भरण-पोषण है एक सतत अधिकार, जहां पत्नी का आवास वहां की Court को है क्षेत्राधिकार, कमांडिंग आफिसर 60 दिन में फैसला करें

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अपने महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि पत्नी के भरण-पोषण का अधिकार “सतत अधिकार”है और जहां पत्नी रहती है वहां की Court को भी सुनवाई का अधिकार है. इसलिए याचिका सुनने का इस हाईकोर्ट को भी क्षेत्राधिकार प्राप्त है. कोर्ट ने भारत सरकार के अधिवक्ता द्वारा सुनवाई क्षेत्राधिकार को लेकर की गई आपत्ति को खारिज कर दिया है. कोर्ट ने सेना के कमांडिंग आफिसर को हवलदार पति के वेतन से याची के खाते में गुजारा भत्ता भुगतान करने की अर्जी पर दो माह में आदेश पारित करने का निर्देश दिया है.
यह आदेश जस्टिस अतुल श्रीधरन एवं जस्टिस सिद्धार्थ नंदन की बेंच (Court) ने सीमा पांडेय की याचिका पर दिया है. Court ने स्पष्ट किया कि भरण-पोषण का अधिकार एक निरंतर चलने वाला अधिकार है. अतः जिस स्थान पर पत्नी निवास कर रही है, वहीं की Court को वाद सुनने का अधिकार होगा. केवल इस आधार पर कि मूल वाद कारण किसी अन्य स्थान से संबंधित है, Court के क्षेत्राधिकार को समाप्त नहीं किया जा सकता. याचिका पर एडवोकेट गौरव द्विवेदी व एडवोकेट प्रखर शुक्ला ने बहस की.
तर्क रखा कि याचिकाकर्त्री जो एक सैन्यकर्मी की पत्नी हैं को भारतीय सेना अधिनियम, 1950 की धारा 90 के अंतर्गत पति के वेतन से भरण-पोषण हेतु कटौती का वैधानिक अधिकार प्राप्त है और संबंधित अधिकारी के समक्ष लंबित अभ्यावेदन पर समयबद्ध निर्णय आवश्यक है. भारत सरकार के अधिवक्ता की आपत्ति थी कि मामला मुंबई हाईकोर्ट के अधिकार क्षेत्र में आता है. इसलिए याचिका खारिज की जाय. जिसे Court ने अस्वीकार कर दिया.
याचिकाकर्ता के वकील ने कहा कि इस रिट पिटीशन का सब्जेक्ट मैटर कमांडिंग ऑफिसर आर्टिलरी रिकॉर्ड्स, C/O 56 APO के पास विचाराधीन है. सब्जेक्ट मैटर का सारांश यह है कि याचिकाकर्ता इंडियन आर्मी में हवलदार के पद पर तैनात कर्मचारी की पत्नी है. उसकी शिकायत यह है कि उसके पति ने उसके साथ बुरा बर्ताव किया है और उसे उसके ससुराल से निकाल दिया है.

उसे अपने गुजारे के लिए कोई पैसा नहीं मिल रहा है. उसने पति के कमांडिंग ऑफिसर को रिप्रेजेंटेशन देकर गुजारिश की थी कि आर्मी एक्ट 1950 के सेक्शन 90 (i) के अनुसार पति की सैलरी से कटौती की जाए और गुजारे के पैसे पत्नी के अकाउंट में जमा किए जाएं. उन्होंने कोर्ट को बताया कि याचिकाकर्ता के पति ने अपना जवाब फाइल कर दिया है लेकिन उसके बाद कोई प्रोग्रेस नहीं हुई है.
कोर्ट ने जजमेंट में कहा कि मेंटेनेंस का अधिकार लगातार चलने वाला है. ऐसे मामले में Court का जूरिस्डिक्शन सिर्फ इसलिए खत्म नहीं किया जा सकता क्योंकि मुख्य कारण कहीं और मौजूद है. यह बताना भी जरूरी है कि जिन मामलों में सेक्शन 125 Cr.P.C. के तहत पिटीशन पेश की जानी हैं, वहां ज्यूडिशियल फैसले से यह आम कानून है कि इसे उसी जगह/ Court में पेश किया जा सकता है और बनाए रखा जा सकता है जिस Court के जूरिस्डिक्शन में पत्नी रहती है.
Court का जूरिस्डिक्शन सिर्फ इसलिए खत्म नहीं किया जा सकता क्योंकि मुख्य कारण कहीं और मौजूद है
यहां भी यही तर्क लागू करते हुए और इस बात पर विचार करते हुए कि पिटीशनर के पास अपनी इनकम का कोई दूसरा सोर्स नहीं है, उसे माननीय बॉम्बे हाई कोर्ट में राहत मांगने के लिए मजबूर करना सही नहीं होगा. Court ने आर्मी अफसर से रिक्वेस्ट की है कि वह आर्मी एक्ट, 1950 के सेक्शन 90 के तहत पिटीशनर के रिप्रेजेंटेशन पर इस ऑर्डर के कम्युनिकेशन की तारीख से 60 दिनों के अंदर फैसला करें. इसके साथ ही कोर्ट ने याचिका निस्तारित कर दी है.