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‘पायजामा का नाड़ा तोड़ना रेप नहीं’ जैसे Comment से बचें जज, हाई कोर्ट का IPC की धारा 376/511 के आरोपों को हटाने का आदेश रद

सीजेआई जस्टिस सूर्यकांत ने की सख्त Comment, अदालतों लिए दिशा निर्देश जारी करने के संकेत

'पायजामा का नाड़ा तोड़ना रेप नहीं' जैसे Comment से बचें जज, हाई कोर्ट का IPC की धारा 376/511 के आरोपों को हटाने का आदेश रद

चीफ जस्टिस आफ इंडिया जस्टिस सूर्यकांत ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के एक जस्टिस द्वारा रेप केस की सुनवाई के दौरान की गयी टिप्पणी (Comment) पायजामा का नाड़ा तोड़ना और स्तनों को पकड़ना, रेप के प्रयास के केस के लिए पर्याप्त नहीं, पर सख्त एतराज जताया है. स्पष्ट शब्दों में कहा है कि अदालतों को, विशेषकर हाई कोर्ट को, फैसले लिखते समय और सुनवाई के दौरान ऐसी दुर्भाग्यपूर्ण टिप्पणियों  (Comment) से हर हाल में बचना चाहिए. इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट इलाहाबाद के फैसले को खारिज कर दिया है.

कोर्ट ने संकेत दिया है कि वह देश भर की अदालतों के लिए व्यापक दिशानिर्देश जारी करेगी ताकि भविष्य में किसी भी पीड़ित की गरिमा को न्यायिक आदेशों में ठेस न पहुंचे.

सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस सूर्य कांत की अध्यक्षता वाली बेंच ने इस मामले पर सुनवाई करते हुए स्पेशली जज के कमेंट (Comment) पर गहरी चिंता व्यक्त की. कोर्ट ने माना कि जिस तरह से इलाहाबाद हाईकोर्ट ने आरोपी के कृत्यों को तकनीकी आधार पर कम गंभीर बताया, वह न्यायिक औचित्य के खिलाफ है.

सुनवाई के दौरान बेंच ने कहा कि, हम व्यापक दिशानिर्देश जारी करेंगे ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि न्यायिक प्रक्रिया में कुछ हद तक संवेदनशीलता बनी रहे. हाईकोर्ट्स को ऐसी दुर्भाग्यपूर्ण टिप्पणियों (Comment) से बचना चाहिए जो समाज में गलत संदेश देती हों और पीड़ित के दर्द को कम करके आंकती हों.

हाईकोर्ट्स को ऐसी दुर्भाग्यपूर्ण टिप्पणियों (Comment) से बचना चाहिए जो समाज में गलत संदेश देती हों

कोर्ट का मानना था कि यौन उत्पीड़न के मामलों में अगर जज शारीरिक संपर्क की बारीकियों को लेकर असंवेदनशील व्याख्या करेंगे तो इसका सीधा असर न्याय प्रणाली पर जनता के भरोसे पर पड़ेगा. इस पूरे विवाद की जड़ इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला था. एक मामले की सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने आरोपी के खिलाफ आईपीसी की धारा 376/511 (दुष्कर्म का प्रयास) के तहत लगे आरोपों को हटा दिया था.

हाईकोर्ट ने अपने Comment में कहा था कि यद्यपि आरोपी ने पीड़िता के स्तनों को पकड़ा और उसके पायजामे का नाड़ा तोड़ा, लेकिन उसने शारीरिक संबंध बनाने का कोई और प्रयास नहीं किया. इस आधार पर हाईकोर्ट ने इसे रेप का प्रयास न मानते हुए केवल छेड़छाड़ या महिला की गरिमा भंग करने का मामला माना था. बता दें कि इस मामले को सुप्रीम कोर्ट ने स्वत: संज्ञान लिया है.

सुनवाई के दौरान जस्टिस सूर्य कांत ने मामले की गंभीरता को रेखांकित करते हुए कहा कि अगर अदालतें इस तरह का दृष्टिकोण अपनाएंगी, तो पीड़ित न्याय की उम्मीद कैसे करेंगे? कोर्ट ने कहा कि एक महिला यौन हिंसा का सामना करती है, तो वह न केवल शारीरिक बल्कि मानसिक आघात से भी गुजरती है.

ऐसे में अगर अदालत यह कहे कि नाड़ा तोड़ना रेप की कोशिश नहीं है क्योंकि आरोपी आगे नहीं बढ़ा, तो यह उस मानसिक आघात को नकारने जैसा है जो पीड़िता ने उस क्षण में महसूस किया होगा. सुप्रीम कोर्ट का मानना है कि अपराध की गंभीरता को केवल शारीरिक क्रिया की पूर्णता से नहीं बल्कि आरोपी के इरादे  और पीड़िता पर पड़े प्रभाव से मापा जाना चाहिए.

कोर्ट ने कहा, दिशानिर्देश बनाने का यही सही समय है, नहीं तो इसका पीड़ितों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा. हाईकोर्ट के फैसले में ऐसी भाषा का प्रयोग पितृसत्तात्मक सोच को दर्शाती है या जो तकनीकी रूप से इतनी रूखी होती है कि उसमें मानवीय संवेदना खो जाती है.

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