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Subordinates के विरुद्ध adverse comments करते समय संयम बरतना जरूरी

Subordinates के विरुद्ध adverse comments करते समय संयम बरतना जरूरी

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है कि अपीलीय शक्तियों का प्रयोग करते हुए न्यायालयों को अधीनस्थ न्यायिक अधिकारियों के विरुद्ध तीखी टिप्पणियाँ (adverse comments) दर्ज करते समय सावधानी और संयम बरतना चाहिए. जस्टिस प्रकाश पाडिया की बेंच ने यह कमेंट जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग के अध्यक्ष की तरफ से दाखिल याचिका स्वीकार करते हुए किया.

याचिकाकर्ता को शामली जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग का अध्यक्ष नियुक्त किया गया. उनके द्वारा निणित दो मामलों में क्रमशः 29.04.2025 और 09.05.2025 को अपील में निर्णय हुआ, जहां प्रतिकूल टिप्पणियां (adverse comments) दर्ज की गईं.

व्यथित होकर याचिकाकर्ता ने राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग, नई दिल्ली के समक्ष रीप्रजेंटेशन (adverse comments) किया. इसे रिजेक्ट कर दिये जाने पर उन्होंने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया. कोर्ट ने विभिन्न निर्णयों का हवाला देते हुए यह निर्णय दिया कि ऐसे व्यक्तियों या प्राधिकारियों के विरुद्ध अपमानजनक टिप्पणियां (adverse comments) नहीं की जानी चाहिए, जिनका आचरण न्यायालयों के समक्ष विचाराधीन हो, जब तक कि न्याय के हित में ऐसा करना नितांत आवश्यक न हो.

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कोर्ट ने अपने फैसले में बृज किशोर ठाकुर बनाम भारत संघ मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा किये गये कमेंट, “हाईकोर्ट को स्वयं को निरंतर यह स्मरण दिलाते रहना चाहिए कि न्यायिक पदानुक्रम में उच्च स्तर उन त्रुटियों को सुधारने के लिए प्रदान किए गए, जो संभवतः निचले स्तर की अदालतों के निष्कर्षों या आदेशों में आ गई हों. ऐसी शक्तियां निश्चित रूप से निचले स्तर के न्यायिक व्यक्तियों पर कटु आलोचना करने के लिए नहीं हैं.” का भी जिक्र किया.

adverse comments को हटाने के लिए हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटा सकते हैं

मामले में सुप्रीम कोर्ट के निर्णय पर भरोसा करते हुए कोर्ट ने माना कि जिन अधिकारियों के विरुद्ध ऐसी टिप्पणियां (adverse comments) की गईं, उनके पास कोई उपाय नहीं है. वे अपने विरुद्ध दर्ज आपत्तिजनक टिप्पणियों (adverse comments) को हटाने के लिए हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटा सकते हैं.

कोर्ट ने अवनी कुमार उपाध्याय बनाम इलाहाबाद हाईकोर्ट एवं अन्य के मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा दी गयी व्यवस्था, न्यायिक अधिकारियों के विरुद्ध उनके आचरण के स्पष्टीकरण हेतु सुनवाई का अवसर दिए बिना ऐसी कोई टिप्पणी नहीं की जा सकती, का भी जिक्र अपने फैसले में किया है.

“हम मानते हैं कि न्यायालय को अपने समक्ष आने वाले किसी भी मामले पर अपनी स्वयं की धारणा के आधार पर स्वतंत्र रूप से कार्य करने की अंतर्निहित शक्ति प्राप्त है, लेकिन न्याय के समुचित प्रशासन के लिए यह सर्वोच्च महत्व का एक सामान्य सिद्धांत है कि ऐसे व्यक्तियों या प्राधिकारियों के विरुद्ध अपमानजनक टिप्पणियां (adverse comments) नहीं की जानी चाहिए, जिनके आचरण पर विचार किया जा रहा हो, जब तक कि मामले के निर्णय के लिए उनके आचरण पर टिप्पणी करना नितांत आवश्यक न हो.”

जस्टिस प्रकाश पाडिया

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