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489 दिन Delay के साथ मेरिट पर आये सुप्रीम कोर्ट के फैसले की समीक्षा हम नहीं कर सकते: हाई कोर्ट

Delay माफी की अर्जी के साथ सरकार की रिव्यू पिटीशन इलाहाबाद हाई कोर्ट से खारिज

489 दिन Delay के साथ मेरिट पर आये सुप्रीम कोर्ट के फैसले की समीक्षा हम नहीं कर सकते: हाई कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने आदेश पारित करते समय Delay और मामले की मेरिट पर विचार किया था और इसलिए रिव्यू पिटीशन को स्वीकार करके हम सुप्रीम कोर्ट के फैसले और आदेश की समीक्षा नहीं कर सकते. इस कमेंट के साथ इलाहाबाद हाई कोर्ट ने सरकार की तरफ से दाखिल देरी (Delay) माफ करने की अर्जी और रिव्यू पिटीशन खारिज कर दी है.

जस्टिस नीरज तिवारी और विवेक कुमार सिंह की बेंच ने इस बात पर विचार करते हुए कि राज्य सरकार ऑफिस नोट्स तैयार करने और फाइलों के एक डेस्क से दूसरे और एक अधिकारी से दूसरे अधिकारी के पास जाने की अलग-अलग तारीखें बताने के अलावा 5743/489  दिन की देरी  (Delay)  से याचिका दाखिल करने के लिए कोई उचित स्पष्टीकरण देने में पूरी तरह विफल रही है.

बेंच ने कहा, हमारी राय में, दिए गए स्पष्टीकरण इतनी बड़ी देरी  (Delay) को माफ करने के लिए न तो पर्याप्त हैं और न ही स्वीकार्य हैं. इस रिव्यू एप्लीकेशन उत्तर प्रदेश राज्य की ओर से इस कोर्ट द्वारा रिट याचिका (C) नंबर 34974/2001 (मोहन लाल बनाम U.P. राज्य और अन्य) में 13 नवंबर 2009 को दिए गए फैसले और आदेश के रिव्यू की मांग में दाखिल की गयी थी.

इस मामले में कोर्ट ने याचिकाकर्ता (मोहन लाल) के पक्ष में रिट याचिका स्वीकार कर ली गई थी. सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह था कि रिव्यू किए जाने वाले फैसले की तारीख से रिव्यू एप्लीकेशन दाखिल करने में 5743 दिनों की देरी  (Delay) हुई.

कोर्ट ने कहा कि 13 नवंबर 2009 का फैसला और आदेश जिसका हमारे सामने रिव्यू किया जा रहा है, को पहले यूपी राज्य ने स्पेशल लीव पिटीशन (C) नंबर 25032/2014 दाखिल करके 1633 दिनों की देरी  (Delay) से चुनौती दी थी. सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश 03 मई 2024 द्वारा देरी के साथ-साथ मेरिट के आधार पर भी इसे खारिज कर दिया था.

1633 दिन Delay से चुनौती दी थी

इस प्रकार, जिस तारीख को स्पेशल लीव पिटीशन खारिज की गई थी, उस तारीख से रिव्यू पिटीशन दाखिल करने में लगभग 489 दिनों की देरी  (Delay) हुई है. रिट (C) नंबर 34974/2009 मोहन लाल ने यूपी राज्य के खिलाफ दायर की थी, जिसमें यह प्रार्थना की गई थी कि प्रतिवादी को निर्देश दिया जाए कि वह राजस्व रिकॉर्ड से उत्तर प्रदेश राज्य का नाम हटा दे और उत्तर प्रदेश राज्य के स्थान पर याचिकाकर्ता का नाम राजस्व रिकॉर्ड में दर्ज करे.

दोनों पक्षों को सुनने के बाद कोर्ट ने 13 नवंबर 2009 के फैसले और आदेश द्वारा रिट याचिका स्वीकार कर ली और यह माना गया कि याचिकाकर्ता शहरी भूमि (सीलिंग और विनियमन) निरसन अधिनियम, 1999 (संक्षेप में ‘निरसन अधिनियम’) की धारा 3 के लाभ का हकदार है और उसकी भूमि को निरसन अधिनियम के तहत खाली भूमि घोषित नहीं माना जाएगा.

इस फैसले और आदेश के खिलाफ उत्तर प्रदेश राज्य ने स्पेशल लीव पिटीशन नंबर 25032 ऑफ 2014 दायर की थी. जिसे सुप्रीम कोर्ट ने 03.05.2024 के आदेश से खारिज कर दिया था. मामले की मेरिट पर सुप्रीम कोर्ट ने आदेश के पैराग्राफ 2.2 में विचार किया गया था.

आदेश के ऑपरेटिव हिस्से में याचिका दायर करने में 1633 दिनों की भारी देरी  (Delay) को सुप्रीम कोर्ट ने माफ नहीं किया. याचिका दायर करने में देरी  (Delay) को समझाने के लिए, राज्य द्वारा केवल यही दलील दी गई थी कि मामला वकील को सौंपा गया था , इस तर्क को स्वीकार नहीं किया जा सकता.

कोर्ट ने कहा कि मामले के तथ्यों के आधार पर हम इस निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि इस रिव्यू पिटीशन को दायर करने में राज्य की ओर से अनुचित लापरवाही और उदासीनता बरती गई है. राज्य ने यह स्पष्ट नहीं किया है कि 2009 के बाद और स्पेशल लीव पिटीशन नंबर 25032 ऑफ 2014 दायर करने से पहले उन्हें रिव्यू पिटीशन दायर करने से किसने रोका.

देरी  (Delay) माफ करने की अर्जी के समर्थन में दायर हलफनामे में यह भी कहा गया है कि जब सुप्रीम कोर्ट ने 03.05.2024 के आदेश से स्पेशल लीव पिटीशन नंबर 25032/2014 को खारिज कर दिया, तो याचिकाकर्ता मोहन लाल ने सुप्रीम कोर्ट के 03 मई 2024 और हाई कोर्ट के 13 नवंबर 2009 के आदेश का पालन करते हुए राजस्व रिकॉर्ड में अपना नाम दर्ज कराने के लिए 05 जुलाई 2024 को एक अर्जी दी.

उसके बाद 16 जुलाई 2024 को रिव्यू पिटीशन दायर करने के लिए राज्य सरकार को प्रस्ताव भेजा गया. 22 अगस्त 2024 को ऑफिस मेमो नंबर 230 तैयार किया गया और उसे सुप्रीम कोर्ट के एडवोकेट ऑन रिकॉर्ड को भेजा गया. एडवोकेट ऑन रिकॉर्ड ने अपनी कानूनी राय 22 मार्च 2025 को भेजी. इसके बाद राज्य ने रिव्यू पिटीशन दायर करने का फैसला किया और रिव्यू पिटीशन दायर करने की अनुमति दी गई.

स्टैंडिंग काउंसिल ने कोर्ट को देरी माफ करने की अर्जी के समर्थन में दायर हलफनामे में दिए गए उपरोक्त सबमिशन के बारे में बताते हुए कहा है कि देरी अनजाने में हुई है. रिव्यू पिटीशन इसलिए दायर नहीं की जा सकी क्योंकि कुछ नियमों और प्रक्रियाओं का पालन करते हुए प्रशासनिक औपचारिकताएं पूरी करने में समय लगा और जब उन्हें एडवोकेट ऑन रिकॉर्ड से कानूनी राय मिली तो मीटिंग में यह तय किया गया कि रिव्यू पिटीशन दायर की जाएगी.

कोर्ट ने कहा कि स्टैंडिंग काउंसिल द्वारा दिए गए सबमिशन पर ध्यान से विचार किया है हालांकि, हमने पाया कि रिव्यू पिटीशन दायर करने में हुई देरी और लापरवाही को संतोषजनक ढंग से नहीं समझाया गया है. हम यह कहना चाहेंगे कि जब कई सालों की भारी देरी को माफ करने की बात आती है, तो इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि मुकदमेबाज कोई प्राइवेट पार्टी है या राज्य या भारत संघ.

कोर्ट ने कहा कि सरकारी निकायों और उनकी एजेंसियों को समय पर याचिका दायर करने में सतर्क रहना चाहिए. इस आम बहाने को मानने की कोई जरूरत नहीं है कि प्रक्रिया में काफी ज्यादा प्रक्रियात्मक लालफीताशाही के कारण याचिका कई सालों तक पेंडिंग पड़ी रही. देरी को माफ करना एक अपवाद है और इसे सरकारी विभागों के लिए पहले से मिलने वाले फायदे के तौर पर इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए.

कानून सभी को एक ही नजर से देखता है और इसे सरकारी विभाग के फायदे के लिए नहीं मोड़ा जाना चाहिए. इस कोर्ट के साथ-साथ सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों में यह माना गया है कि देरी को उदारता के तौर पर माफ नहीं किया जाना चाहिए.

रिव्यू पिटीशन दायर करने में राज्य द्वारा अपनाया गया तरीका घोर लापरवाही और निष्क्रियता को दिखाता है, जो हमारी राय में नेकनीयत नहीं कहा जा सकता. हम देखते हैं कि राज्य का रवैया शुरू से ही लापरवाह और साफ तौर पर लापरवाही वाला रहा है.
बेंच ने कहा

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