बाइबल बांटना या Religion का प्रचार करना उत्तर प्रदेश गैर-कानूनी धर्मांतरण निषेध अधिनियम 2021 के तहत अपराध नहीं
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने धर्मांतरण मामले में हद पार करने पर यूपी पुलिस को फटकारा

इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने कहा है कि धार्मिक ग्रन्थ बाइबल को बांटना या किसी भी Religion का प्रचार करना उत्तर प्रदेश गैर-कानूनी धर्मांतरण (Religion Change) निषेध अधिनियम 2021 के तहत अपराध नहीं है. जस्टिस अब्दुल मोइन और जस्टिस बबीता रानी की बेंच ने यूपी पुलिस की क्लास भी लगायी, जिसमें पुलिस ने एफआईआर दर्ज होने के तुरंत बाद आरोपी को गिरफ्तार करने को हद पार करना कहा. उस समय जबरन धर्मांतरण (Religion Change) के दावों को साबित करने के लिए कोई पीड़ित सामने नहीं आया था.
प्रकरण उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर जिले के धम्मौर थाना क्षेत्र का है. इस थाने में 17.08.2025 को एफआईआर नंबर 0147/2025 दर्ज किया गया. इसमें आरोपित के खिलाफ 352, 351(3) BNS 2023 और यूपी गैरकानूनी धर्म (Religion) परिवर्तन निषेध अधिनियम, 2021 की धारा 3 और 5(1) लगायी गयी थी.
याची राम कवल भारती उर्फ बब्लू ने तत्काल याचिका दायर करके एफआईआर रद्द करने की प्रार्थना की है. कोर्ट ने प्रतिवादी को नोटिस जारी करके एक सप्ताह में कदम उठाने का निर्देश दिया और साथ में काउंटर एफीडेविट भी दाखिल करने को कहा. जवाबी हलफनामा दाखिल करते समय प्रतिवादी नंबर 4 को यह बताना होगा कि:-
- उसे यह जानकारी कहाँ से मिली कि याचिकाकर्ता उस अपराध (Religion) में शामिल थे जिसके लिए FIR दर्ज की गई है
- उसने आरोपी के घर जाने के लिए अपने साथ लोगों को कहाँ से इकट्ठा किया
- यदि वह कई लोगों के साथ किसी तीसरे व्यक्ति के घर में घुसता है तो
- याचिकाकर्ताओं ने उसे उनके घर में घुसने से रोकने की कोशिश में क्या अपराध किया है
- BNS की धारा 352 और 351(3) के तहत आरोपी के खिलाफ अपराध कैसे बनता है
- यदि कोई हो तो आरोपित का आपराधिक इतिहास.
- यह देखते हुए कि इस मामले में कानून का एक सवाल शामिल है, एक सप्ताह की अवधि समाप्त होने के बाद इस मामले को नए सिरे से सूचीबद्ध करें.

बता दें कि एफआईआर मनोज कुमार सिंह नाम के एक व्यक्ति ने दर्ज कराई थी. उसने आरोप लगाया कि याचिकाकर्ताओं ने दलितों और गरीब तबके के लोगों को धर्मांतरण (Religion Change) कराने के लिए प्रार्थना सभा आयोजित की थी. आरोपियों के घर पहुंचने पर उसने बरामदे में एक LED स्क्रीन लगी देखी, जहां आरोपी ईसाई धर्म (Religion) के सिद्धांतों का प्रचार कर रहे थे और बाइबल बांट रहे थे.
FIR रद्द करने की याचिका में कोर्ट ने 2021 के अधिनियम की धारा 3 का हवाला दिया जो गलत बयानी बल, अनुचित प्रभाव या प्रलोभन द्वारा धर्मांतरण (Religion Change) पर रोक लगाती है. बेंच ने कहा कि इस प्रावधान को लागू करने के लिए सबसे जरूरी शर्त एक ऐसे व्यक्ति की उपस्थिति है जो यह आरोप लगाए कि उसे धर्मांतरण (Religion Change) कराया जा रहा है.
कोर्ट ने कहा कि इस मामले में 17 अगस्त, 2025 को जब FIR दर्ज की गई तब कोई भी पीड़ित सामने नहीं आया था और एफआईआर में सिर्फ एक एलईडी स्क्रीन और बाइबल बरामद होने का जिक्र था. एफआईआर को पढ़ने से यह सामने नहीं आता है कि एफआईआर दर्ज करते समय कोई भी व्यक्ति सामने आया हो, जिसने यह बताया हो कि उसे किसी दूसरे धर्म में धर्मांतरण (Religion Change) कराया गया.
बयान में धर्मांतरण (Religion Change) के बारे में कुछ भी नहीं बताया
पीड़ितों में से एक ने अपने शुरुआती बयान में धर्मांतरण (Religion Change) के बारे में कुछ भी नहीं बताया लेकिन एफआईआर दर्ज होने के लगभग दो महीने बाद उसने कहा कि उसे धर्म (Religion) बदलने के लिए प्रलोभन दिया गया. बेंच ने टिप्पणी की कि यह देखते हुए कि 2021 का एक्ट एक स्पेशल एक्ट है. अधिकारियों को इस बात पर ध्यान देना चाहिए कि जिस तारीख को यह घटना हुई (17 अगस्त) उस दिन ऐसा कुछ भी नहीं था, जिससे यह पता चले कि उक्त अपराध किया गया.
कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के हाल के फैसले राजेंद्र बिहारी लाल बनाम उत्तर प्रदेश राज्य केस के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि अधिकारी अनुमानों पर काम करने के बजाय इसके प्रावधानों का सख्ती से पालन करने के लिए बाध्य हैं. कोर्ट ने शिकायतकर्ता के आचरण पर भी सवाल उठाया और उसे नोटिस जारी कर याचिकाकर्ताओं के घर पर छापा मारने के उसके अधिकार के बारे में जवाबी हलफनामे में स्पष्टीकरण मांगा.
इस केस के फैक्टस में एक और इंट्रेस्टिंग यह भी है कि 17 अगस्त को एफआईआर दर्ज होते ही याचिकाकर्ता को गिरफ्तार कर लिया गया. कथित पीड़ित का बयान दो महीने से ज्यादा समय बाद रिकॉर्ड किया गया ताकि कथित अपराध का संकेत मिले. बेंच ने कहा कि एफआईआर से यह उम्मीद नहीं की जाती कि वह पूरे सबूतों के सभी तथ्यों वाली एक एनसाइक्लोपीडिया हो बल्कि इसका मकसद आपराधिक कानून को गति देना होता है, फिर भी यह देखते हुए कि एक्ट, 2021 एक विशेष कानून है, इसलिए कम से कम अधिकारियों को इस बात पर ध्यान देना चाहिए था कि जिस तारीख को यह घटना हुई.
पहली नजर में साफ है कि अधिकारियों ने याचिकाकर्ता को गिरफ्तार करने के लिए हर संभव कोशिश की भले ही यह पता नहीं है कि शिकायतकर्ता को एफआईआर में बताए गए किसी भी अपराध के बारे में जानकारी कैसे मिली. ये सभी अजीब तथ्य हैं जिन्हें अधिकारियों को समझाने की जरूरत है, खासकर जब इसमें याचिकाकर्ता की जिंदगी और आजादी शामिल है.
Ram Kewal Bharti @ Bablu And Others V/S State Of U.P. Thru. Prin. Secy. Home Lko. And Others; CRIMINAL MISC. WRIT PETITION No. – 10823 of 2025
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