धारा 11 के तहत हिंदू Marriage invalid होना विवाह तिथि से लागू माना जाएगा
इलाहाबाद HC ने कहा, गुजारा भत्ता देने का दायित्व नहीं

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है कि हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 11 के तहत एक बार विवाह को अमान्य घोषित (Marriage invalid) करने का आदेश पारित हो जाने पर, वह विवाह की तिथि से लागू होता है. विवाह हुआ ही नहीं (Marriage invalid) वह स्थिति बन जाती है. ऐसे मामले में पति, पत्नी को भरण-पोषण देने के लिए उत्तरदायी नहीं है.
दोनों पक्षों की शादी 2015 में हुई थी. लेकिन मतभेद और मनमुटाव के चलते पत्नी ने आईपीसी की धारा 498 ए, 406, 313, 354(ए)(1), 509, 323, 34 के तहत एफआईआर गाजियाबाद में दर्ज कराई. इसके बाद, उसने आईपीसी की धारा 451, 323, 34 के तहत एक और एफआईआर दर्ज कराई.
पति राजदेव सचदेवा और उसके परिवार वालों द्वारा दायर अग्रिम जमानत याचिका (Marriage invalid) की सुनवाई के दौरान, यह तथ्य सामने आया कि पत्नी की पहली शादी मौजूद थी. चूँकि पत्नी ने पहले अपनी पहली शादी से इन्कार किया और बाद में स्वीकार किया, इसलिए निचली अदालत ने पाया कि पत्नी ने अदालत में साफ-सुथरे तरीके से (Marriage invalid) आवेदन नहीं किया था. इसके बाद, पत्नी ने घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम, 2005 की धारा 12 और 23 के तहत मामला दर्ज कराया.

मामले के लंबित रहने के दौरान, पति ने हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 11 के तहत विवाह को अमान्य (Marriage invalid) घोषित करने के लिए आवेदन दायर किया. पत्नी ने भरण-पोषण और मुकदमे के खर्च के लिए धारा 24 के तहत आवेदन दायर किया. धारा 11 के तहत आवेदन स्वीकार होने के बाद, पत्नी ने अपील दायर की, जिसे अंततः वापस करते हुए खारिज कर दिया गया.
घरेलू हिंसा अधिनियम की धारा 23 के तहत कार्यवाही में विवाह विच्छेद (Marriage invalid) होने के बावजूद, पत्नी को 10,000 रुपये प्रति माह का भुगतान लंबित रहने तक जारी रखा गया. भरण-पोषण के आदेश के विरुद्ध पति द्वारा दायर अपील निचली अदालत ने खारिज कर दी. इसके बाद, पति ने हाईकोर्ट में आपराधिक पुनरीक्षण याचिका दायर की थी.
कोर्ट ने पाया कि पहला विवाह रहते हुए ही दूसरा विवाह संपन्न हुआ था. कोर्ट ने कहा कि कानून बहु विवाह की अनुमति नहीं देता. न्यायालय ने आगे कहा कि यद्यपि पक्षकारों के बीच विवाह को अमान्य (Marriage invalid) घोषित करने वाले आदेश को पत्नी ने चुनौती दी थी, लेकिन बाद में उसने अपनी अपील वापस ले ली और इस प्रकार वह आदेश अंतिम हो गया. यह आदेश 20 नवंबर 2021 को फाइनल हो गया. तदनुसार, न्यायालय ने माना कि भरण-पोषण देने संबंधी विवादित आदेश रद्द किये जाने योग्य है.
“चूंकि घोषणात्मक डिक्री के माध्यम से, पक्षकारों का विवाह शून्य (Marriage invalid) और अमान्य घोषित किया गया है, इसलिए यह विवाह की तिथि से संबंधित होगा. इसका परिणाम यह होगा कि एक बार पक्षकारों का विवाह स्वयं शून्य घोषित हो जाने के बाद, पक्षकारों के बीच के बाद के संबंध का कोई महत्व नहीं रह जाता. इस प्रकार, तथ्यात्मक स्थिति, जो रिकॉर्ड में सामने आई है, वह यह है कि घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम, 2005 की धारा 2(एफ) के अनुसार 21 नवंबर 2021 से पक्षकारों के बीच कोई संबंध नहीं है. “
जस्टिस राजीव मिश्रा, इलाहाबाद हाईकोर्ट
सजा के खिलाफ आजम खान की अपील की सुनवाई 31 जुलाई को
इलाहाबाद हाईकोर्ट सपा सरकार में कैबिनेट मंत्री रहे आजम खान को डूंगरपुर केस में सुनाई गई 10 साल की सजा के खिलाफ अपील की सुनवाई 31 जुलाई को करेगा. रामपुर की एमपी/एमएलए कोर्ट ने 30 मई 2024 को आज़म खान को 10 साल कैद की सजा सुनाई थी.

इसी सजा को आजम खान ने अपील में चुनौती दी है. इसी मामले में ठेकेदार बरकत अली ने भी हाईकोर्ट में अपील दाखिल की है. दोनों अपीलों पर एकसाथ सुनवाई चल रही है. अपील की सुनवाई जस्टिस समीर जैन कर रहे हैं। हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट का रिकॉर्ड तलब किया है.
अगस्त 2019 में रामपुर के थाना गंज में आजम खान, रिटायर सीओ आले हसन और ठेकेदार बरकत अली के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराया गया था. शिकायतकर्ता अबरार के मुताबिक दिसंबर 2016 में आजम खान, रिटायर सीओ आले हसन और बरकत अली ठेकेदार ने उसके साथ मारपीट की, घर में तोड़फोड़ की और जान से मारने की धमकी दी.
स्पेशल कोर्ट एमपी/एमएलए ने आज़म खान को 10 साल कैद और बरकत अली ठेकेदार को सात साल कैद की सजा सुनाई थी. डूंगरपुर बस्ती ने रहने वाले लोगों ने बस्ती को खाली कराने के नाम पर वहां लूटपाट, चोरी, मारपीट सहित अन्य आरोप में रामपुर के गंज थाने में 12 मुकदमे दर्ज कराए थे.
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