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जानलेवा हमले (307 IPC) के आरोपियों को संदेह का लाभ Punishment quashed, कोर्ट ने कहा, अभियोजन अपराध साबित करने में नाकाम

जानलेवा हमले (307 IPC) के आरोपियों को संदेह का लाभ Punishment quashed, कोर्ट ने कहा, अभियोजन अपराध साबित करने में नाकाम

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने जानलेवा हमले के आरोपी अलाउद्दीन व कमालुद्दीन उर्फ जोखन को सत्र अदालत गाजीपुर द्वारा सुनाई गई चार साल की कैद (Punishment) की 11 अक्टूबर 1988 की सजा (Punishment) संदेह का लाभ देते हुए रद कर दी है और अपराध से बरी कर दिया है. कोर्ट ने कहा कि अभियोजन संदेह से परे अपराध साबित करने में नाकाम रहा. यह आदेश जस्टिस अविनाश सक्सेना ने आरोपियों के अधिवक्ता इंतेखाब आलम खान को सुनकर दिया है.

घटना में घायल ताजपुर कुर्रा निवासी मोइनुद्दीन खान ने 19 जनवरी 86 को गाजीपुर के दिलदार नगर थाने में एफआईआर दर्ज की थी. आरोप है कि वह 19 जनवरी 86 को गांव से दिलदार नगर अपने सिनेमाघर जा रहा था. तेलियाबाग में दोनों आरोपितों व तीन अन्य ने बल्लम गंडासा, बंदूक असलहे से लैस होकर घेर लिया और हमला किया. जिसमें वह घायल हो गया. चोट गोली लगने से आई. पुलिस ने दो अभियुक्तों के खिलाफ चार्जशीट दी. असलहे बरामद नहीं हुए. तथ्य आया दोनों पक्षों में पुरानी दुश्मनी थी. आरोप लगाया सामान्य उद्देश्य से हत्या का प्रयास किया गया.

अपर सत्र अदालत ने बिना साक्ष्य दो आरोपितों को दोषी करार दिया और सजा (Punishment) सुनायी

आरोपियों का कहना था दुश्मनी के कारण झूठा फंसाया गया है, तीन अन्य अभियुक्तों की तलाश नहीं की गई जबकि दो पर ही आरोप से विधि विरुद्ध जमाव का अपराध नहीं बनता. अपर सत्र अदालत ने बिना साक्ष्य दो आरोपितों को दोषी (Punishment) करार दिया. अभियोजन साबित नहीं कर सका कि घटना में दो के अलावा भी अभियुक्त थे. मौखिक गवाही पर सजा सुनाई गई है.

हत्या के 44 साल बाद जीवित बचा एक आरोपी बरी, संदेह का मिला लाभ

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 1982 में की गई गोली मारकर हत्या और जलाने की घटना में जीवित बचे एक सजायाफ्ता (Punishment) आरोपी जाहर सिंह को 44 साल बाद बरी कर दिया है और सत्र अदालत की सजा (Punishment)  रद कर दी है. यह फैसला जस्टिस सिद्धार्थ और जस्टिस जेके उपाध्याय की खंडपीठ ने महाराज सिंह व अन्य की अपील की सुनवाई करते हुए दिया है. अन्य अपीलार्थियों की इस दौरान मृत्यु हो चुकी थी, केवल जाहर सिंह जीवित बचे थे. उनकी अपील की सुनवाई की गई.

कोर्ट ने कहा अभियोजन संदेह से परे अपराध साबित करने में नाकाम रहा. सत्र अदालत ने भी अभियुक्त के धारा 313 में दर्ज बयान को समझने में गलती की और धारा 149 में हत्या के सामान्य आशय के अपराध का दोषी माना और उम्रकैद की सजा (Punishment)  सुनाई.

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जिसमें कहा था कि मुख्य अभियुक्त जोगराज केस में उसके पिता ने गवाही देने से इंकार कर दिया था, इसलिए बिना सबूत उसे फंसाया गया है. कोर्ट ने कहा सत्र अदालत ने इस बयान पर विचार नहीं किया. कोर्ट ने कहा अभियोजन यह साबित नहीं कर सका कि अपीलार्थी ने देशी पिस्टल से फायर किया था. हत्या में लिप्त होने के सबूत नहीं मिले. इसलिए कोर्ट ने जाहर सिंह को बरी कर दिया.

घटनाक्रम के अनुसार 17/18 अप्रैल 82 की आधी रात अभियुक्तों ने असलहे से लैश होकर शिकायतकर्ता अमर सिंह के अभीरतपुर गांव के घर पर धावा बोल दिया. कुल्हाड़ी से दरवाजा तोड़ दिया. हमले से बचने के लिए राम नारायण भागा तो पीछा करके उसे  घेर लिया गया और बंदूक की गोली से मारकर आग के हवाले कर दिया.

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शिकायतकर्ता की मौसी रामकली भी घटना में घायल हुईं थीं. उपचार के दौरान उन्होंने भी दम तोड़ दिया था. घटना के दूसरे दिन 18 अप्रैल को एटा जनपद के जैठरा थाने में एफआईआर दर्ज की गई. विवचेना के बाद पुलिस ने चार्जशीट दाखिल की. सत्र अदालत ने आरोपियों को सामान्य उद्देश्य से हत्या का दोषी करार दिया और उम्रकैद की सजा (Punishment) सुनाई. जिसे अपील में चुनौती दी गई थी.

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