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इलाहाबाद HC ने कहा, Trial Court फैसले को या तो हिंदी में लिखवाएं या फिर सिर्फ अंग्रेजी में, 2021 के दहेज हत्या के मामले में पति बरी

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा, Trial Court फैसले को या तो हिंदी में लिखवाएं या फिर सिर्फ अंग्रेजी में

Trial Court किसी भी मामले में जजमेंट सुना रही हैं तो उन्हें इस बात का ध्यान अनिवार्य रूप से रखना चाहिए कि फैसले की लैंग्वेज या तो हिंदी हो या फिर सिर्फ अंग्रेजी. दोनों भाषाओं को मिक्स करके फैसला सुनाया जाना स्वीकार्य नहीं है. आगरा की एक Trial Court द्वारा दिए गए आरोपित को बरी करने के फैसले को इस अनुचित प्रथा का एक ‘उत्कृष्ट उदाहरण’ बताते हुए, बेंच ने निर्देश दिया कि इस फैसले को उचित कार्रवाई के लिए चीफ जस्टिस के समक्ष रखा जाए और राज्य भर के सभी न्यायिक अधिकारियों को भेजा जाय.

यह कमेंट जस्टिस राजीव मिश्रा और जस्टिस डॉ. अजय कुमार-द्वितीय की बेंच ने 2021 के दहेज हत्या के एक मामले में पति को बरी करने के फैसले को चुनौती देने वाली आपराधिक अपील को खारिज करते हुए यह टिप्पणी की. बेंच ने सामान्य नियम (आपराधिक) के नियम-7 (परिपत्र जी.एल. संख्या 8/एक्स-ई-5, दिनांक 11 अगस्त, 1951 और सी.ई. संख्या 125/एक्स-ई-5, दिनांक 2 दिसंबर, 1972) का हवाला देते हुए कहा कि देवनागरी लिपि में हिंदी हाई कोर्ट के अधीनस्थ सभी आपराधिक अदालतों की भाषा है.

न्यायिक अधिकारियों को हिंदी या अंग्रेजी में फैसले लिखने की अनुमति है, लेकिन दोनों का मिश्रण नहीं हो सकता. अपने 16 पेज के आदेश में, कोर्ट ने टिप्पणी की कि विवादित निर्णय 54 पृष्ठों और 199 अनुच्छेदों में था. जिनमें से 63 अनुच्छेद अंग्रेजी में, 125 हिंदी में और 11 अनुच्छेदों में दोनों भाषाओं का प्रयोग किया गया था. कुछ स्थानों पर आधा वाक्य हिंदी में और आधा अंग्रेजी में था.

इलाहाबाद हाई कोर्ट में यह मामला सुनवाई के लिए आगरा जिले से आया था. केस के फैक्ट्स के अनुसार महिला की मृत्यु शादी के सात वर्ष के भीतर और अप्राकृतिक थी. गवाहों के बयान विरोधाभासी थे और कोई मृत्यु से ठीक पहले कोई क्रूरता सिद्ध नहीं हुई. रिकॉर्ड से यह भी सामने आया कि पति ने पत्नी को अस्पताल पहुँचाया. अस्पताल में हुए खर्च के बिल भरे.

Trial Court से हिंदी में फैसले लिखने का मुख्य उद्देश्य यह है कि आम वादी अदालत द्वारा लिखे गए फैसले को समझ सके

विवाहिता की मौत हो जाने के बाद उसका अंतिम संस्कार किया. यह उसके सद्भावपूर्ण आचरण को दर्शाता है. हाईकोर्ट ने कहा कि Trial Court का फैसला साक्ष्यों की सही सराहना पर आधारित है और अपील खारिज कर दी. कोर्ट ने अपने फैसले में कहा हिंदी भाषी राज्य होने के नाते यूपी में Trial Court से हिंदी में फैसले लिखने का मुख्य उद्देश्य यह है कि आम वादी अदालत द्वारा लिखे गए फैसले को समझ सके और अदालत द्वारा उसके दावे को स्वीकार या खारिज करने के लिए बताए गए कारणों को भी समझ सके.

“हिंदी-भाषी राज्य में हिंदी में निर्णय देने का उद्देश्य ही विफल हो जायेगा, “जब कोई निर्णय आंशिक रूप से अंग्रेजी में और आंशिक रूप से हिंदी में लिखा जाता है. केवल हिंदी भाषा जानने वाला एक सामान्य व्यक्ति अंग्रेजी में लिखे गए निर्णय में निचली अदालत के न्यायाधीश द्वारा दिए गए कारणों और तर्कों को समझ नहीं पाएगा.”
कोर्ट ने कमेंट किया

कोर्ट ने यह भी कहा कि “यदि कोई निर्णय हिंदी में लिखा गया है और Trial Court का न्यायिक अधिकारी हाई कोर्ट या सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के किसी विशिष्ट भाग और/या अंश पर निर्भर है, तो निश्चित रूप से, उसे हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के ऐसे अंश को अंग्रेजी में लिखवाने की स्वतंत्रता है.

इसी प्रकार यदि कोई निर्णय अंग्रेजी में लिखा गया है और मृत्यु पूर्व कथन हिंदी में दर्ज है तो निश्चित रूप से ऐसे मृत्यु पूर्व कथन को निर्णय में शब्दशः उद्धृत किया जा सकता है और पीठासीन अधिकारी को भी गवाह के साक्ष्य के कुछ अत्यंत महत्वपूर्ण और प्रासंगिक अंश हिंदी में दर्ज करने की स्वतंत्रता है.”

न्यायालय ने अपने निर्णय की प्रति राज्य के न्यायिक अधिकारियों (Trial Court) को इस ‘आशा और विश्वास’ के साथ प्रसारित करने का निर्देश दिया कि वे अपने निर्णय हिंदी या अंग्रेजी में लिखेंगे.

प्रकरण के गुण-दोष के संबंध में बेंच ने सबसे पहले Trial Court के उस निष्कर्ष की जाँच की जिसमें अभियुक्तों को भारतीय दंड संहिता की धारा 498-ए, 304-बी और दहेज निषेध अधिनियम की धारा 4 के तहत अपराधों से बरी कर दिया गया था.

कोर्ट ने इस सुस्थापित कानून को दोहराया कि किसी बरी करने के फैसले में हस्तक्षेप केवल तभी स्वीकार्य है जब निर्णय में स्पष्ट विकृति, गलत व्याख्या या भौतिक साक्ष्य का लोप हो, न कि केवल इसलिए कि कोई अन्य दृष्टिकोण संभव है.

रिकॉर्ड की जांच करते हुए बेंच ने कहा कि मृतका की शादी के सात साल के भीतर मृत्यु हो गई थी और मृत्यु अप्राकृतिक थी, लेकिन अभियोजन पक्ष धारा 304-बी आईपीसी के आवश्यक तत्वों को साबित करने में विफल रहा.

यह नोट किया गया कि कथित दहेज की मांग के संबंध में क्रूरता या उत्पीड़न का कोई विशिष्ट कृत्य साबित नहीं हुआ. अभियोजन पक्ष ‘मृत्यु से ठीक पहले’ कोई क्रूरता या उत्पीड़न दिखाने में विफल रहा जो धारा 113-बी के तहत वैधानिक अनुमान बनाता है.

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