हाई कोर्ट ने की पैगंबर (Paigamber) का अपमान करने की एकमात्र सजा सिर कलम करना है, नारे के इरादे की निंदा
गुस्ताख-ए-नबी की एक सजा, सर तन से जुदा (पैगंबर (Paigamber) का अपमान करने की एकमात्र सजा सिर कलम करना है), नारे के इरादे की निंदा करते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि यह “पैगंबर (Paigamber) मोहम्मद के आदर्शों का अपमान है. हाईकोर्ट ने कहा कि पैगंबर (Paigamber) ने कभी भी किसी व्यक्ति का सिर कलम करने की इच्छा नहीं जताई, यहां तक कि उन लोगों का भी नहीं जिन्होंने उन्हें व्यक्तिगत रूप से नुकसान पहुंचाया था. बरेली हिंसा में शामिल एक आरोपी जीए रिहान की जमानत याचिका खारिज करते हुए यह टिप्पणी जस्टिस अरुण कुमार सिंह देशवाल ने की.

बेंच ने सवाल में उठाए गए नारे के लिए भीड़ के कथित कृत्य पर दु:ख जताते हुए पैगंबर (Paigamber) के उस आचरण का जिक्र किया जब वह ताइफ शहर गए. अपने 9-पृष्ठ के आदेश में कोर्ट ने कहा कि पैगंबर (Paigamber) ने गैर-मुस्लिम पड़ोसी महिला के प्रति दया दिखाई और कभी भी बदला नहीं लिया, जो अक्सर उनके रास्ते में कचरा फेंककर उन्हें नुकसान पहुंचाती थी. जब पड़ोसी बीमार पड़ी तो पैगंबर (Paigamber) दयालुता के कारण उससे मिलने गए, जिससे आखिरकार पड़ोसी ने इस्लाम अपना लिया.
बेंच ने टिप्पणी की कि इस कृत्य ने पैगंबर के गहरे जुनून और तत्काल प्रतिशोध के बजाय दीर्घकालिक मार्गदर्शन पर उनके ध्यान को दिखाया. वर्तमान मामले से तुलना करते हुए कोर्ट ने कहा कि ऐसे कई उदाहरण हैं, जो बयां करते हैं कि अपमानित किए जाने के बावजूद पैगंबर मोहम्मद ने कभी भी ऐसे व्यक्ति का सिर कलम करने की इच्छा नहीं जताई.
कोर्ट ने राय दी कि यदि इस्लाम का कोई अनुयायी किसी ऐसे व्यक्ति का सिर कलम करने का नारा लगाता है, जो नबी का अपमान करता है, तो यह पैगंबर (Paigamber) मोहम्मद के आदर्शों का अपमान करने के अलावा और कुछ नहीं है. प्यार, दया और करुणा दूसरों को आकर्षित करते हैं, शब्दों के माध्यम से हिंसा की अभिव्यक्ति दिखाने से हिंसा को बढ़ावा देने वाले व्यक्ति के धर्म के प्रति दुश्मनी या नाराजगी पैदा होती है.
Paigamber ने गैर-मुस्लिम पड़ोसी महिला के प्रति दया दिखाई जो अक्सर उन्हें नुकसान पहुंचाती
बेंच ने जीए रिहान की जमानत याचिका खारिज की जिसे 26 सितंबर, 2025 को बरेली में हुई हिंसा के सिलसिले में गिरफ्तार किया गया था. इस मामले में अभियोजन पक्ष ने आरोप लगाया कि स्थानीय नेताओं द्वारा उकसाई गई 500 लोगों की भीड़ ने आपत्तिजनक नारा गुस्ताख-ए-नबी की एक सजा, सर तन से जुदा, सर तन से जुदा लगाया और पुलिसकर्मियों पर पत्थर और पेट्रोल बम से हमला किया.
हाईकोर्ट ने कहा कि ऐसे नारे लगाना न केवल भारत की संप्रभुता और अखंडता को चुनौती देने के लिए भारतीय न्याय संहिता की धारा 152 के तहत दंडनीय है, बल्कि यह इस्लाम के मूल सिद्धांतों के भी खिलाफ है. कोर्ट ने कहा कि मुल्ला खादिम हुसैन रिजवी ने 2011 में आसिया बीबी की सजा और पंजाब के गवर्नर सलमान तासीर द्वारा उन्हें दिए गए समर्थन के बाद पाकिस्तान में पहली बार इस नारे का इस्तेमाल किया था.
कोर्ट ने टिप्पणी की, इसके बाद यह नारा भारत सहित अन्य देशों में भी फैल गया और कुछ मुसलमानों द्वारा अन्य धर्मों के लोगों को डराने और राज्य के अधिकार को चुनौती देने के लिए इसका बड़े पैमाने पर दुरुपयोग किया गया. बेंच ने कहा कि जबकि नारा-ए-तकबीर, अल्लाहु अकबर, हर हर महादेव, जय श्री राम, जो बोले सो निहाल, सत श्री अकाल जैसे नारे खुशी के पलों में इस्तेमाल किए जाने वाले भक्तिपूर्ण आह्वान हैं, दूसरों को डराने या हिंसा भड़काने के लिए नारों का दुरुपयोग बर्दाश्त नहीं किया जा सकता.
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