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IAS का प्रोबेशनर के तौर पर रिटायर हो जाना Salary-Pension लाभ देने से इनकार करने का आधार नहीं माना जा सकता, 2 माह में लाभ दें

इलाहाबाद HC ने रिटायर IAS के वेतन रिवाइज करने को दी मंजूरी, सरकार को दो ​महीने में फैसला लेना होगा, ब्याज भी देना होगा

IAS का प्रोबेशनर के तौर पर रिटायर हो जाना Salary-Pension लाभ देने से इनकार करने का आधार नहीं माना जा सकता, 2 माह में लाभ दें

याचिकाकर्ता दो साल की प्रोबेशन अवधि खत्म होने के तीन महीने बाद प्रोबेशनर के तौर पर रिटायर हो गया था, इसलिए इसे Salary-pension लाभ देने से इनकार करने का आधार नहीं माना जा सकता, जो 31.10.1966 के ऑफिस मेमोरेंडम, रेगुलेशन, 1955 में भारत सरकार के फैसले के क्लॉज 4 और 01.12.1994 के ऑफिस मेमोरेंडम के क्लॉज 4 के अनुसार याचिकाकर्ता जैसे नए भर्ती हुए लोगों को साफ तौर पर दिए गए हैं.

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा है कि रूल्स, 1954 का नियम 7 एक प्रोबेशनर द्वारा फाइनल एग्जाम देने का प्रावधान करता है. लेकिन डिपार्टमेंट द्वारा खुद ऐसा एग्जाम न करवाना, उन फायदों को देने से मना करने का आधार नहीं माना जा सकता, जिनका वह आईएएस कैडर में प्रोबेशनर रहते हुए और पीसीएस कैडर में अपनी जगह बनाए रखते हुए हकदार है. इस कमेंट के साथ चीफ जस्टिस अरुण भंसाली और जस्टिस क्षितिज शैलेन्द्र की बेंच ने कैट के फैसले को रद करते हुए याचिकाकर्ताओं को बड़ी राहत प्रदान की है.

सेंट्रल एडमिनिस्ट्रेटिव ट्रिब्यूनल, इलाहाबाद बेंच इलाहाबाद द्वारा ओए नंबर 988 ऑफ 2021 (बादल चटर्जी बनाम यूनियन ऑफ इंडिया और अन्य) और ओए नंबर 987 ऑफ 2021 (शंकर सिंह बनाम यूनियन ऑफ इंडिया और अन्य) में पारित आदेशों को रद्द करते हुए दोनों के मूल आवेदन को स्वीकार कर लिया है. कोर्ट ने संबंधित विभागों को निर्देश दिया है कि वे याचिकाकर्ताओं को 20 जून 2013 से 67000-79000/- रुपये के वेतनमान (Salary) के आधार पर और गणना करके वेतन (Salary) का बकाया जारी करें और साथ ही उनकी संबंधित सेवानिवृत्ति की तारीखों के अनुसार उक्त वेतनमान पर सेवानिवृत्ति के बाद के लाभ भी जारी करें.

याचिकाकर्ता वेतन के बकाया पर 6% प्रति वर्ष की दर से साधारण ब्याज और सेवानिवृत्ति के बाद के लाभों पर उसी दर से ब्याज प्राप्त करने के हकदार होंगे और तदनुसार पेंशन (Pension)  भी प्राप्त करेंगे. उक्त सभी लाभ दो महीने के भीतर याचिकाकर्ताओं के पक्ष में जारी किया जाय.

तथ्यों और कानून के सामान्य प्रश्नों से जुड़ी दो रिट याचिकाओं पर एक साथ सुनवाई हुई और इन पर इस सामान्य फैसले से फैसला दिया. दोनों रिट याचिकाओं में सेंट्रल एडमिनिस्ट्रेटिव ट्रिब्यूनल, इलाहाबाद बेंच द्वारा क्रमशः ओए नंबर 988 ऑफ 2021 (बादल चटर्जी बनाम यूनियन ऑफ इंडिया और अन्य) और ओए नंबर 987 ऑफ 2021 (शंकर सिंह बनाम यूनियन ऑफ इंडिया और अन्य) में पारित 23.12.2024 के अलग-अलग आदेशों को चुनौती दी गई थी.

दोनों मूल आवेदनों में याचिकाकर्ताओं को 20 जून 2013 से 67000-79000/- रुपये का वेतनमान (Salary) देने की प्रार्थना की गई थी. इसके अलावा 18% प्रति वर्ष की दर से ब्याज के साथ वेतन (Salary) का बकाया और परिणामस्वरूप संशोधित सेवानिवृत्ति लाभ और पेंशन (Pension) का भुगतान करने की प्रार्थना की गई थी.

बेंच ने रिट ए नंबर 5267 ऑफ 2025 को मुख्य मामला माना और तथ्यों और दस्तावेजों का संदर्भ उक्त रिट याचिका के रिकॉर्ड से लिया. याचिकाकर्ता उत्तर प्रदेश की प्रांतीय सिविल सेवा के 1979 बैच के अधिकारी थे. उन्हें 2006 की ग्रेडेशन सूची में रखा गया था. उन्हें 28 नवंबर 2012 के सरकारी गजट के अनुसार भारतीय प्रशासनिक सेवा में शामिल किया गया था.

आईएएस परिवीक्षाधीन के रूप में शामिल होने के बाद वह परिवीक्षा अवधि के दौरान राज्य सिविल सेवाओं में अपना पद बनाए हुए थे. राज्य सिविल सेवाओं के 1979 बैच के जिन अधिकारियों को आईएएस कैडर में शामिल होने के लिए योग्य नहीं पाया गया और जो राज्य सिविल सेवाओं में बने रहे, उन्हें 20 जून 2013 को राज्य सिविल सेवाओं से संबंधित 67000-79000/- रुपये का वेतनमान (Salary) दिया गया था. याचिकाकर्ता को पता चला तो उसने अधिकारियों से संपर्क किया और उसी वेतनमान (Salary) को देने का अनुरोध किया.

याचिकाकर्ता 28 फरवरी को कमिश्नर, खाद्य सुरक्षा और औषधि प्रशासन के पद से रिटायर हुआ और उसने प्रधान सचिव, नियुक्ति विभाग से पत्र भेजकर अनुरोध किया कि भारत सरकार के 31 अक्टूबर के निर्णय के आधार पर उन्हें भी 67000-79000/- रुपये का वेतनमान (Salary) जारी किया जाए, जिसमें अखिल भारतीय सेवाओं में प्रोबेशन पर शामिल होने वाले व्यक्ति को आईएएस में पुष्टि से पहले राज्य सिविल सेवाओं में अपना पद बनाए रखते हुए राज्य सिविल सेवाओं में मिलने वाले सभी लाभों का हकदार माना गया था.

याचिकाकर्ता का आगे का मामला यह है कि इसी तरह की परिस्थितियों में, राज्य पुलिस सेवाओं के एक अधिकारी राजेश कुमार श्रीवास्तव (IPS) ने याचिकाकर्ता द्वारा मांगे गए समान लाभों को देने के लिए एक आवेदन पत्र प्रस्तुत किया. राज्य सरकार ने उनके अनुरोध को अस्वीकार कर दिया तो उन्होंने ट्रिब्यूनल की लखनऊ बेंच के समक्ष ओए संख्या 257/2010 (राजेश कुमार श्रीवास्तव बनाम भारत संघ और 2 अन्य) दायर किया. ट्रिब्यूनल ने इसे स्वीकार कर लिया.

जिसके आदेश के खिलाफ राज्य सरकार ने रिट याचिका संख्या 16174/2016 दायर की, जिसे इस न्यायालय की लखनऊ बेंच ने खारिज कर दिया. जिसके बाद विभाग ने ट्रिब्यूनल द्वारा पारित आदेश का पालन किया और राजेश कुमार श्रीवास्तव को लाभ दिए गए.

याचिकाकर्ता द्वारा उपरोक्त वेतनमान देने के लिए किए गए लगातार अनुरोधों पर ध्यान नहीं दिया गया, तो उसने ओए संख्या 806/2020 दायर किया, जिसे ट्रिब्यूनल ने 04.01.2021 को निपटा दिया. जिसमें याचिकाकर्ता को 15 दिनों के भीतर सक्षम प्राधिकारी के समक्ष सभी प्रासंगिक नियमों और विनियमों को संलग्न करते हुए अपनी सभी शिकायतों को व्यक्त करने के लिए एक नया आवेदन प्रस्तुत करने की अनुमति दी गई और प्राधिकारी को अगले तीन महीनों की अवधि के भीतर एक स्पष्ट और तर्कपूर्ण आदेश द्वारा उसी पर निर्णय लेने का निर्देश दिया गया.

इस मामले का एक और पहलू यह था कि प्रतिवादियों द्वारा उठाई गई दलील या ट्रिब्यूनल द्वारा दर्ज की गई फाइंडिंग, जो आईपीएस और आईएएस कैडर के बीच अंतर बताती है, को क्यों स्वीकार नहीं किया जा सकता. हालांकि राजेश कुमार श्रीवास्तव एक आईपीएस अधिकारी थे, लेकिन ट्रिब्यूनल की लखनऊ बेंच द्वारा ओए नंबर 332/00509/2016, ओए नंबर 332/00508/2016 और ओए नंबर 332/00506/2016 में पारित सभी आदेश यह दर्शाते हैं कि ये सभी मामले उन व्यक्तियों के थे जिन्हें यूपीपीसीएस में नियुक्त किया गया था और नियम, 1954 के अनुसार आईएएस  कैडर में शामिल किया गया था.

जब ट्रिब्यूनल ने उपरोक्त सभी मामलों में, राजेश कुमार श्रीवास्तव (उपरोक्त) के मामले में फैसले के आधार पर दर्जनों आवेदकों को लाभ (Salary) दिया, तो यह न्यायालय याचिकाकर्ता को वही लाभ देने से इनकार करने का कोई अच्छा कारण नहीं पाता है. इस तथ्य के बावजूद कि प्रतिवादियों ने ट्रिब्यूनल द्वारा 23 जनवरी 2025 को पारित आदेशों को भविष्य में चुनौती देने के संबंध में एक दलील उठाई है और इसे याचिकाकर्ता को राहत देने से इनकार करने का आधार बनाया है.

Salary पर्ची में उल्लिखित शर्त इंडक्शन लेखा परीक्षा के अधीन

कोर्ट में माना कि जहां तक वेतन (Salary) पर्ची में उल्लिखित शर्त का संबंध है, जिसमें कहा गया है कि याचिकाकर्ता का इंडक्शन लेखा परीक्षा के अधीन होगा, यह याचिकाकर्ता के मामले के लिए घातक नहीं होगा क्योंकि प्रतिवादियों द्वारा कोई भी दस्तावेज रिकॉर्ड पर नहीं लाया गया है और न ही ट्रिब्यूनल द्वारा विवादित आदेश में इसका उल्लेख किया गया है, जिससे विभाग ने कभी कोई परीक्षा आयोजित करने का प्रयास किया हो और याचिकाकर्ता को उसमें उपस्थित होने के लिए कहा गया हो, लेकिन वह उपस्थित नहीं हुआ और, इसके परिणामस्वरूप, उसे वांछित वेतनमान (Salary) पाने का हकदार नहीं माना गया.

हम याचिकाकर्ता को साफ तौर पर मिलने वाले लाभों (Salary) से इनकार करने के प्रतिवादियों के आचरण की कड़ी निंदा करते हैं. सभी नियमों, विनियमों और कार्यालय ज्ञापनों में शर्तें स्पष्ट और असंदिग्ध हैं और साथ ही याचिकाकर्ता की सेवा स्थिति भी निर्विवाद है.

इसलिए, पहले, याचिकाकर्ता के प्रतिनिधित्व पर वर्षों तक फैसला लटकाए रखना और, फिर, सरकार से अपेक्षित दिशानिर्देशों का सहारा लेना और उसी का इस्तेमाल लाभों का भुगतान न करने के हथियार के रूप में करना और, फिर, किसी भी शब्द या शर्त की किसी भी तरह से व्याख्या करने की कोशिश करना ताकि अपने ही विभाग के एक आईएएस अधिकारी को बिना किसी ठोस कारण के अपने जूनियर्स से कमतर माना जाए, यह साफ तौर पर प्रतिवादियों की ओर से ‘लालफीताशाही’ को दर्शाता है.
बेंच ने किया कमेंट

बेंच ने माना कि, यह साफ है कि प्रतिवादियों ने याचिकाकर्ता को मिलने वाले लाभों को जारी न करने का मुद्दा बनाया, जबकि सब कुछ उसके पक्ष में था, न केवल नियम, विनियम और कार्यालय ज्ञापन बल्कि ट्रिब्यूनल के लगातार फैसले भी, मूल फैसला राजेश कुमार श्रीवास्तव (उपरोक्त) था, जिसे इस उच्च न्यायालय ने रिट याचिका संख्या 16174/2016 को खारिज करते हुए बरकरार रखा था.

बेंच ने कहा कि, हम प्रतिवादियों या ट्रिब्यूनल द्वारा याचिकाकर्ता को अयोग्य ठहराने का कोई उचित कारण नहीं देखते हैं और हमारा मानना है कि याचिकाकर्ता ने ट्रिब्यूनल के समक्ष मांगे गए राहत देने के लिए सफलतापूर्वक मामला बनाया है. संबंधित रिट-ए नंबर 5265 ऑफ 2025 (शंकर सिंह बनाम यूनियन ऑफ़ इंडिया और अन्य) के याचिकाकर्ता का मामला तथ्यों और कानून के आधार पर समान होने के कारण, इस फैसले में बताए गए कारणों से दोनों रिट याचिकाओं को स्वीकार किया जाना चाहिए.

WRIT A No.- 5267 of 2025 Badal Chatterjee Versus Union of India and 2 others

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