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लोकसभा और विधानसभा चुनाव में NOTA आप्शन तो पंचायत चुनाव में क्यों नहीं, 4 सप्ताह में दाखिल करें जवाब

लोकसभा और विधानसभा चुनाव में NOTA आप्शन तो पंचायत चुनाव में क्यों नहीं, 4 सप्ताह में दाखिल करें जवाब

देश और प्रदेश के सर्वोच्च सदन के प्रतिनिधियों के चुनाव के दौरान ईवीएम में NOTA आप्शन दिया जाता है तो पंचायत चुनाव में ईवीएम के इस्तेमाल वाले स्थानों पर भी NOTA आप्शन दिया जाना चाहिए. इस मांग को लेकर इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ बेंच में जनहित याचिका दाखिल की गयी है. याचिका को संज्ञान लेते हुए हाई कोर्ट के दो जजों जस्टिस राजन रॉय और जस्टिस इंद्रजीत शुक्ला की बेंच ने जिम्मेदारों से चार सप्ताह में जवाब दाखिल करने को कहा है. इसके बाद दो सप्ताह का मौका याचिकाकर्ता को रिजवाइंडर दाखिल करने के लिए दिया गया है. याचिका पर अगली सुनवाई जनवरी के अंत में होने की संभावना है.

उत्तर प्रदेश में अगले साल के मध्य में होने वाले पंचायत चुनाव को बैलेट पेपर पर कराने की मांग में जनहित याचिका इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ बेंच में दाखिल की गयी है. जनहित याचिका में कहा गया कि उम्मीदवारों के नाम न होने से भ्रम पैदा होता है, खासकर जब कई उम्मीदवारों के सिंबल एक जैसे दिखते हों. सिर्फ सिंबल छापने से वोटर को स्पष्टता नहीं मिलती.

याचिका में मांग की गयी है कि उत्तर प्रदेश में वोटरों के लोकतांत्रिक अधिकारों को बनाए रखने के लिए भविष्य के चुनावों में NOTA ऑप्शन शामिल करें और उम्मीदवारों के नाम उनके अलॉट किए गए सिंबल के साथ NOTA छापा जाय.

उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनाव साल 2026 के अप्रैल से जून के मध्य होने की संभावना जतायी जा रही है. चुनाव कराने के लिए मतदाता सूची पर पहले ही काम शुरू करा दिया गया था. इसी बीच प्रदेश में एसआईआर की प्रक्रिया शुरू हो गयी. इससे इसकी चर्चा थोड़ी कमजोर पड़ी थी.

इससे पहले ही हाई कोर्ट में जनहित याचिका पहुंच गयी है. इसे सुनील कुमार मौर्य ने दाखिल किया है. वह मूलरूप से गोंडा जिले के रहने वाले हैं और अधिवक्ता के रूप में प्रैक्टिस करते हैं. कोर्ट ने इस जनहित याचिका को संज्ञान लिया और काउंटर और रिजवाइंडर दाखिल करने का मौका दे दिया.

पंचायत चुनाव में NOTA का कोई आप्शन नहीं होता

जनहित याचिका में कहा गया है कि उत्तर प्रदेश पंचायत चुनाव चाहे बैलेट पर हो या फिर ईवीएम से, इसमें NOTA का कोई आप्शन नहीं होता है. याचिका में कहा गया कि राज्य में लोकसभा, विधानसभा या शहरी स्थानीय निकाय (नगर निकाय) चुनावों में NOTA उम्मीदवारों की सूची के साथ ही होता है. मतदाताओं के पास अधिकार होता है कि उसे कोई प्रत्याशी पसंद न आए तो वह NOTA को वोट दे दे.

याचिका में बताया गया कि ग्रामीण चुनाव में उम्मीदवारों के नाम बैलेट पेपर पर नहीं छापे जाते. वास्तव में बैलेट पेपपर पर केवल प्रत्याशियों का सिंबल की छापा जाता है. ऐसा करना जो शहरी और ग्रामीण मतदाताओं के बीच एक ‘मनमाना’ वर्गीकरण बनाता है, जो भारत के संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन है.

याचिका में पीपल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज बनाम यूनियन ऑफ इंडिया (2013) मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला दिया गया, जहां यह माना गया कि वोट देने के अधिकार में वोट न देने का अधिकार भी शामिल है.

इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग को ईवीएम और बैलेट पेपर पर NOTA का ऑप्शन देने का निर्देश दिया. यह तर्क देते हुए कि नोटा गोपनीयता बनाए रखते हुए असहमति दर्ज करने का एकमात्र तरीका है. याचिका में कहा गया कि NOTA ऑप्शन से इनकार करके अधिकारी प्रभावी रूप से ऐसे मतदाता को मजबूर कर रहे हैं, जो सभी उम्मीदवारों को अस्वीकार करना चाहता है, या तो वोट देने से परहेज करे या गोपनीयता नियमों का उल्लंघन करे.

याचिका में आरटीआई से प्राप्त सूचना का हवाला दिया गया है. यह जवाब राज्य चुनाव आयोग की तरफ से दिया गया है. याचिका में उन्हें भी पार्टी बनाया गया है. 20 अगस्त 2025 की तारीख के एक जवाब में कमीशन ने कथित तौर पर माना कि पंचायत चुनावों के लिए बैलेट पेपर पर कोई NOTA ऑप्शन नहीं है. याचिका के अनुसार, कमीशन ने सिंबल अलॉटमेंट और वोटिंग के बीच कम समय में बड़ी संख्या में बैलेट पेपर जारी करने की जरूरत और नाम शामिल होने पर बैलेट डिजाइन करने में आने वाली मुश्किलों का हवाला दिया.

इस रुख को चुनौती देते हुए याचिकाकर्ता ने कहा है कि प्रशासनिक या लॉजिस्टिकल दिक्कतें आर्टिकल 19(1)(a) के तहत अभिव्यक्ति के मौलिक अधिकार और स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव के कानूनी अधिकार से इनकार करने का आधार नहीं हो सकतीं.  याचिका में प्रतिवादियों के इस कारण को कि नाम और नोटा छापना “कानूनी रूप से सही नहीं है” बताया गया.

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