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नाबालिग बेटी (10 साल) के रेप केस में सरकारी कर्मचारी की Life imprisonment पर रोक, जमानत पर रिहा करने का आदेश

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने लेखपाल को सुनायी गयी Life imprisonment की सजा पर रोक दी है. इस लेखपाल पर पर अपनी 16 साल की बेटी का यौन उत्पीड़न करने का आरोप है. जस्टिस सिद्धार्थ और जस्टिस प्रशांत मिश्रा-I की बेंच ने कहा कि यह अपील 2024 की है और केसों के भारी बैकलॉग के कारण निकट भविष्य में इसकी सुनवाई की बहुत कम संभावना है. इसी के आधार पर कोर्ट ने उसे जमानत पर रिहा करने का भी आदेश दिया है. कोर्ट ने कहा है कि किसी के भी रोजी रोटी कमाने के अधिकार ​को किसी भी हाल में कम नहीं किया जा सकता है.

नाबालिग बेटी (10 साल) के रेप केस में सरकारी कर्मचारी की Life imprisonment पर रोक , जमानत पर रिहा करने का आदेश

ट्रायल कोर्ट ने पिछले साल मई में आरोपी पिता (प्रवेश सिंह तोमर) को POCSO Act की धारा 6 (गंभीर यौन उत्पीड़न) और IPC की धारा 313, 323, 504 और 506 के तहत दोषी ठहराया और उसे Life imprisonment की सजा सुनाई. कोर्ट ने उसके दोस्त (विमल कुमार) और तलाक के केस में उसके वकील (सोनू तिवारी) को भी Life imprisonment की सजा सुनाई. ट्रायल कोर्ट के फैसले से नाराज होकर तीनों आरोपियों ने अपनी सजा और Life imprisonment को चुनौती देने के लिए हाई कोर्ट का रुख किया.

अपीलकर्ता की अलग रह रही पत्नी (शिकायतकर्ता) ने 12 जनवरी, 2020 को FIR दर्ज कराई. उसने आरोप लगाया कि उसका पति (अपीलकर्ता) उनकी बेटी का यौन उत्पीड़न तब से कर रहा है, जब वह तीसरी क्लास में थी (10 साल की). उसने बताया कि जब उसे इस दुर्व्यवहार के बारे में पता चला तो उसने बेटी को जयपुर के एक स्कूल में भेज दिया. आरोप है कि अपीलकर्ता लड़की को स्कूल से होटलों में ले जाता था, जहां वह और उसके दोस्त (सह-आरोपी) उसका यौन उत्पीड़न करते थे.

एफआईआर में आरोप लगाए गए कि अवैध संबंध बनाये जाने के चलते लड़की गर्भवती हो गई तो उसका जबरन गर्भपात करवा दिया गया. अपीलकर्ता की माँ (पीड़िता की दादी) और दूसरी पत्नी भी इस दुर्व्यवहार में शामिल थीं. शिकायतकर्ता (अपीलकर्ता की पत्नी) ने आरोप लगाया कि उसके विरोध करने पर उसे और उसकी बेटी दोनों को पीटा गया और धमकी दी गई. इसलिए वे इस घटना के बारे में किसी को नहीं बता सके. ट्रायल कोर्ट ने पिता (अपीलकर्ता), उसके दोस्त (विमल कुमार) और उसके वकील (सोनू तिवारी) को दोषी ठहराया. 20 मई, 2024 के फैसले और आदेश के जरिए उन्हें Life imprisonment की सजा सुनाई.

अपीलकर्ता के वकीलों ने दलील दी कि अपीलकर्ता अपनी अलग रह रही पत्नी (शिकायतकर्ता) की साजिश का शिकार था, क्योंकि वे सालों से अलग रह रहे थे. यह बताया गया कि उसकी पत्नी-शिकायतकर्ता अभी अपने माता-पिता के साथ रह रही है और अपीलकर्ता की बेटी-पीड़िता तक कोई पहुंच नहीं थी.

खास बात यह है कि यह बताया गया कि अपीलकर्ता ने 4 जनवरी, 2020 को तलाक की याचिका दायर की और बलात्कार का आरोप लगाते हुए एफआईआर सिर्फ आठ दिन बाद 12 जनवरी, 2020 को जवाबी कार्रवाई के तौर पर दर्ज की गई. यह कहा गया कि ट्रायल के दौरान पीड़िता लड़की और उसकी माँ के बयान विरोधाभासों और बदलावों से भरे थे. कोर्ट का ध्यान पीड़िता की मेडिकल-लीगल जांच की ओर भी दिलाया गया, जिसमें उनके दावे के मुताबिक कोई बाहरी या अंदरूनी चोट नहीं पाई गई.

तर्क दिया गया कि पीड़िता को उसकी माँ ने झूठे आरोपों का समर्थन करने के लिए सिखाया. यह कहा गया कि अपीलकर्ता ने अपनी बेटी को ऐसे प्रभावों से दूर रखने के लिए बोर्डिंग स्कूल भेजा. हालांकि, जब स्कूल अधिकारियों ने उसके पास से एक बैन मोबाइल फोन बरामद किया तो अपीलकर्ता ने उसे डांटा और नतीजतन, बेटी-पीड़िता नाराज हो गई और अपनी माँ के प्रभाव में आकर उसने उसे झूठे मामले में फंसा दिया.

खास बात यह है कि उसके कथित बॉयफ्रेंड के साथ रिश्ते के बारे में डिटेल्स और चिट्ठियों में “सेफ सेक्स” के संदर्भ रिकॉर्ड पर रखे गए. ट्रायल कोर्ट ने उसे दोषी ठहराते समय इन चिट्ठियों के महत्व को नजरअंदाज कर दिया.

तर्क दिया गया कि ट्रायल के दौरान अपीलकर्ता के साथ भेदभाव हुआ, क्योंकि कोर्ट ने उससे सीआरपीसी की धारा 313 के तहत लंबे और मिले-जुले सवाल पूछे और वह उनका प्रभावी ढंग से जवाब नहीं दे पाया और अपने खिलाफ आपत्तिजनक परिस्थितियों को समझा नहीं पाया.

सजा और दोषसिद्धि (Life imprisonment) को निलंबित कर दिया गया

आखिर में इन आरोपों का खंडन करने के लिए कि अपीलकर्ता अपनी बेटी को यौन उत्पीड़न के लिए होटलों और नेशनल पार्क जैसी जगहों पर ले गया, हाईकोर्ट के सामने कुछ तस्वीरें पेश की गईं. यह दावा किया गया कि ये दोस्तों और रिश्तेदारों के साथ ली गई पारिवारिक छुट्टियां थीं और अपीलकर्ता कभी भी अपनी बेटी को अकेले ऐसी जगहों पर नहीं ले गया.

सरकार की ओर से पेश हुए अधिवक्ता ने जमानत की अर्जी का विरोध किया, लेकिन वह अपीलकर्ता के वकील की दलीलों का खंडन नहीं कर सके. इसी वजह से उनकी सजा और दोषसिद्धि (Life imprisonment) को निलंबित कर दिया गया और उन्हें जमानत दे दी गई.

Case : Pravesh Singh Tomar vs. State Of U.P. And 3 Others

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