नियुक्तियों की Security सुनिश्चित की जाए, यदि ऐसा नहीं है तो शुआट्स नैनी के 53 शिक्षकों को एकमुश्त मुआवजे का विकल्प हो
दो दशक से कार्यरत शिक्षकों को कोर्स बंद होने से हटाना विश्वविद्यालय का अधिकार किंतु उनके भविष्य का रखें ध्यान

कोर्ट ने प्रयागराज में नैनी स्थित सैम हिग्गिनबॉटम यूनिवर्सिटी ऑफ एग्रीकल्चर, टेक्नोलॉजी एंड साइंसेज (शुआट्स) को निर्देश दिया है कि वह दशक भर से अधिक समय तक पढ़ाने वाले शिक्षकों (प्रोफेसरों) के मामले में सहानुभूति पूर्वक विचार करे.
उनकी नियुक्तियों की सुरक्षा (Security) सुनिश्चित करने का प्लान लाये और यदि परिस्थितियां अनुकूल नहीं हैं तो किसी अन्य पाठ्यक्रम में नियुक्त करने अथवा उन्हें एकमुश्त मुआवजा देने के विकल्प पर सोचे ताकि शिक्षक अपना भविष्य सुरक्षित कर सकें. हालांकि कोर्ट ने कोर्स बंद करने के विश्वविद्यालय की कार्यवाही को नियमानुसार माना. जस्टिस सौरभ श्याम शमशेरी की एकलपीठ ने शुआट्स तथा छह अन्य याचिकाओं में 51 शिक्षकों की याचिका निस्तारित करते हुए यह आदेश दिया है.
कोर्ट ने यह तथ्य भी ध्यान में रखा कि राज्य स्तरीय जांच के दौरान क्या अंतरिम आदेश पारित किया जा सकता है? कहा, विश्वविद्यालय के निर्णय पर रोक लगाने संबंधी राज्य के निर्देशों में हस्तक्षेप करने का कोई कारण नहीं है, फिर भी राज्य नया निर्णय ले. शुआट्स भी राज्य सरकार के समक्ष आज से तीन सप्ताह के भीतर स्पष्टीकरण प्रस्तुत करे. इसके बाद राज्य सरकार तीन सप्ताह के भीतर अंतिम निर्णय लेगी.
नियुक्तियों की सुरक्षा (Security) सुनिश्चित करने का प्लान लाये शुआट्स
कोर्ट ने कहा, शुआट्स राज्य सरकार के निर्देश को अपने विरुद्ध नहीं ले. विश्वविद्यालय और राज्य के लिए यह विकल्प खुला रखा गया है कि यदि विश्वविद्यालय के निर्णय में हस्तक्षेप का कोई कारण नहीं है तो राज्य सरकार याचीगण के लिए मुआवजा के संबंध में निर्णय ले और शुआट्स उचित योजना प्रस्तुत करे. शुआट्स ने 53 शिक्षकों को हटाने संबंधी सीनेट के 28 मार्च 2025 के आदेश पर राज्य सरकार द्वारा रोक लगाए जाने को हाई कोर्ट में चुनौती दी थी.
कोर्ट ने प्रतिवादी डा. नरगिस फातिमा व 15 अन्य, डा. सुंधाशु त्रिपाठी तथा आठ अन्य, डा. विकास श्रीवास्तव व पांच अन्य, राहुल चार्ल्स व आठ अन्य, अरुण मसीह व आठ अन्य तथा इंजीनियर विनय त्रिपाठी व पांच अन्य (कुल 51) याचीगण की याचिकाओं को भी सम्बद्ध कर लिया था. बीती 16 फरवरी को आदेश सुरक्षित रख लिया था.
प्रतिवादी शिक्षकों याचिकाओं में मांग की थी कि उन्हें ग्रांट-इन-एड पोस्ट में समायोजित कर उनकी सेवाओं की सुरक्षा की जाए. इसी महीने की शुरुआत में जारी शासनादेश में कहा गया था कि स्ववित्तपोषित श्रेणी के 53 शिक्षकों से अंतिम निर्णय होने तक कार्य लिया जाएगा और उन्हें वेतन का भुगतान भी होगा.
शिक्षकों का आरोप है कि प्रक्रियाओं की अनदेखी करते हुए विश्वविद्यालय प्रबंधन ने उन्हें सेवा से हटा दिया है. राज्य सरकार ने शिक्षकों की शिकायत पर आयुक्त प्रयागराज मंडल की अध्यक्षता में जांच करवाई थी. इसमें यह तथ्य सामने आया था कि कई नियुक्तियां विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी), भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आइसीएआर) तथा अन्य नियामक संस्थाओं द्वारा निर्धारित न्यूनतम शैक्षणिक एवं चयन मानकों के अनुरूप नहीं हैं. अखिल भारतीय स्तर पर विज्ञापन जारी नहीं किया गया. विधिवत चयन समिति बनाए बिना ही 26 शिक्षकों की नियुक्ति की गई.
सोसायटी की भूमिधरी जमीन का इंद्राज निरस्त करने के आदेश पर रोक, राज्य सरकार व गांव सभा से जवाब तलब

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने राजस्व अभिलेख की पचास साल से चली आ रही याची की प्रविष्टि बिना सुनवाई का मौका दिए निरस्त करने के एसडीओ सदर शाहजहांपुर, अपर आयुक्त बरेली व राजस्व परिषद प्रयागराज के आदेशो पर रोक लगा दी है और राज्य सरकार, गांव सभा व अन्य विपक्षियों से जवाब मांगा है. अगली सुनवाई 24 अप्रैल को होगी. यह आदेश जस्टिस सीके राय ने शिक्षा प्रसार समिति शाहजहांपुर की याचिका पर दिया है.
याची की तरफ से पक्ष रखने वाले अधिवक्ता का कहना था कि याची की भूमिधरी जमीन है. जिसमें सोसायटी शिक्षा का प्रसार का काम कर रही है. अब उसी जमीन को अधिग्रहण किए बगैर सरकार जिला जेल का निर्माण करना चाहती है. सरकार का कहना है कि यह गांव सभा की बंजर जमीन है. जबकि याची सोसाइटी के नाम यह वर्षों से भूमिधरी अधिकार के साथ राजस्व पत्रावली में दर्ज है. जिसे निरस्त कर दिया गया. जिसके खिलाफ अपील व पुनरीक्षण खारिज कर दी गई. तीनों आदेशों को हाईकोर्ट में चुनौती दी गई है.