हलफनामे पर आवेदन में Wrong Fact रखने पर हाई कोर्ट ने लगाया 2.50 लाख रुपये जुर्माना
जमानत याचिका में देरी करना था उद्देश्य, कोर्ट ने मंजूर की जमानत

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा है कि जमानत याचिका पर सुनवाई में देरी के उद्देश्य से गवाह का गलत तथ्यों (Wrong Fact) के साथ हलफनामा दाखिल करना आपत्तिजनक है. एजीए ने सही तथ्यों (Correct Fact) की ओर इशारा किया, तब भी न तो अपीलकर्ता के सीनियर वकील ने कोई खेद व्यक्त किया और न ही मुखबिर की ओर से गलत तथ्यों (Wrong Fact) पर ऐसा आवेदन दायर करने के लिए कोई माफी मांगी.
कोर्ट ने कहा, हमारा विचार है कि मुखबिर और उसके वकील का यह आचरण, अगर इस पर (Wrong Fact) रोक नहीं लगाई गई, तो यह एक गलत मिसाल कायम करेगा और जमानत याचिकाओं पर विचार में देरी करने के उद्देश्य से ऐसे आवेदन दायर करना एक नियमित मामला बन जाएगा.
हमने शुरू में ऐसे आवेदन दायर करने के लिए मुखबिर पर 5 लाख रुपये का जुर्माना लगाया था, लेकिन अपीलकर्ताओं के सीनियर वकील के अनुरोध पर हम इसे घटाकर 2.50 लाख रुपये कर रहे हैं. मुखबिर 2 महीने के अंदर अपीलकर्ता को 2.50 लाख रुपये का भुगतान करेगा.ऐसा न करने पर जिला मजिस्ट्रेट, आजमगढ़ उससे उक्त राशि की वसूली के लिए भू-राजस्व के बकाया के रूप में वसूली की कार्यवाही शुरू करेंगे और तीन महीने के अंदर अनुपालन रिपोर्ट प्रस्तुत करेंगे.
यह आदेश जस्टिस प्रशांत मिश्र प्रथम और जस्टिस सिद्धार्थ की बेंच ने चन्द्रशेखर उर्फ घुरहू सरोज व अन्य की तरफ से दाखिल क्रिमिनल एप्लीकेशन पर सुनवाई के बाद दिया है. जमानत के लिए दाखिल किये गये आवेदन पर सुनवाई के दौरान एक हलफनामा कोर्ट में पेश किया गया.
मेडिकल कंडीशन का जिक्र किया जा रहा है वह Wrong Fact है
इसमें अपीलकर्ता चंद्र शेखर उर्फ घुरहू सरोज के खिलाफ धारा 379 बीएनएसएस के तहत जांच शुरू करने की मांग की गयी थी. इसमें दावा किया गया था कि जमानत आवेदनकर्ता की ओर से जिस मेडिकल कंडीशन का जिक्र किया जा रहा है वह गलत (Wrong Fact) है. इसे नोटिस लेते हुए कोर्ट ने स्टेट से इंस्ट्रक्शन हासिल करने को कहा था. इसके बाद जमानत याचिका पर सुनवाई करीब एक पखवारे के लिए टाल दी गयी थी.
रीसेंटली इस मामले में फिर से डेट लगी तो स्टेट की तरफ से मंगवाया गया इंस्ट्रक्शन कोर्ट ने रिकॉर्ड पर लिया. इसमें जिला जेल आजमगढ़ के अधीक्षक ने प्रमाणित किया है कि अपीलकर्ता को सीने में तेज दर्द उठने पर जिला अस्पताल भेजा गया था (Correct Fact), जहां उसकी जांच सीनियर फिजिशियन, डॉ. नवनीत गुप्ता और कार्डियोलॉजिस्ट डॉ. अतुल श्रीवास्तव ने की थी.

उसका एक्स-रे, ईसीजी और ब्लड टेस्ट किया गया था. कोर्ट ने कहा कि अपीलकर्ता के इलाज के सहायक दस्तावेजों को देखने से पता चलता है कि 379 की कार्रवाई के लिए आवेदन Wrong Fact के आधार पर दायर किया गया है.
यह जमानत याचिका अपीलकर्ताओं चंद्र शेखर उर्फ घुरहू सरोज और राजेंद्र प्रजापति की ओर से दायर की गई थी. जिसमें राज्य बनाम गुरु प्रसाद राय @ बेचू राय और अन्य से उत्पन्न मामले अपराध संख्या 10 ऑफ 2021, धारा- 147, 148, 149, 506, 352, 302, 120-बी आईपीसी और धारा 7 सीएल एक्ट थाना गंभीरपुर जिला आजमगढ़ के तहत, अपील के लंबित रहने के दौरान उन्हें जमानत पर रिहा करने की प्रार्थना की गई थी.
जमानत याचिका पर दोनों पक्षों के तर्कों को सुनने के बाद कोर्ट ने माना कि मृतक के मरने के बाद ढाई घंटे तक उसके वापस आने की कहानी झूठी थी. अपीलकर्ताओं को मृतक पर गोली चलाने का कोई रोल नहीं दिया गया था और न ही उनका कोई मकसद था. उन्हें सिर्फ उकसाने का रोल दिया गया था. मनीष राय का बयान 2018 के मामले में पहले ही रिकॉर्ड किया जा चुका था. इसलिए, आरोपी व्यक्ति के लिए मनीष राय को खत्म करने का कोई औचित्य नहीं था.
कोर्ट ने कहा कि अपील 2025 की है और निकट भविष्य में इसकी सुनवाई होने की संभावना नहीं है. इस तथ्य पर विचार करने के बाद कि इस कोर्ट के समक्ष प्रति दिन दो सौ से अधिक आपराधिक अपीलें सूचीबद्ध हैं और सभी पर योग्यता के आधार पर फैसला करना मानवीय रूप से संभव नहीं है. निकट भविष्य में इस अपील की सुनवाई की बहुत कम संभावना है, इसलिए आवेदकों-अपीलकर्ताओं को जमानत देने की प्रार्थना स्वीकार की जाती है.
आवेदकों, जिन्हें उपरोक्त अपराध में दोषी ठहराया गया है और सजा सुनाई गई है, संबंधित अदालत की संतुष्टि के अनुसार एक व्यक्तिगत मुचलका और प्रत्येक दो जमानतदार उसी राशि के प्रस्तुत करने पर जमानत पर रिहा किया जाए. इस अपील के लंबित रहने के दौरान आवेदकों-अपीलकर्ताओं को दी गई सजा भी निलंबित रहेगी.
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