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कानून का सिद्धांत Bail नियम है और जेल 1 अपवाद, हाई कोर्ट ने मंजूर की रजिस्ट्रार फर्म्स सोसाइटीज के सह लेखाकार राग विराग की जमानत

कानून का सिद्धांत Bail नियम है और जेल 1 अपवाद, हाई कोर्ट ने मंजूर की रजिस्ट्रार फर्म्स सोसाइटीज के सह लेखाकार राग विराग की जमानत

कानून का एक स्थापित सिद्धांत है कि Bail का उद्देश्य विचारण के दौरान अभियुक्त की उपस्थिति सुनिश्चित करना है. राज्य की ओर से एजीए ने ऐसी कोई भी महत्वपूर्ण जानकारी या परिस्थितियाँ प्रस्तुत नहीं की हैं, जिनसे यह संकेत मिलता हो कि आवेदक न्याय से भाग सकता है या न्याय की प्रक्रिया में बाधा डाल सकता है अथवा अपराधों को दोहराने या गवाहों को डराने-धमकाने जैसी अन्य समस्याएँ उत्पन्न कर सकता है.

इस कमेंट के साथ सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय किये गये मानक कि Bail नियम है और जेल एक अपवाद, पर भरोसा करते हुए इलाहाबाद हाई कोर्ट के जस्टिस विक्रम डी. चौहान की बेंच ने रजिस्ट्रार फर्म्स सोसाइटीज के सह लेखाकार राग विराग की Bail मंजूर कर ली है और शर्तों के साथ Bail पर रिहा करने का आदेश दिया है. हाई कोर्ट के आदेश के अनुपालन में मंगलवार को राग विराग वाराणसी की जिला जेल से रिहा हो गये.

जमानत (Bail) याचिका पर आवेदक की ओर से सीनियर एडवोकेट वीपी श्रीवास्तव और स्टेट की ओर से संदीप चौधरी ने पक्ष रखा. कोर्ट ने मेरिट के आधार पर फैसला सुनाने से पहले रिकॉर्ड पर उपलब्ध तथ्यों को परखा. आवेदक का पक्ष रखते हुए अधिवक्ता ने ट्रैप टीक की कार्रवाई पर सवाल खड़ा किया और बताया कि जिस शैक्षणिक संस्थान की सोसाइटी के नवीनीकरण के नाम पर कथित रुपये की मांग करने का दावा किया गया है वह फाइल रागविराग को 6 नवंबर को ही आवंटित की गयी थी.

इसी दिन ट्रैप टीम ने अपनी कार्रवाई कर दी. इसके अलावा एफआईआर के समय लगायी गयी धाराओं और चार्जशीट में लगायी गयी धाराओं की तरफ भी उन्होंने कोर्ट का ध्यान आकृष्ट कराया. चार्जशीट में लगायी गयी धाराओं में अधिकतम सजा सात साल निर्धारित है. उन्होंने तर्क दिया कि आवेदक करीब छह महीने से जेल में है.

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आवेदक के अधिवक्ता ने अरेस्ट मेमो की कार्रवाई को थाने में पूरा कये जाने पर भी सवाल उठाया और तर्क दिया की आवेदक का कोई आपराधिक इतिहास नहीं है. उन्होंने कोर्ट को भरोसा दिलाया कि वह Bail की स्वतंत्रता का दुरुपयोग नहीं करेगा और विचारण की कार्यवाही में पूर्ण सहयोग प्रदान करेगा.

राज्य की ओर से पेश हुए अधिवक्ता ने Bail प्रार्थना का विरोध किया किंतु तथ्यात्मक आधार पर कोई विवाद नहीं उठाया. ऐसा कोई तथ्य अथवा परिस्थिति प्रस्तुत नहीं की है, जिससे आवेदक के आपराधिक इतिहास अथवा पूर्ववृत्त का संकेत मिलता हो और जिसके आधार पर आवेदक को Bail का अधिकार न प्राप्त हो.

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राज्य का यह मामला नहीं है कि आवेदक ने अन्वेषण (जांच) अथवा विचारण न्यायालय के समक्ष चल रही कार्यवाहियों में सहयोग नहीं किया है. दोनों पक्षों के तर्कों को सुनने के बाद कोर्ट ने Bail मंजूर कर ली और एक व्यक्तिगत मुचलका और उतनी ही राशि के दो जमानतदार पेश करने पर Bail पर रिहा करने का आदेश दिया.

बता दें कि एंटी करप्शन की ट्रैप टीम ने 6 नवंबर को रजिस्ट्रार फर्म्स सोसाइटीज के आफिस के कर्मचारी विजय कुमार और सहलेखाकार रागविराग को गिरफ्तार किया था. आरोप था कि एक शैक्षणिक संस्थान की सोसाइटी के रिन्यूअल के लिए रुपये की मांग की गयी थी. धनराशि कर्मचारी विजय कुमार के मेज की दराज से बरामद की गयी थी.

ट्रैप टीम ने दोनों को हिरासत में ले लिया और शिवकुटी थाने में उसी तिथि को जीरो एफआईआर दर्ज करायी. इसके बाद दोनों को 7 नवंबर को वाराणसी की एंटी करप्शन कोर्ट में पेश करने के बाद जेल भेज दिया गया था. इस केस को बाद में पुलिस थाना भ्रष्टाचार निरोधक प्रयागराज को ट्रांसफर कर दिया गया और केस क्राइम नंबर 012/2025 हो गया. एंटी करप्शन टीम के विवेचनाधिकारी द्वारा चार्जशीट कोर्ट में पेश की जा चुकी है.

फैसले में कोर्ट ने मेंशन कराया कि ‘जमानत (Bail) एक नियम है और जेल एक अपवाद’ सिद्धांत को सुप्रीम कोर्ट द्वारा भली-भांति मान्यता प्राप्त है, विशेष रूप से संविधान के अनुच्छेद 21 की कसौटी पर. इस सिद्धांत को सुप्रीम कोर्ट ने सत्येंद्र कुमार अंतिल बनाम केंद्रीय जांच ब्यूरो और अन्य, 2022 (10) SCC 51 मामले में दोहराया है.

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Bail मंजूर करते हुए कोर्ट ने तय की शर्तें:

  • i. आवेदक विचारण के दौरान साक्ष्यों के साथ छेड़छाड़ नहीं करेगा.
  • ii. अभियोजन पक्ष के गवाहों पर दबाव नहीं डालेगा/उन्हें डराएगा-धमकाएगा नहीं.
  • iii. निर्धारित तिथि पर विचारण न्यायालय के समक्ष उपस्थित होगा, जब तक कि उसकी व्यक्तिगत उपस्थिति से छूट न दी गई हो और/या आवेदक आवश्यकता पड़ने पर किसी पुलिस अधिकारी द्वारा पूछताछ के लिए स्वयं को उपलब्ध कराएगा.
  • iv. ऐसा कोई अपराध नहीं करेगा जो उस अपराध के समान हो, जिसका उस पर आरोप है, या जिसके किए जाने का उस पर संदेह है.
  • v. प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से मामले के तथ्यों से परिचित किसी भी व्यक्ति को कोई प्रलोभन, धमकी या वादा नहीं करेगा ताकि उसे ऐसे तथ्यों को न्यायालय या किसी पुलिस अधिकारी के समक्ष प्रकट करने से रोका जा सके अथवा साक्ष्यों के साथ छेड़छाड़ की जा सके.
  • vi. आवेदक न्यायालय की पूर्व अनुमति के बिना भारत छोड़कर बाहर नहीं जाएगा.
  • vii. यदि आवेदक अपना आवासीय पता बदलता है तो वह संबंधित न्यायालय को अपने नए आवासीय पते के बारे में लिखित रूप में सूचित करेगा.

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