संविधान के अनुच्छेद 226 का इस्तेमाल किसी तीसरे पक्ष द्वारा सरकारी कर्मचारी के Transfer की मांग करने के लिए नहीं किया जा सकता
इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ बेंच ने कहा, Transfer Policy सिर्फ सलाह देने वाली है

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा है कि भारत के संविधान के अनुच्छेद 226 का इस्तेमाल किसी तीसरे पक्ष द्वारा सरकारी कर्मचारी के Transfer की मांग करने के लिए नहीं किया जा सकता है. यह मानते हुए कि Transfer Policy कोई लागू करने योग्य अधिकार प्रदान नहीं करती है और याचिकाकर्ता के पास सरकारी कर्मचारी के Transfer की मांग करने का अधिकार नहीं था कोर्ट ने अपने रिट क्षेत्राधिकार का प्रयोग करने से इनकार करते हुए रिट को योग्यताहीन मानते हुए खारिज कर दिया है.
यह फैसला इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ बेंच के जस्टिस शेखर बी सराफ और जस्टिस मंजीव शुक्ला की बेंच ने सुनाया है. कोर्ट ने सुनवाई पूरी होने के बाद नवंबर में फैसला सुरक्षित रख लिया था जो अब सुनाया गया है. यह रिट याचिका उत्तर प्रदेश के उन्नाव जिले में तैनात फूल चंद की तरफ से दाखिल की गयी थी. याचिका में कोर्ट से मांग की गयी थी कि मैंडमस की प्रकृति का एक रिट आदेश या निर्देश जारी करें, जिसमें विपक्षी को उत्तर प्रदेश राज्य के मुख्य सचिव द्वारा 06.05.2025 को जारी Transfer Policy का पालन सुनिश्चित करने का आदेश दिया जाए. इसके साथ ही ही एक प्रतिवादी के तलादले की मांग भी रिट में उठायी गयी थी.
याचिकाकर्ता की ओर से यह तर्क दिया गया कि प्रतिवादी नंबर 6, 1997 में ब्लॉक सफिपुर में ग्राम विकास अधिकारी के रूप में नियुक्त किया गया था. उन्हें 2021 में सहायक विकास अधिकारी (पंचायत) के पद पर पदोन्नत किया गया. इसके बाद उनका Transfer विकास खंड असोहा में कर दिया गया. 2022 में फिर से उनका तबादला सफिपुर में कर दिया गया.
याचिकाकर्ता की ओर से पेश हुए अधिवक्ता ने तर्क दिया कि प्रतिवादी नंबर 6 विभिन्न विकास योजनाओं के तहत सरकारी धन के गबन में शामिल रहा है और समय-समय पर विभिन्न व्यक्तियों ने उसके काम के संबंध में शिकायतें प्रस्तुत की हैं. चूंकि वह प्रारंभिक नियुक्ति की तारीख से उन्नाव जिले में काम कर रहा है और अधिकांश समय वह विकास खंड सफिपुर में तैनात रहा है.

उसने सफिपुर में अपनी लंबी पोस्टिंग और अनुभव का फायदा उठाकर सरकारी धन को हड़पने में शामिल रहा है जो गांवों के विकास कार्यों के लिए था. गबन के संबंध में विभिन्न शिकायतें पहले ही उच्च अधिकारियों के समक्ष प्रस्तुत की जा चुकी हैं. याचिकाकर्ता ने विभाग के उच्च अधिकारियों के समक्ष भी विभिन्न अभ्यावेदन प्रस्तुत किए हैं, जिसमें प्रतिवादी नंबर 6 को दूसरे जिले में Transfer करने का अनुरोध किया गया है.
कोर्ट ने इस बात पर विचार किया कि भारत के संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत सरकारी कर्मचारियों के Transfer और पोस्टिंग से जुड़े मामलों में उसके रिट क्षेत्राधिकार का इस्तेमाल किस हद तक किया जा सकता है. इस मामले में लोकस स्टैंडी, कार्यकारी ट्रांसफर नीतियों को लागू करने और प्रशासनिक मामलों में न्यायिक संयम पर महत्वपूर्ण सवाल उठाए गए.
याचिकाकर्ता की ओर से यह तर्क दिया गया कि राज्य Transfer Policy एक जिले में निर्धारित कार्यकाल पूरा होने के बाद सरकारी कर्मचारियों के Transfer को अनिवार्य करती है और नीति को लागू करने में विफलता सार्वजनिक हित को नुकसान पहुंचाती है. वकील ने तर्क दिया कि एक ही स्थान पर लंबे समय तक पोस्टिंग सार्वजनिक प्रशासन में पारदर्शिता और जवाबदेही को कमजोर करती है, जिसके लिए अनुच्छेद 226 के तहत न्यायिक हस्तक्षेप की आवश्यकता है.
Transfer और पोस्टिंग पूरी तरह से प्रशासनिक कार्य हैं
स्टेट की ओर से तर्क दिया गया कि याचिका सुनवाई योग्य नहीं है क्योंकि याचिकाकर्ता न तो व्यक्तिगत रूप से और न ही कानूनी रूप से पीड़ित था. वकील ने कहा कि Transfer और पोस्टिंग पूरी तरह से प्रशासनिक कार्य हैं और कार्यकारी ट्रांसफर नीतियां केवल दिशानिर्देश हैं न कि किसी कानून के तहत बनाए गए वैधानिक नियम. किसी भी कानून, सेवा नियम, या वैधानिक नियम के उल्लंघन का कोई प्रावधान नहीं दिखाया गया है जो रिट क्षेत्राधिकार के प्रयोग को सही ठहरा सके.
सरकारी कर्मचारी का Transfer पूरी तरह से राज्य सरकार के अधिकार क्षेत्र में आता है और यह राज्य सरकार पर निर्भर करता है कि वह सार्वजनिक हित और प्रशासनिक जरूरतों को ध्यान में रखते हुए अपने कर्मचारियों के ट्रांसफर और पोस्टिंग के बारे में फैसला ले. यह सच हो सकता है कि याचिकाकर्ता और अन्य लोगों ने प्रतिवादी नंबर 6 के काम के खिलाफ कुछ शिकायतें दर्ज की हैं और प्रतिवादी अधिकारी उन शिकायतों पर विचार कर सकते हैं और प्रतिवादी नंबर 6 को एक जगह से दूसरी जगह ट्रांसफर करने का फैसला ले सकते हैं.
याचिकाकर्ता, जिसे प्रतिवादी नंबर 6 के ट्रांसफर न होने से व्यक्तिगत रूप से कोई नुकसान नहीं हुआ है, उसे प्रतिवादी नंबर 6 को जिले से बाहर ट्रांसफर करने के लिए इस कोर्ट के रिट क्षेत्राधिकार का इस्तेमाल करने की अनुमति नहीं दी जा सकती. हमारा यह भी मानना है कि ट्रांसफर पॉलिसी सरकारी कर्मचारियों के वार्षिक ट्रांसफर करने के लिए संबंधित अधिकारियों के लिए मार्गदर्शक कारकों के रूप में है, लेकिन उक्त Transfer Policy के प्रावधानों को कानून की अदालत के माध्यम से लागू नहीं किया जा सकता है.
बेंच ने कहा
Case No.: WRIT – C No. – 10470 of 2025; Ful Chandra vs. State Of U.P. Thru. Addl. Chief Secy. Panchayat Raj Lko. and Others
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