इलाहाबाद हाईकोर्ट ने Minor रेप पीड़िता के पॉलीग्राफ टेस्ट पर पर उठाए सवाल, सुनवाई 15 को
दूसरे बयान पर राज्य की आपत्ति पर भी दर्ज करायी आपत्ति, प्रमुख सचिव गृह से मांगा हलफनामा

इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने Minor रेप पीड़िता से जुड़े मामले में बलरामपुर के पुलिस अधीक्षक के व्यक्तिगत हलफनामे में चौंकाने वाली और महत्वपूर्ण तथ्यों को छिपाने पर कड़ी आपत्ति जताई है. कोर्ट ने प्रमुख सचिव (गृह) से व्यक्तिगत हलफनामा मांगा है और राज्य के इस फैसले पर भी हैरानी जताई है कि वह Minor पीड़िता के बयान को दोबारा दर्ज करने की अनुमति देने वाले कोर्ट के आदेश को चुनौती दे रहा है. यह आदेश जस्टिस अब्दुल मोइन और जस्टिस बबीता रानी की बेंच ने दिया है.
कोर्ट ने सवाल किया है कि प्रमुख सचिव गृह से पूछा है कि एसपी द्वारा इस तरह का हलफनामा कैसे दाखिल किया गया. यह पूछा है कि Minor पीड़िता के बयान को दोबारा दर्ज करने का निर्देश देते समय सक्षम अदालत द्वारा पहले ही दर्ज की गई परिस्थितियों के बावजूद स्टेट पीड़िता और उसके पिता के पॉलीग्राफ टेस्ट पर जोर क्यों दे रहा है.
बेंच एक याचिकाकर्ता द्वारा दायर रिट याचिका पर सुनवाई कर रही थी जिसमें नामित आरोपी के खिलाफ अपहरण के मामले की जांच को स्थानांतरित करने की मांग की गई है. याचिका में दावा किया गया कि संबंधित अधिकारी निष्पक्ष तरीके से कार्रवाई नहीं कर रहे थे.
17 नवंबर, 2025 को हाईकोर्ट ने एसपी बलरामपुर को व्यक्तिगत हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया जिसमें उन्हें 22 अक्टूबर 2024 को प्राथमिकी दर्ज होने के बाद की गई जांच का विवरण देना था. एसपी ने अपने हलफनामे में कहा कि Minor पीड़िता और उसके पिता के पॉलीग्राफ टेस्ट के लिए एक आवेदन न्यायिक मजिस्ट्रेट-I बलरामपुर के समक्ष विचाराधीन है.
Minor और उसके पिता के पॉलीग्राफ टेस्ट के लिए आवेदन वास्तव में एसपी द्वारा 1 दिसंबर को ही अदालत द्वारा खारिज कर दिया गया था
पुलिस ने पीड़िता द्वारा दिए गए दो विपरीत बयानों का हवाला देते हुए इस कदम को उचित ठहराया. सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता के वकील ने एसपी के हलफनामे में एक गंभीर विसंगति का खुलासा किया. यह बताया गया कि पॉलीग्राफ टेस्ट के लिए आवेदन (Minor पीड़िता और उसके पिता का) वास्तव में एसपी द्वारा शपथ और सत्यापन करने से एक दिन पहले 1 दिसंबर को ही अदालत द्वारा खारिज कर दिया गया था.
इस दलील को रिकॉर्ड पर लेते हुए हाईकोर्ट ने टिप्पणी की पहली नजर में ही यह स्पष्ट हो जाता है कि पुलिस अधीक्षक, बलरामपुर द्वारा दायर किया गया हलफनामा झूठा है, जो पॉलीग्राफ टेस्ट के लिए आवेदन के विचाराधीन होने का संकेत देता है बिना मामले के पूरे तथ्यों पर ध्यान दिए.

कोर्ट ने इसे हलफनामे की चौंकाने वाली प्रकृति का पहला संकेत बताया. इसके अलावा बेंच ने Minor पीड़िता के प्रति राज्य के विरोधी रवैये पर भी गहरी चिंता व्यक्त की. Minor पीड़िता के बयान को दोबारा दर्ज करने के आदेश पर राज्य की आपत्ति इसके बाद खंडपीठ ने मामले के दूसरे चौंकाने वाले पहलू की ओर ध्यान दिया.
Minor पीड़िता का पहला बयान पिछले साल 28 अक्टूबर को भारतीय न्याय संहिता की धारा 183 के तहत दर्ज किया गया. बाद में उसने विशेष न्यायाधीश, पॉक्सो एक्ट बलरामपुर के समक्ष अपना बयान दोबारा दर्ज करने के लिए एक आवेदन दायर किया. Minor पीड़िता ने बताया कि आरोपी और पुलिस द्वारा डाले गए दबाव के कारण वह पहले उसके साथ किए गए रेप के अपराध के संबंध में सही बयान नहीं दे सकी थी.
पाक्सो जज ने 8 जनवरी को इस याचिका को स्वीकार कर लिया और Minor पीड़िता के बयान को दोबारा दर्ज करने का निर्देश दिया. इसके बाद 19 मार्च को उसका नया बयान दर्ज किया गया, जिसमें उसने स्पष्ट रूप से कहा कि आरोपी ने उसका यौन उत्पीड़न किया था.
इसके बावजूद, अदालत ने इसे अजीब पाया कि राज्य ने स्पेशल जज के उस आदेश को चुनौती देने का फैसला किया, जिसने उसके बयान को दोबारा दर्ज करने का निर्देश दिया था. यह चुनौती वर्तमान में हाईकोर्ट में लंबित है.
बेंच ने कहा कि वह यह नहीं समझ पा रही है कि राज्य एक ऐसे आदेश से कैसे व्यथित हो सकता है, जिसने चल रही जांच के बीच केवल पीड़िता के बयान को दोबारा दर्ज करने का निर्देश दिया हो.
“यह दूसरी बात हो सकती थी कि आरोपी ने उक्त आदेश को चुनौती दी हो, लेकिन हम यह समझने में विफल हैं कि राज्य ने किस तरह की कल्पना के तहत उक्त आदेश को चुनौती देने का फैसला किया.”
बेंच ने टिप्पणी की
कोर्ट ने पुलिस अधिकारियों के इस तर्क पर भी सवाल उठाया कि जब Minor पीड़िता पहले ही अपना रुख स्पष्ट कर चुकी है तो Minor पीड़िता और उसके पिता के पॉलीग्राफ टेस्ट पर जोर देने का क्या औचित्य है.
बेंच ने टिप्पणी की कि एक बार जब सक्षम अदालत ने यह स्वीकार कर लिया कि पहले का बयान दबाव में दर्ज किया गया और एक नए बयान की अनुमति दी गई, जिसमें रेप का अपराध बनता है तो पॉलीग्राफ टेस्ट कराने का कोई औचित्य प्रतीत नहीं होता है. उपरोक्त चौंकाने वाले पहलुओं को देखते हुए कोर्ट ने एक सप्ताह के भीतर यूपी के प्रमुख सचिव (गृह) से व्यक्तिगत हलफनामा मांगा है. मामले की अगली सुनवाई अब 15 दिसंबर को होगी.
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