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Yogi को Chief Minister और केशव मौर्य को Dy. Chief Minister बनाने को लेकर 2017 में दाखिल PIL खारिज

इलाहाबाद HC की लखनऊ बेंच के 2 जज कर रहे थे याचिका पर सुनवाई

Yogi को Chief Minister और केशव मौर्य को Dy. Chief Minister बनाने को लेकर 2017 में दाखिल PIL खारिज

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने योगी आदित्यनाथ को Chief Minister और केशव प्रसाद मौर्य को उत्तर प्रदेश का Dy. Chief Minister नियुक्त किए जाने की वैधता को चुनौती देने वाली जनहित याचिका को खारिज कर दिया है. इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ बेंच के जस्टिस राजन रॉय और जस्टिस राजीव भारती की बेंच ने कहा कि संविधान में ऐसा कुछ भी नहीं है जो पहले से ही संसद सदस्य व्यक्ति को किसी राज्य का Chief Minister या Dy. Chief Minister नियुक्त करने से रोकता हो. हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि राज्यपाल के विवेक का इस्तेमाल संवैधानिक सीमाओं के भीतर किया गया और उसने दावों में “कोई दम नहीं” पाते हुए याचिका खारिज कर दी.

यह याचिका संजय शर्मा की ओर से 2017 में दाखिल की गयी थी. याचिका में मांग की गई गयी थी कि योगी आदित्यनाथ और केशव प्रसाद मौर्य की नियुक्तियों को 19 मार्च, 2017 से शून्य और अमान्य घोषित किया जाए. याचिकाकर्ता की ओर से तर्क दिया गया था कि जब दोनों ने राज्य के Chief Minister और Dy. Chief Minister के रूप में शपथ ली, तब वे संसद सदस्य थे. उन्होंने सितंबर 2017 में लोकसभा से इस्तीफा दिया था जबकि Chief Minister और Dy. Chief Minister पद की शपथ मार्च में ही ले ली थी.

जनहित याचिका निस्तारित करते हुए जजों की बेंच ने स्पष्ट किया कि, सांसद का पद न तो संवैधानिक है और न ही सरकार के अधीन है. आर्टिकल 164(4) की शर्तों के अधीन रहते हुए एक साथ सीएम या डिप्टी सीएम का पद संभालना शक्तियों के बंटवारे के सिद्धांत का उल्लंघन नहीं करता है.

Chief Minister और Dy. Chief Minister पद की शपथ मार्च में ही ले ली थी

कोर्ट ने कहा कि उनकी सीटों को खाली घोषित करने या उनके अधिकार पर सवाल उठाने की मांग अब ‘बेकार’ हो चुकी है क्योंकि उन्होंने अपना कार्यकाल पूरा कर लिया है और 2022 में फिर से इस पद को संभाल रहे हैं. कोर्ट ने कानून के सवाल को सुलझाने के लिए 2017 की शुरुआती नियुक्ति की कानूनी वैधता पर फैसला सुनाया.

कोर्ट ने याचिकाकर्ता के इस तर्क को खारिज कर दिया कि एक सांसद सरकार के तहत लाभ का पद रखता है, जो उन्हें आर्टिकल 191(1)(a) के तहत अयोग्य ठहराएगा. बेंच ने स्पष्ट किया कि भारतीय संविधान के आर्टिकल 191 के तहत अयोग्यता तभी लागू होती है, जब कोई व्यक्ति भारत सरकार या राज्य सरकार के तहत कोई पद धारण करता है. एक संसद सदस्य के पास लोगों की आवाज उठाने के लिए चुनाव का पद होता है, इसलिए आर्टिकल 191 के अयोग्यता के प्रावधान पहली जगह लागू नहीं होंगे.

अश्विनी कुमार उपाध्याय बनाम यूनियन ऑफ इंडिया (2019) मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए बेंच ने कहा कि विधायकों को फुल-टाइम सैलरी वाला कर्मचारी नहीं कहा जा सकता. सिर्फ इसलिए कि सांसदों को सैलरी या भत्ते मिलते हैं, सरकार के साथ उनका मालिक-कर्मचारी का रिश्ता नहीं बन जाता. जब तक सदन भंग नहीं होता वे एक खास पद पर रहते हैं.

एक सांसद राष्ट्रपति या राज्यपाल की मर्जी से काम नहीं करता. याचिकाकर्ता के वकील ने तर्क दिया कि एक सांसद, जो केंद्रीय विधायिका का सदस्य है, उनको Chief Minister/ Dy. Chief Minister का कार्यकारी पद संभालने की अनुमति देना संविधान की निहित पाबंदियों और शक्तियों के बंटवारे के सिद्धांत का उल्लंघन है. कोर्ट ने इस दलील को बेतुका और संवैधानिक रूप से गलत बताया. बेंच ने बताया कि भारतीय संवैधानिक व्यवस्था के तहत हर मंत्री को आखिरकार विधायिका का सदस्य बनना होता है.

अगर यह दलील मान ली जाए कि विधायिका के किसी भी सदस्य को मंत्री नियुक्त नहीं किया जाना चाहिए, क्योंकि विधायिका के सदस्य के तौर पर वह विधायी विंग का हिस्सा है. मुख्यमंत्री/उपमुख्यमंत्री के तौर पर वह कार्यपालिका का हिस्सा बन जाता है तो किसी भी मंत्री को नियुक्त नहीं किया जा सकता.

बेंच ने संवैधानिक निकाय और संवैधानिक पद के बीच अंतर को साफ करते हुए कहा कि संवैधानिक पद राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, स्पीकर या मुख्य चुनाव आयुक्त धारित करते हैं. संसद में सीट होना संवैधानिक पद रखने के बराबर नहीं है. इसलिए उपराष्ट्रपति के राष्ट्रपति बनने पर राज्यों की परिषद के अध्यक्ष न रहने के बारे में याचिकाकर्ता की तुलना को गलत और बिना संवैधानिक आधार के माना गया.

याचिकाकर्ता ने संसद (अयोग्यता निवारण) अधिनियम, 1959 की धारा 3(a) की वैधता को भी चुनौती दी थी, जो यह घोषित करती है कि मंत्री का पद धारक को संसद सदस्य होने से अयोग्य नहीं ठहराएगा. याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि यह प्रावधान अनुच्छेद 102(1)(a) की भावना के खिलाफ है. बेंच ने इस दलील को खारिज कर दिया. बेंच ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 102 की व्याख्या (1985 में संशोधित) स्पष्ट करती है कि किसी व्यक्ति को सिर्फ इसलिए लाभ का पद धारण करने वाला नहीं माना जाएगा क्योंकि वह मंत्री है.

“जब संविधान ने खुद ही राज्य के मंत्री के पद को, जिसमें Chief Minister मुख्यमंत्री और Dy. Chief Minister शामिल हैं, अनुच्छेद 102 के दायरे से बाहर रखा है… तो हम यह समझने में नाकाम हैं कि 1959 के अधिनियम की धारा 3(a) को इस तरह से चुनौती कैसे दी जा सकती है और इसे कैसे सही ठहराया जा सकता है.”
बेंच की टिप्पणी

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