Property संवैधानिक या कानूनी अधिकार ही नहीं एक ह्यूमन राइट भी है, 12 सप्ताह में करें मुजावजे का भुगतान

Property (प्रॉपर्टी) का अधिकार सिर्फ एक संवैधानिक या कानूनी अधिकार ही नहीं है, बल्कि एक ह्यूमन राइट भी है और किसी नागरिक की प्रॉपर्टी सिर्फ पब्लिक मकसद के लिए सही तरीके से और कानून के मुताबिक सही मुआवजा देकर ही हासिल की जा सकती है. सुप्रीम कोर्ट द्वारा कही गयी बातों को रिफरेंस के तौर पर इस्तेमाल करते हुए यह कमेंट इलाहाबाद हाई कोर्ट के जस्टिस प्रशांत कुमार ने किया और पिटीशन मंजूर करते हुए कहा कि अगर, रेस्पोंडेंट, पिटीशनर की जमीन पर बनी सड़क का इस्तेमाल करना चाहता है तो उसका इस्तेमाल सिर्फ सही तरीके से और कानून के मुताबिक पिटीशनर को सही मुआवजा देने के बाद ही किया जा सकता है.
कोर्ट ने अधिकारियों को निर्देश दिया है कि वे पिटीशनर को दिए जाने वाले मुआवजे का हिसाब लगाएं और आदेश की तारीख से 12 हफ्ते के अंदर पेमेंट करें. प्रकरण बाराबंकी जिले के हैदरगढ़ तहसील के गांव अंडका का है. याचिकाकर्ता Property प्लॉट नंबर 328, जिसका साइज 1.025 हेक्टेयर है, के मालिक और खेती करने वाले हैं, जो उनके पुरखों के समय से उनके कब्जे में है.
उस प्लॉट (Property) के कुल एरिया में से कानून के तहत जमीन (Property) अधिग्रहण की सही प्रक्रिया अपनाए बिना लगभग 0.109 हेक्टेयर एरिया में 4 मीटर चौड़ा पब्लिक रास्ता (खड़ंजा) बना दिया गया है. याचिका में मांग की गयी थी कि 0.109 हेक्टेयर जमीन (Property) के लिए तुरंत सही मुआवजा का भुगतान कराया जाय.
याचिका में कहा गया कि खड़ंजा के निर्माण के दौरान, गाँव के मुखिया और ग्राम पंचायत के संबंधित अधिकारियों ने याचिकाकर्ताओं को भरोसा दिलाया कि पंचायत राज डिपार्टमेंट के बड़े अधिकारियों से बातचीत की गई है और फंड जारी होने पर उन्हें अधिग्रहित जमीन (Property) का मुआवजा दे दिया जाएगा.
Property के असली एरिया का पता लगाने के लिए रेवेन्यू इंस्पेक्टर ने डिमार्केशन की कार्रवाई की
सड़क बनाने के लिए इस्तेमाल की गई जमीन (Property) के असली एरिया का पता लगाने के लिए रेवेन्यू इंस्पेक्टर, सिद्धौर ने 18.08.2023 को डिमार्केशन की कार्रवाई की. इससे यह कन्फर्म हुआ कि प्लॉट नंबर 328 के दक्षिण की ओर पहले से ही एक सड़क दर्ज थी, लेकिन ग्राम पंचायत-अंडका के ग्राम प्रधान ने पूरब, उत्तर और पश्चिम की ओर कुल 272 मीटर लंबाई और 4 मीटर चौड़ाई में नया कंस्ट्रक्शन किया था, जो 0.109 हेक्टेयर के बराबर है, जो रेवेन्यू रिकॉर्ड में सड़क के तौर पर दर्ज नहीं है.
सब-डिविजनल मजिस्ट्रेट, हैदरगढ़ ने 16.04.2024 के ऑर्डर के जरिए डिमार्केशन रिपोर्ट को मान लिया और यह देखते हुए कि कंस्ट्रक्शन पब्लिक इंटरेस्ट में किया गया था, यह माना कि जमीन का कब्जा पिटीशनर्स को नहीं दिया जा सकता.

मुआवज़े के लिए पिटीशनर्स ने 20.07.2024 को रजिस्टर्ड पोस्ट से अपनी शिकायतें संबंधित रेस्पोंडेंट्स को भेजीं और 07.08.2024 को फिर से रजिस्टर्ड पोस्ट से रेस्पोंडेंट्स को रिमाइंडर लेटर भेजा, लेकिन उसके बाद भी उन्होंने पिटीशनर्स की शिकायतों पर ध्यान नहीं दिया.
पिटीशनर्स के वकील का कहना था कि पब्लिक रास्ते (खड़ंजा) का कंस्ट्रक्शन बिना एक्विजिशन और बिना मुआवजा दिए किया गया है, जो कानून के खिलाफ है. पिटीशनर, जमीन अधिग्रहण, पुनर्वास और फिर से बसाने में सही मुआवजा और पारदर्शिता के अधिकार एक्ट, 2013 के नियमों के मुताबिक, एक्वायर की गई जमीन की मौजूदा मार्केट कीमत से चार गुना ज़्यादा मुआवजा पाने के कानूनी हकदार हैं.
एडिशनल चीफ स्टैंडिंग काउंसिल और वकील ने कहा कि सब-डिविजनल मजिस्ट्रेट, हैदरगढ़ की 07.10.2024 की जांच रिपोर्ट के मुताबिक, साउथ कैनाल पाथवे प्रतापगंज के उत्तर दिशा में, पूरब और पश्चिम दिशा में खेत के चारों ओर लगभग पिछले 30-40 सालों से एक कच्ची सड़क थी, जिस पर गांव वाले आते-जाते थे, उस जमीन का इस्तेमाल पहले भी सड़क के तौर पर किया जा चुका था और अब उन्होंने एक खड़ंजा सड़क बना ली है.
उन्होंने कहा कि खड़ंजा सालों पहले उसी मौजूदा कच्ची सड़क पर पब्लिक इंटरेस्ट में बनाया गया था और उस समय याचिकाकर्ताओं ने कोई आपत्ति नहीं जताई थी. उन्होंने सैयद मकबूल अली बनाम स्टेट ऑफ़ यू.पी. एंड अन्य (2011) 4 SCR 238 में दिए गए माननीय सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला दिया, जिसमें कहा गया था कि दशकों पुराने मामलों में मुआवजे की मांग सही नहीं है.
कोर्ट ने पार्टियों के वकीलों की दलीलें सुनने और रिकॉर्ड देखने के बाद कहा कि, यह साफ है कि जिस जमीन (Property) की बात हो रही है, वह पिटीशनर्स के नाम पर दर्ज है और उस जमीन (Property) का इस्तेमाल आम लोग सिर्फ आने-जाने के लिए कर रहे थे.
इस बात पर कोई शक नहीं है कि पिटीशनर्स ने ऐसे इस्तेमाल पर कभी कोई एतराज नहीं जताया था और उस जमीन (Property) को कभी भी सड़क बनाने के लिए नहीं लिया गया था. यह भी साफ है कि रेस्पोंडेंट्स ने बिना किसी कानूनी प्रोसेस को फॉलो किए और बिना कोई मुआवजा दिए पिटीशनर्स की जमीन के हिस्से पर एक पब्लिक रास्ता (खड़ंजा) बना लिया है.
कोर्ट ने कहा कि हम राज्य की इस दलील से हैरान हैं कि चूंकि जमीन (Property) पिछले 30-40 सालों से रास्ते के तौर पर इस्तेमाल हो रही थी, इसलिए यह एडवर्स पजेशन के बराबर होगा. राज्य एक वेलफेयर स्टेट है, इसलिए उसे एडवर्स पजेशन की दलील देने की इजाजत नहीं दी जा सकती.
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