सुनिश्चित करें Special Act औजार न बन जाएं, 9 साल की देर से की गयी एफआईआर के दो आरोपितों की जमानत मंजूर
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने विक्टिम जो खुद एक प्रैक्टिसिंग वकील हैं के बर्ताव को भी नोटिस लिया

अपना फैसला सुनाने में कोर्ट ने इस फैक्ट पर फोकस किया कि एफआईआर दर्ज करने में नौ साल की देरी बिना वजह थी. सुनवाई के दौरान कोर्ट ने विक्टिम जो खुद एक प्रैक्टिसिंग वकील हैं के बर्ताव को भी नोटिस लिया.
इस घटना के संबंध में एफआईआर बुलंदशहर जिले के कोतवाली देहात थाने में 19 अगस्त 2025 को दर्ज करायी गयी थी. तहरीर के आधार पर पुलिस ने अपराध संख्या 708/2025 धारा 376-D, 354, 354-B, 323, 342, 406, 504, 506 आईपीसी और 3(2)5, 3(1)Da एससी एसटी एक्ट (Special Act) दर्ज किया.
केस के फैक्टस के अनुसार पीड़िता आरोपित से अक्टूबर 2016 में मिली थी. तब वह पीसीएस की तैयारी के लिए कोचिंग ले रही थी. कोचिंग जाते समय उसकी मुलाकात आरोपित से हुई और उसने पीड़िता को अपनी कार में बैठने का आफर दिया. अपनी कार से वह उसे बस स्टैंड के पास ले गया. बाद में उसे अपने दोस्त के घर ले गया.
यहां उसने जबरदस्ती फिजिकल रिलेशन बनाया. विरोध करने पर उसने शादी का भरोसा दिलाकर उसे चुप करा दिया. इसके बाद वह बिना पीड़िता की सहमति के उसके साथ शारीरिक संबंध बनाता रहा.
इस रिलेशन के चलते वह प्रेग्नेंट हो गयी तो आरोपित ने उसे कुछ गोलियां खिलाईं जिससे उसका गर्भपात हो गया. एफआईआर में अपीलकर्ताओं सहित कुल 18 को आरोपित बनाया गया था. इसमें से चार अधिवक्ता हैं. खुद पीड़िता भी एक प्रैक्टिशर एडवोकेट है. सुनवाई के दौरान कोर्ट को बताया गया कि पीड़ित खुद भी एक वकील है और उसका आपराधिक इतिहास है. उसने अपीलकर्ता और अन्य आरोपियों के खिलाफ कई आपराधिक मामले दर्ज कराए हैं.
बुलंदशहर की Special SC/ST कोर्ट में जमानत आवेदन खारिज कर दिया

एफआईआर दर्ज होने के बाद अपीलकर्ताओं ने जमानत के लिए बुलंदशहर की स्पेशल (Special) कोर्ट में जमानत के लिए आवेदन किया जिसे खारिज कर दिया गया. इसके बाद यह मामला इलाहाबाद हाई कोर्ट पहुंचा था. हाईकोर्ट में उनके वकील ने तर्क दिया कि एफआईआर 9 साल की देरी के बाद दर्ज की गई जो यह दिखाने के लिए काफी है कि केस लीगल कंसल्टेशन के बाद दर्ज किया गया.
यह भी कहा गया कि मौजूदा एफआईआर एक जवाबी हमला है, क्योंकि अपील करने वालों में से एक ने इस साल अगस्त में ही पीड़िता के खिलाफ एफआईआर दर्ज करा दी थी. बेंच को बताया गया कि पीड़िता ने अभी जो एफआईआर दर्ज कराई है, उसके सिर्फ बीस दिन बाद उसके खिलाफ एफआईआर दर्ज कर ली गई.
दूसरी तरफ एजीए ने पीड़िता और गवाह इसरार खान के साथ जोर देकर कहा कि देरी शादी के झूठे वादे की वजह से हुई. यह भी कहा गया कि आरोपी उसे केस से हटने की धमकी दे रहे थे. हाई कोर्ट ने ऑर्डर में लिखा है कि पीड़िता एक गवाह (वकील) के साथ कोर्ट के सामने पेश हुई और उसने मांग की कि पूरी कार्रवाई की वीडियो रिकॉर्डिंग की जाए.
उसने कोर्टरूम में दूसरे वकीलों की मौजूदगी पर भी एतराज जताया. केस की सुनवाई शुरू हुई तो पीड़िता ने कहा कि उसने अपना वकालतनामा फाइल नहीं किया. उसने बहस के लिए दूसरे वकील को बुलाने के लिए समय मांगा. जब उनसे पूछा गया कि क्या उन्हें नोटिस भेजा गया तो उन्होंने साफ मना कर दिया और कहा कि ऐसा कोई नोटिस नहीं मिला है.
स्टेट के वकील ने संबंधित थानेदार की रिपोर्ट पेश की, जिसमें कहा गया कि जब ऑफिसर नोटिस देने के लिए विक्टिम के चैंबर में गया तो उसने उसे लेने से मना कर दिया. इसके अलावा, जब उसने उसके चैंबर के बाहर नोटिस चिपकाने की कोशिश की तो पीड़िता और दूसरे वकीलों ने एतराज किया और गुस्सा हो गए और उन्होंने ऑफिसर को जाने पर मजबूर कर दिया.
“इस ऑर्डर को खत्म करने से पहले, कोर्ट यह बताना चाहेगा कि एससी/एसटी एक्ट (Special Act) के तहत पीड़िता को हर कार्रवाई में पेश होने का मौका देने के इरादे से दिए गए मौकों और अधिकारों का गलत इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए.”
जस्टिस अनिल कुमार-X
CRIMINAL APPEAL No. – 9437 of 2025; Aznan Khan v. State of U.P. and Another