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जब तक कोई विशेष कानून नकारात्मक बोझ नहीं डालता, आरोपी को निर्दोषता साबित करने के लिए Evidence पेश करने की जरूरत नहीं

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने अपहरण और बलात्कार में सुनायी गयी सजा को रद किया, आरोपित को जेल से रिहा करने का आदेश

जब तक कोई विशेष कानून नकारात्मक बोझ नहीं डालता, आरोपी को निर्दोषता साबित करने के लिए Evidence पेश करने की जरूरत नहीं

सुप्रीम कोर्ट के फैसले इस बात की पुष्टि करते हैं कि जब तक कोई विशेष कानून नकारात्मक बोझ नहीं डालता, आरोपी को निर्दोषता साबित करने के लिए Evidence पेश करने की आवश्यकता नहीं है. अभियोजन पक्ष को उचित संदेह से परे Evidence के साथ अपराध साबित करना होगा. इस कमेंट के साथ इलाहाबाद हाई कोर्ट के जस्टिस अचल सचदेव ने भागवत कुशवाहा द्वारा दायर आपराधिक अपील स्वीकार करते हुए जेल से रिहा करने का आदेश दिया है. कोर्ट ने झांसी की कोर्ट द्वारा 05 सितंबर 2019 का फैसला और आदेश के साथ 06 सितंबर 2019 को सुनायी गयी सजा का आदेश रद्द कर दिया है.

कोर्ट ने कहा कि आरोपी का Evidence पेश करने या इन तत्वों को गलत साबित करने का कोई कर्तव्य नहीं है. लेकिन, भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 की धारा 114A के तहत एक सीमित बदलाव होता है, जो केवल IPC की धारा 376(2) के निर्दिष्ट खंडों (गंभीर बलात्कार, जैसे कि किसी अधिकारी द्वारा) के तहत मुकदमों पर लागू होता है.

यहाँ, यदि अभियोजन पक्ष यौन संबंध साबित करता है और पीड़िता Evidence में कहती है कि उसने सहमति नहीं दी थी, तो अदालत सहमति की अनुपस्थिति मान लेगी, जिससे इस अनुमान को गलत साबित करने का बोझ आरोपी पर आ जाएगा. फिर भी, अपराध साबित करने का कुल बोझ अभियोजन पक्ष पर ही रहता है. धारा 114A निर्दोषता की सामान्य धारणा को उलटती नहीं है या आरोपी को मूल अपराध के Evidence के अभाव में निर्दोषता साबित करने की आवश्यकता नहीं होती है.

कोर्ट में याचिका भागवत कुशवाहा की तरफ से दायर की गयी थी. इसमें उन्होंने विशेष न्यायाधीश (POCSO) जनपद झांसी द्वारा दिये गये फैसले और आदेश को चुनौती दी थी. यह आदेश विशेष सत्र मुकदमा संख्या 41/2015 (उत्तर प्रदेश राज्य बनाम भागवत कुशवाहा) से संबंधित था जो झांसी जिले के सक्रार थाने में दर्ज कराया गया था. याची को कोर्ट ने आईपीसी की धारा 366 और 376 के अपराध का दोषी पाया था. धारा 366 में उसे पांच साल की कैद और 10,000 रुपये का जुर्माना और धारा 376 में 10 साल की कैद और 20,000 रुपये का जुर्माना की सजा सुनायी गयी थी.

केस के फैक्ट्स के अनुसार 28 मई 2015 को मुखबिर रामस्वरूप पुत्र घनश्याम, निवासी ग्राम लुहारी, थाना सक्रार, जनपद झांसी ने लिखित रिपोर्ट दर्ज करायी, जिसमें कहा गया कि उसकी बेटी को उनके गांव के मुन्नू कुशवाहा के बेटे भागवत ने अगवा कर लिया है.

पुलिस ने सूचना के आधार पर अपीलकर्ता भागवत के खिलाफ धारा 363, 366 और अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति अधिनियम की धारा 3(2)(v) के तहत आपराधिक मामला दर्ज किया. पीड़िता को पुलिस ने 29 मई को बरामद किया और उसका बयान रिकॉर्ड किया. मेडिकल जांच में पीड़िता की उम्र 17 साल पाई गई. पीड़िता का बयान मजिस्ट्रेट के सामने रिकॉर्ड किया गया. अपीलकर्ता को 04.06.2015 को गिरफ्तार किया गया.

जांच अधिकारी ने अपीलकर्ता के खिलाफ धारा 363, 366 और 376 IPC के साथ प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रन फ्रॉम सेक्सुअल ऑफेंसेस एक्ट (POCSO) की धारा 4 और एससी/एसटी एक्ट की धारा 3(2)(v) के तहत चार्जशीट दायर की. ट्रायल कोर्ट ने चार्जशीट में बताए गए अपराधों पर सुनवाई के बाद अपना फैसला सुनाया था.

हाई कोर्ट में सुनवाई के दौरान तर्क दिया गया कि पीड़िता ने अपनी माँ की मौजूदगी में डॉक्टर के सामने बयान (Evidence) दिया है और इसमें कोई शक नहीं कि पीड़िता अपीलकर्ता के कंट्रोल और प्रभाव से आजाद थी. पीड़िता ने कहीं भी यह नहीं कहा कि अपीलकर्ता उसे जबरदस्ती उसके घर से ले गया था और अपीलकर्ता ने रास्ते में एक खेत में उसके साथ रेप किया.

इसकी पुष्टि पीड़िता के मजिस्ट्रेट के सामने धारा 164 के तहत दिए गए बयान से होती है. लेकिन, ट्रायल कोर्ट के फैसले में इस तथ्य को नजरअंदाज किया गया है. क्रॉस-एग्जामिनेशन में, पीड़िता कहती है कि उसने मजिस्ट्रेट को यह नहीं बताया कि वह भागवत से प्यार करती थी और वह अपनी मर्जी से उसके साथ गई थी और मजिस्ट्रेट ने गलत तरीके से उपरोक्त बयान (Evidence) दर्ज किया है. पीड़िता ने अपनी क्रॉस-एग्जामिनेशन में कहा है कि उसने मजिस्ट्रेट को यह नहीं बताया कि उसके साथ रेप हुआ था और इसी वजह से मजिस्ट्रेट ने इसे दर्ज नहीं किया.

कोर्ट ने कहा कि, ट्रायल कोर्ट का यह निष्कर्ष सही है कि मजिस्ट्रेट के सामने दर्ज किया गया पीड़िता का बयान सबूत (Evidence) का मुख्य हिस्सा नहीं है, लेकिन Cr.PC की धारा 164 के तहत मजिस्ट्रेट के सामने दिए गए बयान से मुकरने से कोर्ट में शपथ पर गवाही देते समय गवाह की ईमानदारी पर संदेह पैदा होता है और अभियोजन पक्ष को उन परिस्थितियों को समझाना चाहिए जिनके तहत मजिस्ट्रेट के सामने पीड़िता का बयान दर्ज किया गया था.

पीड़िता का मेडिकल परीक्षण करने वाले डॉक्टर ने जांच में पाया कि हाइमन में पुराना फटा हुआ निशान था और वह ठीक हो गया था. पीड़िता ने डॉक्टर को बताया कि वह छत पर सो रही थी और फिर वह अपीलकर्ता के साथ झांसी चली गई. जांच करने वाले डॉक्टर का अनुमान था कि यह ठीक हो गया था और हाल ही में यौन गतिविधि का कोई सबूत (Evidence) नहीं था. ट्रायल कोर्ट ने अपने फैसले में, मेडिकल रिपोर्ट में दी गई राय के संबंध में, यह माना है कि पीड़िता का मेडिकल परीक्षण 5 दिन बाद किया गया था. कोर्ट ने कहा कि ट्रायल कोर्ट का उपरोक्त निष्कर्ष रिकॉर्ड से परे है.

वकील द्वारा दिए गए इस तर्क को खारिज करते हुए कोर्ट का यह फैसला कि मेडिकल जांच रिपोर्ट और वजाइनल स्मियर रिपोर्ट अपीलकर्ता के खिलाफ अभियोजन पक्ष के मामले का समर्थन नहीं करती हैं, गलत और निंदनीय है और ऐसा लगता है कि यह अपीलकर्ता को दोषी ठहराने के लिए उसके पक्ष में सबूत (Evidence) छिपाने की जानबूझकर की गई कोशिश है और यह आपराधिक कानून के मूल सिद्धांतों के खिलाफ है कि मामले की खूबियों पर कोई राय देने से पहले अभियोजन पक्ष को सबूत (Evidence) का बोझ उठाना होगा.

Evidence का बोझ पूरी तरह से अभियोजन पक्ष पर

भारतीय दंड संहिता की धारा 376 के तहत बलात्कार के मामलों में, आरोपी के अपराध को उचित संदेह से परे साबित करने का सबूत (Evidence) का बोझ पूरी तरह से अभियोजन पक्ष पर होता है. यह सिद्धांत निर्दोषता की धारणा से उत्पन्न होता है, जो आपराधिक न्यायशास्त्र का एक मौलिक सिद्धांत है.

आरोपी पर अपनी निर्दोषता साबित करने का कोई दायित्व नहीं है, जब तक कि कोई विशेष वैधानिक प्रावधान बोझ को स्थानांतरित न कर दे. बलात्कार के मुकदमों में अभियोजन पक्ष को अपराध के सभी तत्वों को साबित करना होगा जिसमें यौन संबंध और सहमति का अभाव शामिल है.

ट्रायल कोर्ट की यह फाइंडिंग कि घटना के समय पीड़िता बालिग थी, पीड़िता को सहमति देने वाली पार्टी बनाती है और अपीलकर्ता पर कोई आपराधिक जिम्मेदारी नहीं डाली जा सकती, क्योंकि पीड़िता खुद अपनी मर्जी से अपीलकर्ता के साथ जाने के लिए अपने पिता का घर छोड़कर गई थी. मेडिकल जांच रिपोर्ट और वजाइनल स्मियर रिपोर्ट अभियोजन पक्ष के इस वर्जन (Evidence) को गलत साबित करती है कि पीड़िता का अपहरण किया गया था और अपीलकर्ता ने उसके साथ जबरदस्ती रेप किया था.

ट्रायल कोर्ट रिकॉर्ड पर मौजूद सभी सबूतों (Evidence) के असर को समझने में नाकाम रहा और इस तरह रिकॉर्ड पर मौजूद मेडिकल सबूतों (Evidence) पर विश्वास न करके, अपीलकर्ता को दोषी ठहराने में गंभीर गलती की है.
CRIMINAL APPEAL No. – 452 of 2021 Bhagwat Kushwaha Versus State of U.P.

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