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28 साल बाद दो बेगुनाह जानें लेने वाले Driver दोषी करार, 6000 रुपये अर्थदंड लगाया

करीब 28 साल की लंबी कानूनी लड़ाई के बाद बात मेजा ग्राम न्यायालय ने दो ट्रैक्टर ड्राइवरों (Driver) ज्ञानेन्द्र कुमार और जगजीवन लाल को लापरवाही से हुई मौत के लिए दोषी ठहराया है. कोर्ट ने ज्ञानेन्द्र कुमार को धारा 279 IPC में 6 माह साधारण कारावास व एक हजार अर्थदंड और जगजीवन लाल को धारा 279 IPC में 6 माह साधारण कारावास और एक हजार अर्थदंड व धारा 304A IPC में 2 वर्ष साधारण कारावास और 5,000 रुपये अर्थदंड लगाया है. दोनों सजाएं साथ चलेंगी.

28 साल बाद दो बेगुनाह जानें लेने वाले Driver दोषी करार, 6000 रुपये अर्थदंड लगाया

घटना 12 अगस्त 1995 की रात करीब 8 बजे मेजा-उरुवा मार्ग पर ग्राम अखरी शाहपुर के पास हुई थी. वादी मुकदमा ईश्वरदीन अपनी पत्नी, सास कलुइया देवी और छोटी बेटी के साथ साइकिल से दवा दिलाकर घर लौट रहे थे. सामने से पटिया (स्लैब) लादे हुए, दो ट्रैक्टर-ट्रॉली आ रहे थे.

अभियोजन के अनुसार एक ट्रैक्टर (UP-70-B-9923) जिसकी लाइट जल रही थी के driver ने साइकिल को इतनी जोरदार टक्कर मारी कि ईश्वरदीन बाईं ओर और उनकी सास और नन्ही बेटी दाईं ओर गिर गए. इससे पहले कि वे संभल पाते पीछे से आ रहे दूसरे ट्रैक्टर (UP-70-E-0215) जिसकी लाइट तक नहीं जल रही थी के driver का अगला पहिया सीधे कलुइया देवी के सिर के ऊपर चढ़ गया.

घटना में ईश्वरदीन की सास और बेटी की मौके पर ही मौत हो गई. दोनों ट्रैक्टर चालक (Driver) ज्ञानेन्द्र कुमार और जगजीवन लाल मौके पर अपने वाहन छोड़कर भाग खड़े हुए. कोर्ट में इस 28 साल पुराने मामले में अभियोजन पक्ष के तीन गवाहों गोपी चन्द्र गुप्ता, ईश्वरदीन और रामराज गुप्ता ने न्याय की जंग अंत तक लड़ी- सबसे निर्णायक रहा गोपी चन्द्र गुप्ता का बयान जो प्रत्यक्षदर्शी थे.

Driver मौके पर अपने वाहन छोड़कर भाग खड़े हुए

उन्होंने यह पूरी घटना अपनी आँखों से तिलकधारी बिन्द के मकान के सामने होते हुए देखी थी. उन्होंने स्पष्ट बताया कि पहले ट्रैक्टर ने टक्कर मारी, जिससे दोनों पीड़ित गिरे, और फिर पीछे वाले ट्रैक्टर के Driver ने उन्हें रौंद दिया. न्यायालय ने उनके साक्ष्य को अत्यंत मूल्यवान और विश्वसनीय माना, क्योंकि वह घटनास्थल पर मौजूद थे.

बचाव पक्ष के वकील ने साक्षियों के बयानों में मामूली विरोधाभास होने का तर्क दिया और दावा किया कि उनके मुवक्किल निर्दोष हैं और उन्हें रंजिशन फँसाया गया है. न्यायाधिकारी रुपाँशु आर्य ने सुप्रीम कोर्ट के फैसलों (नरेन्द्र नाथ कुवारे बनाम पारसनाथ कुवारे, भल्लू सिंह बनाम स्टेट आफ यूपी) का हवाला देते हुए कहा कि मामूली विरोधाभासों को नजरअंदाज किया जा सकता है, जब महत्वपूर्ण बिंदुओं पर मौलिक साम्यता हो.

न्यायालय ने यह भी कहा कि भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 134 के तहत साक्षियों की गुणवत्ता उनकी संख्या से अधिक महत्वपूर्ण है. कोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि मृत्यु और ड्राइवरों की लापरवाही के बीच सीधा संबंध था और कोई तीसरा हस्तक्षेपकारी तत्व नहीं था. सुप्रीम कोर्ट के सिद्धांत ‘रेस इप्सा लोक्विटर (चीजें स्वयं बोलती हैं) को लागू करते हुए, न्यायालय ने यह निष्कर्ष निकाला कि घटना स्वयं ही अभियुक्तों की घोर उपेक्षा को साबित करती है.

कोर्ट ने बचाव पक्ष की परिवीक्षा (प्रोबेशन) की मांग को खारिज कर दिया और सुप्रीम कोर्ट के दलबीर सिंह बनाम हरियाणा राज्य में दिये गये फैसले का जिक्र किया, जिसमें कहा गया है कि सड़क दुर्घटनाओं में दंडात्मकता (Deterrence) प्राथमिक विचार होना चाहिए.

“जब ऑटोमोबाइल मौत के जाल बन गए हैं तो लापरवाह ड्राइविंग के दोषी ड्राइवरों को दिखाई गई किसी भी नरमी से सड़क दुर्घटनाओं में और वृद्धि होने का खतरा होगा. पेशेवर ड्राइवरों को हर पल याद रखना चाहिए कि वे लापरवाही या असावधानी का एक भी क्षण नहीं उठा सकते.”
कोर्ट

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