दुर्घटना में मौत पर 5 माह या उससे अधिक उम्र के Unborn Child के लिए आठ लाख रुपये Compensation दे रेलवे
इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ बेंच ने रेलवे क्लेम्स ट्रिब्यूनल के आदेश के खिलाफ दायर अपील मंजूर की

इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि Compensation के लिए माँ के गर्भ में पाँच महीने या उससे अधिक आयु का Unborn Childr (भ्रूण) एक जीवित बच्चे के समान माना जाएगा. ऐसे Unborn Child (भ्रूण) की आकस्मिक मृत्यु के लिए रेलवे अलग से Compensation देने के लिए उत्तरदायी होगा. इस Compensation को माँ की मृत्यु पर दिए गए मुआवजे से अलग होगा.
यह आदेश जस्टिस प्रशांत कुमार की सिंगल बेंच ने लखनऊ स्थित रेलवे क्लेम्स ट्रिब्यूनल के आदेश के खिलाफ दायर अपील को स्वीकार करते हुए दिया है. कोर्ट ने Unborn Child (भ्रूण) की मृत्यु के लिए Compensation का दावा करने वाले को 8,00,000 रुपये अतिरिक्त प्रदान करने का आदेश है. बता दें कि रेलवे क्लेम्स ट्रिब्यूनल ने गर्भवती महिला की मृत्यु के लिए Compensation देने का आदेश रेलवे को दिया था.
वहां पर भी Unborn Child (भ्रूण) की मृत्यु के लिए Compensation की मांग की गयी थी. इसमें कहा गया था कि Unborn Child (भ्रूण) आठ महीने से ज्यादा का था. इसके बाद भी ट्रिब्यूनल ने Unborn Child (भ्रूण) की मृत्यु के लिए कोई राहत नहीं दी थी. ट्रिब्यूनल के इस फैसले को हाई कोर्ट में चुनौती दी गयी थी.
रेलवे अधिनियम, 1989 में Unborn Child ‘भ्रूण’ शब्द का स्पष्ट उल्लेख नहीं
हाई कोर्ट की लखनऊ बेंच इसी पर सुनवाई कर रही थी. कोर्ट ने कहा कि यद्यपि रेलवे अधिनियम, 1989 में Unborn Child ‘भ्रूण’ शब्द का स्पष्ट उल्लेख नहीं है फिर भी वर्तमान मामले में मृत्यु रेलवे दुर्घटना से उत्पन्न ‘अनटुवर्ड इंसीडेंट’ के कारण हुई है, इसलिए धारा 124A के तहत रेलवे पर Compensation देने की वैधानिक जिम्मेदारी है.
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केस के तथ्यों के अनुसार भानमती नाम की महिला मरुधर एक्सप्रेस में बाराबंकी स्टेशन पर सवार हुई थी. यह घटना 2 सितंबर 2018 को हुई थी. महिला ने बांदीकुई रेलवे स्टेशन तक का टिकट लिया था. ट्रेन में चढ़ते समय वह दुर्घटना का शिकार हो गयी. इसमें वह गंभीर रूप से घायल हो गयी. इलाज के लिए उसे अस्पताल में भर्ती कराया गया जहां डॉक्टर काफी कोशिश के बाद भी उसे बचा नहीं सके. महिला की गंभीर स्थिति के चलते डॉक्टर उसके Unborn Child (भ्रूण) को नहीं बचा सके.

दोनों की मौत हो जाने के बाद मृतका के परिवार के सदस्यों ने मार्च 2019 में ट्रिब्यूनल के समक्ष दावा याचिका दायर की. ट्रिब्यूनल ने दोनों पक्षों को सुनने और रिकॉर्ड पर उपलब्ध साक्ष्यों को परखने के बाद यह निष्कर्ष निकाला कि मृतका एक वैध यात्री थी और उसकी मृत्यु ट्रेन में चढ़ते समय गिरने से हुई, जो ‘अनटुवर्ड इंसीडेंट’ के दायरे में आता है. ट्रिब्यूनल ने फरवरी 2025 में दिये गये फैसले में महिला की मौत पर 8,00,000 रुपये का Compensation मंजूर किया.
दावेदार ने हाईकोर्ट में इस आधार पर चुनौती दी कि Unborn Child (भ्रूण) की मृत्यु के लिए कोई Compensation नहीं दिया गया. हाई कोर्ट में दावेदार के वकील ने कर्नाटक, दिल्ली और मद्रास हाईकोर्ट के फैसलों का हवाला दिया. जिनमें यह माना गया है कि Compensation की गणना के लिए Unborn Child (भ्रूण) की मृत्यु को बच्चे की मृत्यु के समान माना जाना चाहिए.
इन निर्णयों से सहमत होते हुए पीठ ने कहा कि गर्भ में पाँच महीने या उससे अधिक आयु का Unborn Children जन्म तक एक जीवित बच्चे के समान माना जा सकता है. कोर्ट ने कहा कि चूंकि इस मामले में एक ऐसे मानव भ्रूण (Unborn Child)की मृत्यु हुई है जिसे व्यक्ति का दर्जा दिया जा सकता है, इसलिए उसकी मृत्यु के लिए हर्जाने का दावा किया जा सकता है.
बेंच ने माना कि अपीलकर्ता-दावेदार भ्रूण (Unborn Child) की मृत्यु के लिए मुआवजे का हकदार है और भ्रूण को स्वतंत्र रूप से एक बच्चे के रूप में माना जाएगा. कोर्ट ने यह भी कहा कि मोटर वाहन अधिनियम, 1988 के तहत बच्चे के लिए Compensation अलग तरीके से निर्धारित किया जाता है और रेलवे दुर्घटना एवं अनटुवर्ड इंसीडेंट (Compensation) नियम, 1990 के अनुसार मृत्यु की स्थिति में Compensation की राशि 8,00,000 रुपये निर्धारित है.
अतः यह कहते हुए कि Unborn Child (भ्रूण) को बच्चे के समान माना जाएगा, पीठ ने कहा कि Unborn Child (भ्रूण/बच्चे) की मृत्यु को माँ की मृत्यु से अलग एक स्वतंत्र घटना माना जाएगा और इस प्रकार दावेदार को Unborn Child (भ्रूण) की मृत्यु के लिए अतिरिक्त 8,00,000 रुपये का Compensation मिलेगा.