बच्चे की कस्टडी को लेकर Husband – Wife के बीच कोई समझौता हुआ है तो उसकी जांच जरूरी: इलाहाबाद हाई कोर्ट
कोर्ट ने मुजफ्फरनगर की फैमिली कोर्ट के एकतरफा फैसले को रद किया, केस फिर सुनवाई के लिए वापस भेजा

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा है कि Husband – Wife के रिश्ते में दरार आने के बाद बच्चे की कस्टडी को लेकर दोनों (Husband – Wife) पार्टियों के बीच कोई समझौता हुआ है और फैमिली कोर्ट को इस समझौते के अस्तित्व की जांच जरूर करनी चाहिए. यदि Husband-Wife के बीच ऐसा कोई समझौता मौजूद पाया जाता है तो उसे इसके तथ्यों पर विचार करके मामले में फैसला सुनाया जाना चाहिए. इस कमेंट के साथ इलाहाबाद हाई कोर्ट के जस्टिस अरिंदम सिन्हा और जस्टिस सत्य वीर सिंह की बेंच ने बच्चे की कस्टडी को लेकर मुजफ्फरनगर की फैमिली कोर्ट द्वारा सुनाये गये एकतरफा फैसले को रद कर दिया है.
बेंच ने मामले को वापस भेजने का निर्देश दिया है. रजिस्ट्रार को निर्देश दिया है कि वह इस फैसले और आदेश की एक प्रति उस फैमिली कोर्ट को भेजें, जिसके फैसले के खिलाफ यह अपील दायर की गई थी. बेंच ने कोर्ट को निर्देश दिया है कि वह इस मुकदमे (Husband – Wife) को उसके मूल नंबर के तहत फिर से स्वीकार करे और उस पर आगे की कार्रवाई करते हुए उसका निपटारा करे.
बता दें कि इलाहाबाद हाई कोर्ट के दो जजों की बेंच फैमिली कोर्ट का 26 अगस्त 2022 का वह फैसला जो अपीलकर्ता (Husband) के खिलाफ एकतरफा दिया गया था और उसके बाद 2 जनवरी 2026 का वह फैसला जिसमें अपीलकर्ता (Husband) की उस एकतरफा फैसले को रद्द करने की अर्जी खारिज कर दी गई थी पर एक साथ सुनवाई की.
बेटे की कस्टडी प्रतिवादी-मां (Wife) को सौंप दी गई

अपीलकर्ता बच्चे के पिता की ओर से पेश हुए अधिवक्ता ने कोर्ट को बताया कि मुजफ्फरनगर की फैमिली कोर्ट के 26 अगस्त 2022 के फैसले के तहत बेटे की कस्टडी प्रतिवादी-मां (Wife) को सौंप दी गई थी. उनके मुवक्किल को इस कार्यवाही के बारे में कोई सूचना नहीं मिली थी. जब उन्हें इस बारे में पता चला तो उन्होंने उस एकतरफा फैसले को रद्द करवाने के लिए अर्जी दी.
2 जनवरी 2026 के फैसले में फैमिली कोर्ट ने husband की अर्जी खारिज कर दी है. इन दोनों फैसलों को एक साथ चैलेंज किया गया था. प्रतिवादी की तरफ से पेश हुए अधिवक्ता ने नोटिस तामील करवाने का अनुरोध किया तो जवाब में कहा गया कि नोटिस की तामील कल तक करवा दी जाएगी. इन परिस्थितियों को देखते हुए, अपील के औपचारिक नोटिस जारी करने की आवश्यकता से छूट दे दी.
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कोर्ट ने माना कि रिकॉर्ड पर उपलब्ध दस्तावेजों से प्रतीत होता है कि अदालत ने यह निष्कर्ष निकाला था कि समन की तामील विधिवत रूप से कर दी गई थी. ऐसा इसलिए माना गया क्योंकि समन को अपीलकर्ता (husband) के दरवाजे पर चिपका दिया गया था. क्योंकि अपीलकर्ता ने उसे स्वीकार करने से इनकार कर दिया था.
इसके बाद, समाचार पत्र में प्रकाशन के माध्यम से ‘वैकल्पिक तामील’ की गई. इन प्रक्रियाओं के पूर्ण होने के बाद ही, फैमिली कोर्ट ने अपीलकर्ता के खिलाफ एकतरफा कार्यवाही आगे बढ़ाई और अपना फैसला सुनाते हुए बेटे की कस्टडी प्रतिवादी (मां) (Wife) को सौंपने का निर्देश दिया.
इसके बाद, अपीलकर्ता ने फैमिली कोर्ट का दरवाजा खटखटाया और यह दावा किया कि उसे इस न्यायिक कार्यवाही के संबंध में कोई नोटिस प्राप्त नहीं हुई थी. उसने यह भी कहा कि उसका बेटा इस समय उसके साथ जयपुर (राजस्थान) में रह रहा है इसलिए मुजफ्फरनगर स्थित फैमिली कोर्ट के पास इस मामले की सुनवाई करने का कोई क्षेत्राधिकार नहीं है. इसमें यह भी कहा गया कि दोनों पक्षों (Husband – Wife) के मध्य बच्चे की कस्टडी को लेकर समझौता हो चुका है. इसके तहत बच्चा पिता के पास ही रहेगा, इस पर सहमति है.
दोनों पक्षों के तर्कों को सुनने के बाद कोर्ट ने उपर्युक्त फैसला सुनाया. बेंच ने कहा कि फैमिली कोर्ट में सुनवाई होने पर प्रतिवादी अपने पहले से दायर हलफनामे में दिए गए सबूतों में और जानकारी जोड़ सकती है और उसके बाद जिरह कर सकती है. इसके बाद, अपीलकर्ता को भी अपने सबूत पेश करने का पूरा मौका दिया जाएगा. इसके साथ ही बेंच ने मामले का निबटारा कर दिया है.
Husband की मृत्यु के बाद एक्स-पार्टी तलाक रद्द नहीं हो सकता
इलाहाबाद हाइकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा कि Husband या Wife की मृत्यु के बाद एक्स-पार्टी तलाक के डिक्री को रद्द नहीं किया जा सकता. कोर्ट ने स्पष्ट किया कि ऐसे मामलों में मुकदमा आगे नहीं बढ़ सकता और इसे पुनर्जीवित करना कानूनन संभव नहीं है. जस्टिस अरिंदम सिन्हा और जस्टिस सत्य वीर सिंह की बेंच ने यह निर्णय देते हुए फैमिली कोर्ट का आदेश रद्द किया, जिसमें 30 साल पुराने तलाक को बहाल कर दिया गया था.
मामले में पहली पत्नी (Wife) का विवाह 1991 में एक्स-पार्टी डिक्री के जरिए समाप्त हो गया. इसके बाद पति ने दूसरी शादी कर ली और अलग परिवार के साथ रहने लगा. वर्ष 2023 में पति की मृत्यु के बाद दूसरी पत्नी (wie) को वैध विधवा मानते हुए उसे सभी सेवा लाभ दिए गए. इसके बाद पहली पत्नी (Wife) ने भी लाभ पाने के लिए दावा किया और फैमिली कोर्ट में एक्स-पार्टी डिक्री रद्द करने की मांग की. फैमिली कोर्ट ने देरी माफ करते हुए डिक्री रद्द की, जिसे दूसरी पत्नी (Wife) और उसके बच्चों ने हाइकोर्ट में चुनौती दी.
हाइकोर्ट ने पाया कि पहली पत्नी (Wife) ने डिक्री को चुनौती देने के लिए 30 साल से अधिक समय तक कोई कदम नहीं उठाया और यह आवेदन पति की मृत्यु के तुरंत बाद किया गया, जिससे उसकी मंशा पर भी सवाल उठता है. अदालत ने कहा कि पहली पत्नी (Wife) यह साबित नहीं कर पाई कि उसे तलाक की कार्यवाही की सूचना नहीं दी गई. कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले के अनुसार पति (husband) या पत्नी (Wife) की मृत्यु के बाद वैवाहिक विवाद समाप्त हो जाता है और उसे आगे नहीं बढ़ाया जा सकता.
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अदालत ने कहा कि ऐसे हालात में पुराने मुकदमे को बहाल करने से दूसरी पत्नी (Wife) का वैध अधिकार प्रभावित होता है, जबकि उसे अपना पक्ष रखने का अवसर भी नहीं मिलेगा. हाइकोर्ट ने यह भी माना कि तलाक के बाद हुई दूसरी शादी पूरी तरह वैध थी. इन सभी तथ्यों को देखते हुए अदालत ने दूसरी पत्नी (Wife) की अपील स्वीकार करते हुए फैमिली कोर्ट का आदेश रद्द कर दिया.
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