Charge Sheet सार्वजनिक दस्तावेज नहीं, उन्हें सार्वजनिक मंच पर उपलब्ध कराना Cr PC की व्यवस्था के विपरीत
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने यूपी पुलिस की वेबसाइट पर सभी आरोप पत्र अपलोड करने की मांग वाली पीआईएल खारिज की

इलाहाबाद हाइकोर्ट की लखनऊ बेंच ने महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि किसी भी केस में पुलिस की तरफ से दिया जाने वाला charge sheet पब्लिक डाक्यूमेंट नहीं है. उसे पब्लिक फोरम पर उपलब्ध कराना दंड प्रक्रिया संहिता में दी गयी व्यवस्था के विपरीत होगा. इस कमेंट के साथ दो जजों की बेंच ने सभी charge sheet को जांच पूरी होने के 24 घंटे में अपलोड करने की मांग को लेकर दाखिल जनहित याचिका को खारिज कर दिया है.
यह जनहित याचिका इलाहाबाद हाइकोर्ट की लखनऊ बेंच में 2020 में मोहम्मद इरफान सिद्दीकी द्वारा दायर की गई थी. याचिका के माध्यम से उत्तर प्रदेश पुलिस को यह निर्देश देने की मांग की गई थी कि प्रत्येक मामले में जांच पूरी होने के 24 घंटे के भीतर charge sheet को पुलिस विभाग की आधिकारिक वेबसाइट पर अपलोड किया जाए.
सुनवाई पूरी होने के बाद हाइकोर्ट के जस्टिस राजन रॉय और जस्टिस अबधेश कुमार चौधरी की बेंच ने सुप्रीम कोर्ट के द्वारा वर्ष 2024 में दिये गये फैसले पर भरोसा करते हुए कहा कि charge sheet सार्वजनिक दस्तावेज नहीं होते और उन्हें सार्वजनिक मंच पर उपलब्ध कराना दंड प्रक्रिया संहिता की व्यवस्था के विपरीत है.
charge sheet को सार्वजनिक डोमेन में डालना अभियुक्त, पीड़ित और जांच एजेंसी के अधिकारों का उल्लंघन कर सकता है

जिसमें स्पष्ट किया गया था कि charge sheet को सार्वजनिक डोमेन में डालना अभियुक्त, पीड़ित और जांच एजेंसी के अधिकारों का उल्लंघन कर सकता है. ऐसा करना आपराधिक प्रक्रिया की विधिक संरचना के अनुरूप नहीं है. जबकि याचिका में मोहम्मद इरफान सिद्दीकी द्वारा मांग की गयी थी कि उत्तर प्रदेश राज्य के सभी थानों में दर्ज मामलों के charge sheet को पुलिस की आधिकारिक वेबसाइट पर अपलोड करने का निर्देश दिया जाय.
याचिका में यह भी मांग की गई थी कि संबंधित पुलिस अधिकारी यह सुनिश्चित करें कि charge sheet की प्रमाणित प्रति अभियुक्त, उसके प्रतिनिधि, पैरोकार या वकील को आवेदन किए जाने के 24 घंटे के भीतर उपलब्ध कराई जाए. राज्य सरकार के अधिवक्ता ने याचिका का विरोध करते हुए काउंटर एफीडेविट में सरकार की ओर से कहा कि कानून में ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है जो जांच के बाद तैयार किए गए charge sheet को वेबसाइट पर अपलोड करने का दायित्व पुलिस पर डालती हो.
तर्क दिया गया कि ऐसा करना न्यायालय की प्रक्रिया में अनावश्यक हस्तक्षेप के समान होगा विशेष रूप से उन मामलों में जहां charge sheet दाखिल किया जा चुका है या किया जाना प्रस्तावित है. सुप्रीम कोर्ट के तर्कों को अपनाते हुए इलाहाबाद हाइकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि याचिकाकर्ता द्वारा मांगी गई राहत देने का कोई औचित्य नहीं है. पीठ ने कहा कि याचिका में कोई दम नहीं है और इसे निरस्त किया जाना उचित है. इसी आधार पर हाइकोर्ट ने जनहित याचिका खारिज को खारिज कर दिया.
प्रदेश में जीएसटी अधिकरण गठित, वैकल्पिक उपचार की उपलब्धता के आधार पर याचिका खारिज

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने जीएसटी अधिकरण के गठन के बाद अपीलीय अधिकारी के आदेश के खिलाफ हाईकोर्ट में दाखिल होने वाली याचिका वैकल्पिक अनुतोष की उपलब्धता के आधार पर खारिज कर दी है. यह आदेश जस्टिस पीयूष अग्रवाल ने मेसर्स केपी इंडस्ट्रीज की याचिका पर दिया है. कोर्ट ने कहा अधिकरण में अपील दाखिल कर अपीलीय अधिकारी के आदेश को चुनौती दे.
जीएसटी अधिकरण गठित न होने के कारण अभी तक व्यापारी प्रथम अपील के बाद सीधे हाईकोर्ट में अनुच्छेद 226 में याचिका दायर करते थे. याचिका पर अधिवक्ता आदित्य पांडेय ने पक्ष रखा. अपर मुख्य स्थाई अधिवक्ता रविशंकर पांडेय ने कोर्ट को बताया कि केंद्र सरकार ने जीएसटी अधिकरण के गठन की अधिसूचना जारी कर दी है. पीठासीन अधिकारियों की भी नियुक्ति की गई है जो 21 जनवरी 26 से कार्यभार ग्रहण कर लेंगे और अधिकरण कार्य करने लगेगा. इसलिए याचिका पोषणीय नहीं है.