक्ष रखेंगी. यह आदेश प्रभारी विधि अधिकारी पीडीए ने जारी किया है.

श्रीमती सिंह राज्य विधि अधिकारी के अलावा कई संस्थानों की अधिवक्ता भी रह चुकी है.इनके पति अरूण कुमार गुप्ता हाईकोर्ट में वरिष्ठ अधिवक्ता है. जिन्होंने गंगा एक्सप्रेस  वे व गंगा प्रदूषण मामले में जनहित याचिका पर महत्वपूर्ण भूमिका निभाई.

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