हाई कोर्ट ने कहा, situation से जुड़े लिंक पक्के तो शक की गुंजाइश नहीं, उम्र कैद की सजा पाए आरोपी को राहत नहीं

इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ बेंच ने कहा है कि जब हालात (situation) से जुड़ें लिंक पक्के हों तो शक की कोई गुंजाइश नहीं रह जाती है. जस्टिस अबधेश कुमार चौधरी और जस्टिस राजेश सिंह चौहान की बेंच में सुनवाई के दौरान केस शुरू में जो एक रेगुलर पारिवारिक मुलाकात लग रही थी वह शादीशुदा जिंदगी में तनाव, शादी के बाहर संबंध होने का शक और बिना जवाब वाले सवालों वाले आरोप में बदल गई.
मेडिकल रिकॉर्ड, लोकेशन डेटा, गवाहों की यादों और अलग-अलग बातों की जांच में मामला जिम्मेदारी, व्यवहार और हालात (situation) से जुड़े लिंक की गहरी जांच में बदल गया. कोर्ट ने माना कि प्रॉसिक्यूशन ने हालात (situation) की एक पूरी चेन सफलतापूर्वक बनाई, जिससे होमिसाइडल मौत और आरोपी का शामिल होना बिना किसी शक के साबित हो गया. बेंच ने हत्या के लिए पीनल प्रोविजन के तहत सजा को बरकरार रखा और ट्रायल कोर्ट द्वारा दी गई सजा की पुष्टि कर दी.
यह क्रिमिनल अपील केस क्राइम नंबर 124/2015 से जुड़े, सेशन ट्रायल नंबर 205/2015 में ट्रायल कोर्ट द्वारा 25.08.2017 को पास किए गए विवादित फैसले और आदेश के खिलाफ फाइल की गई थी. जिसके तहत अपील करने वाले को आईपीसी की धारा 302 के तहत दोषी ठहराते हुए आजीवन कारावास और 20,000 रुपये का जुर्माना की सजा सुनाई गई है. मामला 09.03.2015 को को उन्नाव जिले के अजगैन थाने में दर्ज हुई रिपोर्ट से सामने आया.
शिकायतकर्ता के अनुसार उसकी बेटी अनीता की शादी लगभग दो साल पहले अपील करने वाले जितेंद्र पाल से हुई थी. 09 मार्च 2015 को अपील करने वाला अपनी पत्नी अनीता को सुबह करीब 11 बजे शीतल खेड़ा में बताने वाले के घर ले आया. अनीता को को उसके मायके छोड़ने के बाद वह अपनी सास को मखदूम नगर जिला उन्नाव एक पारिवारिक शादी में शामिल होने के लिए ले गया.

सास को छोड़ने के बाद वह घर शीतल खेड़ा वापस आ गया और अपनी पत्नी अनीता के साथ वहीं रुका. आरोप लगाया गया था कि उसकी बेटी को आखिरी बार उसका पति मोटरसाइकिल पर ले गया था और अगली सुबह पास के एक खेत में उसकी लाश मिली.
लाश के गले पर एक मार्क था और पोस्टमॉर्टम में गला घोंटने से मौत की पुष्टि हुई. इसके आधार पर 302 आईपीसी के तहत मर्डर की रिपोर्ट दर्ज की गई. इन्वेस्टिगेशन के दौरान पुलिस ने साइट प्लान तैयार किया. मौके से टूटी हुई चूड़ियां बरामद हुईं, आरोपी का मोबाइल फोन जब्त किया गया. कॉल डिटेल निकालने से पता चला कि घटनास्थल के पास उसकी लोकेशन थी.
गवाहों के बयान दर्ज करने और इन्वेस्टिगेशन पूरी करने के बाद पुलिस ने चार्जशीट फाइल कर दी. केस सेशंस कोर्ट को सौंप दिया गया जहां आरोप तय किए गए. आरोपी ने खुद को बेकसूर बताया और ट्रायल की मांग की.
अपीलकर्ता के वकील ने तर्क दिया कि प्रॉसिक्यूशन ने बिना किसी आईविटनेस के पूरी तरह से हालात (situation) के सबूतों पर भरोसा किया. वकील ने कहा कि लास्ट सीन वाली बात भरोसे लायक नहीं थी क्योंकि एक गवाह ने माना कि उसने दोनों को कभी एक साथ जाते हुए नहीं देखा और दूसरे ने उसकी मौजूदगी के बारे में कुछ बातें बताईं.
उन्होंने तर्क दिया कि नाजायज रिश्ते का कथित मकसद बिना किसी इंडिपेंडेंट सबूत के सिर्फ सुनी-सुनाई बातों पर आधारित था. अपील करने वाले ने कहा कि हालात (situation) की चेन अधूरी थी और दूसरी संभावनाओं को खारिज नहीं कर सकती थी और मेडिकल जांच से यह काम उससे जुड़ा नहीं था.
Situation एक जैसी चेन बनाते हैं जो अपील करने वाले की ओर इशारा करती हैं
स्टेट की तरफ से कहा गया कि हालात (situation) एक जैसी चेन बनाते हैं जो अपील करने वाले की ओर इशारा करती हैं. उसने कई गवाही पर भरोसा किया जो शादीशुदा जिंदगी में अनबन का इशारा करती हैं. यह बात कि मरने वाले को आखिरी बार बॉडी मिलने से कुछ समय पहले अपील करने वाले के साथ देखा गया था और लोकेशन डेटा से पता चला कि उसका मोबाइल डिवाइस घटना वाली जगह के पास है. टूटी हुई चूड़ियों का मिलना, दूसरी औरत से लगातार फोन पर बात करना और घटना के बाद अपील करने वाले के व्यवहार को भी हालात (situation) को मजबूत करने वाला बताया गया.
कोर्ट ने कहा कि क्योंकि केस पूरी तरह से हालात (situation) के सबूतों पर बना था, इसलिए प्रॉसिक्यूशन को ऐसे ट्रायल के लिए तय कड़े स्टैंडर्ड को पूरा करना था. बेंच ने शरद बिरधी चंद सारदा बनाम महाराष्ट्र राज्य में बताए गए सिद्धांतों पर भरोसा किया, यह देखते हुए कि हालात के सबूत शक या कुछ नतीजों पर नहीं टिक सकते, बल्कि उन्हें एक पूरी और बिना टूटी चेन बनानी चाहिए.
“जिन हालातों (situation) से गुनाह का नतीजा निकाला जाना है, वे पूरी तरह से साबित होने चाहिए. यहाँ यह ध्यान देने वाली बात है कि इस कोर्ट ने बताया कि संबंधित हालात मस्ट या शुड थे, न कि मे बी. मे बी प्रूव्ड और मस्ट बी या शुड बी प्रूव्ड के बीच न सिर्फ ग्रामर का बल्कि लीगल फर्क भी है.

कोर्ट ने मेडिकल सबूतों की जांच की और पाया कि चोटों की वजह से एक्सीडेंटल या खुद से हुई मौत की कोई भी संभावना नहीं थी. पोस्टमॉर्टम की राय, जिसमें मौत से पहले गला घोंटने की बात कही गई थी, को एक पक्की शुरुआती बात माना गया, जिससे बाकी हालातों को इस नतीजे के आस-पास जांचना जरूरी हो गया.
बेंच ने कहा कि गवाही से साफ पता चलता है कि चोटें जानबूझकर लगाई गई थीं और इसके लिए बाहरी ताकत की जरूरत थी. कोर्ट ने नोट किया कि पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट को डॉ. अरुण कुमार सचान ने साबित किया है जिन्होंने अपनी गवाही में कहा है कि मौत गर्दन पर रस्सी कसने से हुई थी जो मृतका खुद अकेले नहीं कर सकती थी और मौत उसी रात हुई थी.
आरोपी का ऐसे situation का हिसाब न देना प्रॉसिक्यूशन की चेन को और मजबूत करता है
इसके बाद कोर्ट ने आरोपी की उन हालातों के बारे में चुप्पी पर गौर किया जो उसे खास तौर पर पता थे. जब प्रॉसिक्यूशन ने दिखाया कि आरोपी और मृतक मौत से कुछ समय पहले आखिरी बार साथ थे तो कोर्ट ने माना कि एक्सप्लेनेशन की उम्मीद थी. त्रिमुख मारोती किरकन बनाम महाराष्ट्र राज्य पर भरोसा करते हुए, कोर्ट ने कहा कि आरोपी का ऐसे हालातों (situation) का हिसाब न देना प्रॉसिक्यूशन की चेन को और मजबूत करता है.
Case: Jitendra Pal V. State of U.P : Criminal Appeal No. – 2259 of 2017